मजीठिया से बचने के लिए भास्कर के मालिकान बन गए जल्लाद, हर वक्त धमकाते फिर रहे (पढ़िए कुछ उदाहरण)

मजीठिया वेज बोर्ड जहां एक ओर प्रिंट मीडिया कर्मियों के लिए आशाओं का आसमान लेकर आया है वहीं मालिकों के हाथ में आतंकी-उग्रवादी-बदमाशी-दमन-उत्पीड़न का आयुध औजार बन गया है। दैनिक भास्कर के मालिकान और उनके कारकून-कारिंदे इस हथियार को उठाए पैशाचिक नृत्य कर रहे हैं। हर कर्मचारी को धमकाते हुए खौफनाक आलाप ले रहे हैं। उनके सुर के बोल हैं— खबरदार, अगर मजीठिया पाने के लिए एक भी शब्द निकाला तो तुम्हारा इतनी दूर, ऐसे इलाके में तबादला कर दिया जाएगा कि तुम्हारा वहां रहना, गुजारा कर पाना मुहाल हो जाएगा। तुम्हारे खिलाफ ऐसा माहौल, ऐसे हालात बना-पैदा कर दिए जाएंगे कि तुम्हारा कंपनी में बने रहना दुश्वार हो जाएगा। तुमको इतना तंग किया जाएगा कि तुम दूसरों का क्या, अपने बारे में भी सोचना-समझना भूल जाओगे। बेहतर है कि चुप्पी मार के, सिर झुकाकर शांति से काम करो और जो कहा जाता है करो। इसी में तुम्हारी भलाई-बेहतरी है। समझ गए न!

भास्कर के चंडीगढ़ एडीशन में यही, या कहें कि इससे भी ज्यादा वीभत्स-भयानक माहौल बना दिया गया है। कोई भी पत्रकार या गैर पत्रकार कर्मचारी मजीठिया के बारे में सुगबुगाहट भी नहीं कर पा रहा है। संपादकीय विभाग, एचआर विभाग, विज्ञापन विभाग, वित्त विभाग, सेल विभाग, वितरण विभाग आदि सभी जगहों पर मैनेजमेंट ने मुखबिरों, खुफियागिरी करने वालों को बिठा रखा है। जो सभी कर्मचारियों के बीच घुल-मिलकर रहते हैं और उनके बीच की बातों-चर्चाओं को विभागीय प्रधानों तक पहुंचाते रहते हैं। यही नहीं, अब तो सबके मोबाइल फोनों को भी सर्विलांस पर रख दिया गया है। सबके सेल फोनों पर होने वाली वार्ताओं पर नजर रखी जा रही है।

ताजा मामला एक वरिष्ठ संपादकीय कर्मचारी से संबद्ध है। यह कर्मचारी लंबे समय से बीमार चल रहा है। उसके पैर में इतनी प्रॅाब्लम है कि उसका चलना-फिरना भी मुश्किल हो गया है। वह अवकाश पर चल रहा है। लेकिन अभी जब सभी कर्मचारियों की सेलरी बनाने का काम चल रहा था तो रुटीन में जब उससे भी पूछा गया कि आपने छुट्टी का आवेदन पत्र नहीं दिया है तो दे दें, अन्यथा आपकी सेलरी बनाने में असुविधा होगी। उस कर्मचारी ने कह दिया कि मैं छुट्टी का आवेदन भेज रहा हूं। बात आई-गई, हो गई। लेकिन हैरानी तो तब हुई जब उस कर्मचारी की तहकीकात होने लगी जिसने उक्त संपादकीय कर्मी को फोन किया था। यह पता लगाया जाने लगा कि उस कर्मचारी ने किसको फोन किया था और क्या बात हुई थी। इस तहकीकात में एचआर विभाग के एक मैनेजर ने एक वरिष्ठ संपादकीय कर्मचारी को ही लगाया। उस संपादकीय कर्मी ने पता लगा कर बताया कि अमुक-अमुक के बीच इतने बजे बात हुई थी। फिर क्या था, फोन करने वाले कर्मचारी की तो शामत आ गई। उस पर मैनेजमेंट की सीक्रेसी को लीक करने का इल्जाम मढ़ दिया गया। हालांकि उस कर्मचारी ने ऐसा कुछ नहीं किया था, उसने महज सेलरी और छुट्टी के ही संदर्भ में बात की थी।

इस तिल को ताड़ बनाने की एक अलग कहानी है। दरअसल संपादकीय विभाग के नए मुखिया बने श्रीमान अंकित शुक्ला साहब का रोबदाब-अहंकार-अभिमान-घमंड-इगो कुछ ज्यादा ही सातवेें आसमान पर है। हो भी क्यों न, वह माननीय दैनिक भास्कर के ग्रुप एडीटर कल्पेश याज्ञिक के कुछ खास चमचों में जो शुमार हैं! और स्थानीय संपादक बनने की उनकी यही एकमात्र काबलियत है। अपनी इस काबलियत को चंडीगढ़ संस्करण में दिखाने-चमकाने में वह पिछले तीन-चार साल से लगे हुए हैं। अब जाकर उन्हें अपेक्षित कुर्सी मिली है। वह महानुभाव हर उस पुराने, काबिल संपादकीय कर्मचारी से खार खाते हैं जो अपने कार्यों से उन्हें निरंतर आईना दिखाता रहता है।

