कलबुर्गी के हत्यारे से कम नहीं दैनिक भास्कर का जुर्म

Vineet Kumar :  वैसे तो न्यूज वेबसाइट के नाम पर पार्शियल पोर्न वेबसाइट चला रहे भास्कर समूह के लिए हिट्स के खेल में नीचता की हद तक उतर आना आम बात है. इसे हम रूटीन के तौर पर देखते आए हैं. फैशन शो के दौरान मॉडल के कपड़े खिसक जाते हैं तो वो उस हिस्से को ब्लर करने के बजाय लाल रंग का दिल बनाना ज्यादा बेहतर समझता है. लेकिन अब इस हद तक उतर आएगा कि ये अश्लीलता शब्दों को बेधकर घुस आएगी और वो भी उस संदर्भ में जहां असहमति में खड़े होना आसान नहीं है.

दैनिक भास्कर से कोई पूछे तो सही कि कलबुर्गी की मौत पर चुप्पी साधे साहित्य अकादमी (जिसकी चर्चा Abhishek Srivastava ने विस्तार से की है) के प्रतिरोध में उसके पुरस्कार को लौटाना डर का परिचायक है या उस साहस का जो एक से एक दिग्गजों में जीवन की व्यवहारिकता के तर्क के साथ गायब हो गई है? मुझे याद है जिस साल उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी सम्मान मिला था, उस वक्त उन पर कई तरह के आरोप लगे थे, सत्ता और उन्हीं महंतों के साथ सेत-मेत कर लेने की अफवाहें फैलायीं गई थी जिनका उदय प्रकाश से रचना और जीवन के स्तर पर लगातार विरोध रहा है. उदय प्रकाश क्या, साहित्यिक जगत में अमूमन किसी भी पुरस्कार के मिलने पर लेखक के सम्मान में इजाफा होने के बजाय उसकी साख पर सवाल उठने शुरू हो जाते हैं..जरूरी नहीं कि इसके लिए स्वयं लेखक ने जुगत भिड़ाई हो लेकिन ये पुरस्कार खुद इतने बदनाम और सवालों के घेरे में आ गए हैं कि इसे स्वीकार करनेवाला लेखक कई बार तमाम योग्यताओं के बावजूद साहित्य-बिरादरी में दुरदुराया जाने लग जाता है.

उस वक्त उदय प्रकाश ने अपने स्तर से ठीक-ठाक तर्क दिए थे लेकिन हमले जारी रहे. माहौल ऐसा बना कि उन्हें साहित्य अकादमी सम्मान नहीं, वाजपेयी सम्मान मिला हो. खैर, वो तमाम लोग यदि तब की अपनी-अपनी पोस्ट पलटकर देखें और उदय प्रकाश के इस फैसले से मिलान करें तो एकबारगी जरूर एहसास होगा कि तब हमने जल्दीबाजी कर दी थी. ये भी है कि ऐसा किए जाने से उदय प्रकाश पर लगते रहे आरोप, होते रहे हमले पर विराम नहीं लग जाएंगे लेकिन इस सवाल के सिरे से सोचकर देखें तो कि क्या अकेले उदय प्रकाश तो जीवित लेखक नहीं हैं जिन्होंने एक साहित्य अकादमी प्राप्त लेखक की सरेआम हत्या कर दिए जाने पर पुरस्कार लौटाकर अपना प्रतिरोध जाहिर करना जरूरी समझा? क्या ये इस हत्या के खिलाफ लिखे गए किसी लेख से कम महत्व रखता है?

ये सही है कि ऐसा करने से न तो साहित्य अकादमी की क्षुद्रता कम होगी और न ही वो इस प्रतिरोध का सम्मान करेगा लेकिन इतना तो जरूर है कि हमारा उस लिखे के प्रति और यकीन बढ़ेगा जिसे कभी इसी अकादमी ने सम्मानित किया था. कुछ नहीं तो इतना तो जरूर है कि साहित्य अकादमी मिलने और स्वीकार कर लेने से उदय प्रकाश का जितना सम्मान नहीं हुआ( आरोप लगनेवाली बात को नत्थी करके देखें तो) उससे कई गुना ज्यादा कद इसके लौटा देने से बढ़ा है. बहुतेरे लेखकों, बुद्धिजीवियों के लिए मौके पर चुप रह जाना जितना व्यावहारिक फैसला हुआ करता है, उदय प्रकाश का ऐसा किया जाना भी उतना ही व्यावहारिक है..आखिर व्यावहारिकता का एक ही पक्ष क्यों हो ?

लेकिन दैनिक भास्कर या दूसरा कोई भी मीडिया मंच प्रतिरोध की इस भाषा को समझने में नाकाम है या फिर वो काबिलियत हासिल ही नहीं कि तो कम से उसे इस बात का दावा तो छोड़ ही देना चाहिए कि वो हिन्दी पत्रकारिता कर रहे हैं. हिन्दी दिवस के सटे दिन में उसका ऐसा किया जाना १४ सितंबर के मौके पर तैयार किए जानेवाले विशेष पन्ने के उपर एक अश्लील चुटकुला ही होगा.

उदय प्रकाश की इन पंक्तियों में डर का जो अर्थ खुलता है ये वो डर नहीं है जिसे भास्कर ने सपाट अर्थ में लिया- ”साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतांध हिंदुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गई कायराना और दहशतनाक हत्या है, उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है। अब यह चुप रहने का और मुंह सिल कर सुरक्षित कहीं छुप जाने का पल नहीं है।”

आप ही सोचिए कि इन पंक्तियों में डर शामिल है या कुंवर नारायण की पंक्ति “या तो अ ब स की तरह जीना है या अरस्तू की तरह जहर पीना है” से गुजरकर फैसले तक पहुंचा एक लेखक लेकिन दक्षिणपंथी हत्यारों ने तो कलबुर्गी की हत्या की जबकि दैनिक भास्कर ने एक लेखक के जिंदा रहने के सबूत को मरा घोषित कर दिया.

ये जुर्म कुछ कम बड़ा नहीं है.

मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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