
भारत सरकार के प्रयास से केरल की नर्स को यमन में आज होने वाली फांसी टल गई, औपचारिक आदेश नहीं है फिर भी खबर सबने पहले पन्ने पर छापी है
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में बिहार में चल रहे विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर या सर) पर तेलुगू देशम की प्रतिक्रिया को वो महत्व नहीं मिला है जिसके काबिल वह है। हिन्दी के मेरे तीन अखबारों में से दो, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में यह पहले पन्ने पर नहीं है। देशबन्धु में यह टॉप पर दो कॉलम में है। इंडियन एक्सप्रेस में यह पांच कॉलम की लगभग लीड है और शीर्षक दो लाइन का है। बड़े फौन्ट के लिहाज से शुभेन्दु शुक्ल की खबर लीड है। कोई शक नहीं है कि टीडीपी वाली खबर महत्वपूर्ण है और लीड के लायक है। फिर भी हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में नहीं है तो अंग्रेजी के बाकी अखबारों में कैसे, कितनी बड़ी खबर है उसपर चर्चा से पहले बता दूं कि यह खबर क्यों महत्वपूर्ण है और हिन्दी वाले यह नहीं कह सकते हैं तेलुगूदेशम पार्टी की खबर हिन्दी के पाठकों के काम की नहीं है। वैसे भी, तेलुगू देशम पार्टी केंद्र सरकार की दो बैसाखियों में से एक है या बैसाखियों की जोड़ी का भाग है। मोटे तौर पर खबर यह है कि तेलुगू देशम पार्टी ने चुनाव आयोग से नाराजगी जताई है और चुनाव आयोग पर आरोप है तथा उसके काम से लग रहा है कि वह केंद्र की भाजपा सरकार के लिए काम कर रहा है। वैसे तो बिहार में नीतिश कुमार की सरकार है और नीतिश की पार्टी केंद्र सरकार की दूसरी बैसाखी है। नीतिश कुमार लंबे समय से केंद्र की भाजपा सरकार के सहयोग से सत्ता में हैं और एक बार लालू यादव की पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई थी तो कुछ ही समय बाद लालू को छोड़कर भाजपा से गलबहियां कर बैठे। नीतिश कुमार ने भाजपा की सेवा कर सत्ता का सुख भोगा है तो भाजपा ने नीतिश कुमार और उनकी पार्टी का भी वही किया है जो वह अपने सहयोगियों के साथ करती रही है।
ऐसे में बिहार में लगभग जबरन और पूरी तरह बिना वजह चलाये जा रहे सर अभियान का मकसद और चाहे जो हो नीतिश कुमार की मदद करना तो बिल्कुल नहीं है। भाजपा अगर अकेले लाभ की उम्मीद में हो तो कामयाब होगी कि नहीं वह बाद की बात है और ऐसे में तेलुगूदेशम की नाराजगी के मायने हैं और इसका असर केंद्र सरकार पर पड़ सकता है। वैसे भी, नरेन्द्र मोदी 75 साल के होने वाले हैं और अपने ही बनाये नियम के अनुसार मार्गदर्शक मंडल में जाने में की उम्र में पहुंच गये हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख याद दिला चुके हैं और भाजपा अध्यक्ष कौन हो का विवाद लंबा चल चुका है। ऐसे में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री रहेंगे कि नहीं के साथ भाजपा को टीडीपी का समर्थन मिलता रहेगा कि नहीं – दो सवाल दो बैसाखियों से कमजोर नहीं हैं। फिर भी पहले पन्ने पर नहीं हैं तो रेखांकित करने लायक जरूर हैं। वैसे भी, मामला सिर्फ नाराजगी का नहीं है, पूरी तरह राजनीतिक है और सहयोगियों के साथ भाजपा या नरेन्द्र मोदी की सरकार जो करती रही है उसके मद्देनजर खुद की सतर्कता बताने के लिए भी हो तो कम गंभीर नहीं है। खबर को समझने के लिए आपको इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक बताता हूं। भाजपा की सहयोगी तेलुगू देशम पार्टी ने चुनाव आयोग से कहा, एसआईआर (सर) की संभावनाएं तय कीजिये, स्पष्ट कीजिये कि इसका नागरिकता से कोई संबंध नहीं है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयुक्तों से मुलाकात की। मुख्य खबर का शीर्षक है, पार्टी ने कहा कि मतदाता सूची से किसी को भी हटाने से पहले वैध जांच होनी चाहिये। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर चार कॉलम में है। शीर्षक है, “मतदाता सूची से संबंधित अभियान चुनाव से करीब नहीं होना चाहिये : टीडीपी”।
कहने की जरूरत नहीं है कि अगर ऐसा हुआ तो चुनाव आयोग के सूत्र के जरिये छपवाई गई खबर का क्या होगा जिसके अनुसार बिहार की मतदाता सूची में विदेशी भी शामिल हैं। यही नहीं, एक प्रचारक अखबार कल यह छाप चुका है कि, पुनरीक्षण के बाद बिहार की प्रारुप सूची से 35.7 लाख मतदाताओं के नाम हटेंगे। यह कैसे हो सकता है और क्यों कटेंगे तथा कटेंगे तो 35.7 लाख ही कटेंगे यह कैसे तय हो गया? खबर चुनाव आयोग के दावे पर आधारित है और अखबार को यह जरूरत महसूस नहीं हुई कि दावा करने वाले का नाम बताये और उनसे पूछे कि यह दावा किस आधार पर है। हालांकि, खबर कहती है कि राज्य के करीब 17.38 लाख मतदाता स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित हो गये हैं, 12.56 लाख लोगों की मृत्यु हो चुकी है और 5.76 लाख लोगों के नाम दो जगह दर्ज पाये गये हैं। सवाल यह है कि ये जानकारी फॉर्म भरने से पहले ही उपलब्ध है तो इतना कवायद करने की जरूरत क्यों है? दूसरे, स्थानांतरित हो गये मतदाताओं के नाम हटाने ही हैं तो बिहार के बाहर के अखबारों में पहले पन्ने पर पूरे पन्ने का विज्ञापन देने की क्या जरूरत थी? विज्ञापन कहता है कि लोग ऐप्प से अपना नाम दर्ज करा सकते हैं। नियम यह है कि जो लोग किसी निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहते हैं वही मतदाता हो सकते हैं। ऐसे में बाहर वालों के लिए विज्ञापन क्यों और उसके साथ यह घोषणा किसलिये?
