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बिहार

बिहार जैसे दरिद्र समाज का हर तीसरा व्यक्ति नेता या IAS न बन पाए तो पत्रकार बन जाता है!

विश्व दीपक-

प्रशांत किशोर जिस चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं उसे एक शब्द में बिहारी-खब्त कहा जा सकता है. बिहार जैसे दरिद्र समाज का हर तीसरा आदमी या तो नेता बनना चाहता है या आईएएस. जब दोनों नहीं बन पाता तब पत्रकार बन जाता है.

सवाल है क्यों? क्योंकि दरिद्र समाजिक चेतना को सत्ता के अलावा कोई और भाषा ठीक-ठीक नहीं समझ आती. प्रशांत किशोर की सारी उठापटक का सोर्स उनकी यही चेतना है.

फिलहाल जन सुराज यात्रा के माध्यम से वो गांधी नाम के प्रोडक्ट तो दोबारा लांच करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सफलता की संभावना बेहद कम है.

एक तो गांधी नाम का प्रोडक्ट राजनीति में आउटडेटेड हो चुका है. दूसरा गांधीवाद की मलाई कई बार, कई-कई लोगों द्वारा खाई जा चुकी है. तीसरा यह दौर अंबेडकर का है. चौथा शिक्षा-रोजगार की राजनीति दिल्ली जैसे शहरी केन्द्र में चल सकती है. बिहार में नहीं. सफलता की संभावना बेहद क्षीण है. अंतिम बात-प्रशांत आने वाले वक्त में घूम-फिरकर वहीं पहुंच जाएंगे जहां से चले थे.

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