साथ ही उनकी एक और काबलियत उनका क्षेत्रवादी होना है। वह चाहते हैं कि संपादकीय विभाग के सारे लोग उनके जिले कानपुर के हों और वह भी सजातीय यानी बाभन (ब्राह्मण-पंडित)। मेन डेस्क पर अपने ऐसे कनपुरिया चहेतों को उन्होंने भर रखा है। बहरहाल, जिस वरिष्ठ संपादकीय कर्मी की बात हो रही है वह हिमाचल के हैं और तेजतर्रार पत्रकार हैं। अपने काम के माहिर हैं। शुक्ला साहब उन्हें नौकरी से बेदखल करना चाहते हैं। संयोग कहें या दुर्योग कि उन्हें मौका मिल गया है। और वह जनाब एचआर विभाग के एजीएम रूपिंदर कौर और मैनेजर रमनदीप राणा के साथ मिलकर अपने उक्त वरिष्ठ संपादकीय सहकर्मी को रुखसत करने पर आमादा हैं। कोई बीमार हो, परेशान हो, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं है। उन्हें तो उस बंदे को निकालने के अलावा कुछ सूझ ही नहीं रहा। यही नहीं, उनके इस पुनीत काम में राज्य संपादक दीपक धीमान साहब की भी लिखित सहमति है कि उसे रिप्लेस करो।

इसी से मिलती-जुलती कथा पंचकूला ब्यूरो के एक पत्रकार कर्मचारी की भी है। वह भी पुराना कर्मचारी था, बीमार चल रहा था, छुट्टी ली थी, फिर भी उसे बेतरह परेशान किया गया। आखिरकार उसने इस्तीफा दे दिया। दो मिसालों से यह तो साफ हो ही गया होगा कि भास्कर मालिकान-प्रबंधन चाहता क्या है? अगर नहीं हुआ हो तो बता देता हूं कि भास्कर के महामहिम मालिकान रमेश चंद्र अग्रवाल, सुधीर अग्रवाल, गिरीश अग्रवाल आदि पुराने कर्मचारियों से पीछा छुड़ाने में जुटे हुए हैं। वे चाहते हैं कि पुराने कर्मी हर हाल में उनके नंबर एक लेकिन घोर विज्ञापनी-इश्तहारी, बिचौलिये, बाजारू, दलाल अखबार को बॉय-बॉय कह दें। इसके लिए उन्होंने पूरे संस्थान में आतंकवाद-उग्रवाद का माहौल बना रखा है। अपने कारकूनो-कारिंदों-चमचों को इस काम में संलिप्त कर रखा है। उन्हें कर्मचारियों को सताने, डराने, धमकाने, परेशान करने, उत्पीडि़त करने, दमन करने, हो सके तो दानवीय-राक्षसी-दैत्यीय घिनौना कारनामा करने की खुली छूट दे रखी है। हालांकि मजीठिया वेज बोर्ड की संस्तुतियों को लागू करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बचने के लिए उन्होंने डेक्लेरेशन फार्म पर कर्मचारियों से अंगूठे लगवा लिए हैं, फिर भी वह खौफ उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है कि कहीं काई कर्मचारी उनकी घिनौनी-वीभत्स-घोर अमानवीय हरकतों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दस्तक न दे दे।

अपनी इन्हीं बेहद अमानवीय, गैर कानूनी हरकतों-नीतियों के तहत उन्होंने कर्मचारियों का यहां-वहां तबादला करने, उनकी री-ज्वाइनिंग कराने, उन्हें कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्ति देने की कसरतें शुरू कर दी हैं। मतलब कि कर्मचारियों का तबादला कर रहे हैं, तब्दील वाली जगह पर जब वे ज्वाइन कर रहे हैं तो उनसे जबरदस्ती मौजूदा तिथि में नई ज्वाइनिंग ली जा रही है। चंद रोज पहले मैनेजमेंट ने यह काम लुधियाना एडीशन के कर्मचारियों के साथ थोक में किया है। पहला काम तो यह किया कि लुधियाना एडीशन का प्रकाशन वहां से बंद करके उसका प्रकाशन कार्य चंडीगढ़ से करने का फैसला किया। फिर लुधियाना के पूरे स्टाफ को तब्दील कर चंडीगढ़ लाकर पटक दिया। फिर उन सभी कर्मचारियों की री-ज्वाइनिंग कराई गई है और उन्हें कॉन्ट्रैक्ट पर तैनाती दी गई है। और सभी की सर्विस फाइलों में जबरदस्ती कॉन्ट्रैक्ट के कागजात नत्थी कर दिए गए हैं। यही नहीं, कॉन्ट्रैक्ट अप्वाइंटमेंट की एक भास्कर साइट भी बना दी गई है। यही खेल बठिंडा, जालंधर, अमृतसर और हरियाणा के सभी एडीशनों में धड़ल्ले से किया जा रहा है। इस महा अमानवीय कृत्य को अंजाम इस तरह दिया जा रहा है जैसे गुंडे-माफिया अपनी हरकतों को अंजाम देते हैं।

चंडीगढ़ से भड़ास संवाददाता की रिपोर्ट.

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