प्रभात डबराल-
बिहार चुनाव में एक और कोण है जो मुझमें इस चुनाव के प्रति दिलचस्पी बढ़ा रहा है. ये कोण मीडिया, खासकर गोदी मीडिया से संबंधित है.
इधर सोशल मीडिया में ऐसी कई पोस्ट दिखीं जिनमें लोग गोदी मीडिया के प्रतिनिधियों को खुलेआम गरिया रहे हैं- गोदी मीडिया गो बैक के नारे लगा रहे हैं.
मैंने बिहार में काम कर रहे पुराने पत्रकार साथियों से इस बारे में बात की. सभी कह रहे हैं कि गोदी मीडिया यानी न्यूज चैनलों से लोग आमतौर पर नाराज़ तो हैं ही. कितना नाराज़ हैं, ये कहना मुश्किल है.
ये स्थिति फील्ड में काम करने वाले टीवी पत्रकारों के लिए एक नई चुनौती पेश करेगी. क्या ये लोग खुलकर अपना काम कर पाएंगे.
सब जानते हैं कि बिहार के इस चुनाव का नतीजा देश की राजनीति में दूरगामी प्रभाव डालेगा. बिरला ही पत्रकार होगा जो इस चुनाव को वहीं जाकर महसूस करने के लिए लालायित न हो रहा हो. मैं भी जा रहा हूँ, हालाँकि मैं किसी संस्था से जुड़ा नहीं हूँ.
हम जैसों को कौन जानता है. लेकिन वो एंकर/एंकरनियां/ रिपोर्टर जो गोदी मीडिया के पोस्टर-बॉय हैं, उन्हें तो सब पहचानते हैं.
सबको सावधान सतर्क रहना होगा – सरकार को भी.
प्रभात जी की पोस्ट पर आए कुछ केंट्स भी पढ़िए….
मधुरेंद्र सिन्हा-
बिहार में शोर मचाकर trp लेने की होड़ है। लेकिन सच यह है कि यहां कुछ बदलने वाला नहीं। कांग्रेस के पर लालू यादव ने कतर दिए हैं सो अब कुछ खास नहीं है।
अंशु नैथानी-
टीवी पत्रकारिता अब मर रही है, लोग युटयुबर्स पर ज्यादा यकीन करने लगे हैं । गोदी मीडिया ने रही सही विश्वसनीयता भी खत्म कर दी। हिंदी चैनलों की पत्रकारिता का दौर अब गुजरने ही वाला है। बिहार के लोग इनको पहचानने में आगे रहे हैं। 2017-18 में ही मैंने पटना के डाक बंगला चौराहे पर रिपब्लिक चैनल के रिपोर्टर को बुरी तरह लोगों द्वारा कॉर्नर करते देखा है।
वेद विलास-
जिस तरह एक पत्रकार के चेहरे पर कीचड़ फेंका गया उससे यह भी साबित हो रहा कि बिहार के लोग दल्ला और चाटुकार पत्रकारों को भी बख्शने के मूड में नहीं । अब समय बदल गया लोग बहुत जागरूक हैं। उन्हेंहर चीज का पता रहता है। और यह ठीक भी है। आखिर खुलेआम कैसे किसी भी राजनीतिक दल के लिए एजेंडा सेट किया जा सकता है।