एक तरफ चुनाव आयोग या उसके जरिये भाजपा की यह तैयारी है और दूसरी तरफ तेलुगू देशम की चेतावनी, मांग या परेशानी। निश्चित रूप से यह गंभीर मुद्दा है पर केंद्र की भाजपा सरकार को कमजोर दिखायेगा इसलिए आज इस खबर को महत्व नहीं दिया गया है। दूसरा कारण भी हो सकता है लेकिन खबर के राजनीतिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। इसलिये, आइये देखें कि यह खबर कैसे छपी है और लीड नहीं है तो कौन सी खबर लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया में तेलुगू देशम पार्टी की खबर पहले पन्ने पर या उससे पहले के अधपन्ने पर नहीं है। पहले पन्ने की लीड शुभांशु शुक्ल की सफल वापसी है तो इससे पहले के अधपन्ने की लीड सुप्रीम कोर्ट का यह कहना है कि क्षेत्रवाद को बढ़ावा देना सांप्रदायिकता की ही तरह खतरनाक है। इस खबर में बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने एआईएमआईएम का पंजीकरण रद्द करने की अपील पर सुनवाई से इनकार कर दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया में इस खबर के साथ एक और महत्वपूर्ण खबर सिंगल कॉलम में है। इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लंबे समय तक जेल में रहने के बाद बरी किये जाने वाले लोगों की क्षतिपूर्ति के लिए एक कानून की आवश्यकता है। मुझे लगता है कि सरकार जब राजनीतिक बदले के लिए या राजनीतिक गोटियां सेकने के लिए लोगों को येनकेन प्रकारेण जेल में रखे तो क्षतिपूर्ति जरूरी है। आम आदमी के मामले में तो जरूरी है ही क्योंकि उसका तो हाल पूछने वाला भी कोई नहीं है।
हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड विदेशमंत्री की अपील है जो उन्होंने एससीओ से आतंकवाद के खिलाफ स्टैंड लेने के लिए की है। यही खबर दि एशियन एज में भी लीड है। यहां शीर्षक है, एससीओ में विदेशमंत्री ने आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान पर निशाना साधा, ऑपरेशन सिन्दूर को उचित बताया। आप जानते हैं कि पुलवामा मामले की क्या और कैसी जांच हुई तथा आतंकवाद के उस मामले में क्या और कैसी कार्रवाई हुई। उसके कई साल बाद पहलगाम हुआ और कैसे आतंकवाद के खिलाफ ऑपरेशन सिन्दूर शुरू हो गया जो पाकिस्तान से युद्ध में बदल गया और अचानक युद्ध विराम हो गया जिसकी घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने की और बार-बार श्रेय लेते रहे पर प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा। यहां तक कि नरेन्दर-सरेंडर कहा जाना लगा। कुल मिलाकर आतंकवाद के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार बताते हुए ऑपरेशन सिन्दूर नाम का युद्ध छेड़ दिया गया। दूसरी ओर, मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को जिन्दा पकड़ लिये जाने, उसके खिलाफ कार्रवाई कर उसे फांसी तक पहुंचाने और पाकिस्तान को कटघड़े में खड़ा करने का मजाक उड़ाने के लिए बिरयानी खिलाने की कहानी गढ़ी गई और कहानी गढ़ने वाले को चुनाव लड़ने के टिकट का ईनाम दिया गया और हार जाने पर राज्य सभा की सदस्यता सौंप दी गई। जिस समूह ने आतंकवाद के खिलाफ विधिवत कार्रवाई का मजाक बनाया और सत्ता में आने पर मजाक बनाने वाले को पुरस्कृत किया वही समूह सत्ता में रहते हुए नौकरशाह विदेश मंत्री के जरिये कभी चीन से सीमा विवाद पर और कभी आतंकवाद के खिलाफ स्टैंड की बात करे तो वह हेडलाइन मैनेजमेंट से ज्यादा नहीं है और यह लीड उसका असर भर है। वैसे भी, कांग्रेस ने कहा है कि चीन के सामने झुक रहे हैं मोदी (देशबन्धु)। दूसरी ओर, आज इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है – प्रमुख चश्मदीद ने एनआईए से कहा, पहलगाम के आतंकियों ने हत्या के बाद अपनी कामयाबी की खुशी में हवा में फायर भी किये। यह खबर आज किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। इसके मुकाबले, नाम पूछकर मारा और पैंट उतरवाकर धर्म की पुष्टि की जैसी खबरों को कितनी प्रमुखता मिली थी आप जानते हैं।
केरल की राजनीति और प्रायोजित प्रशंसा
द हिन्दू की लीड आज बिजनेस पेज की खबर है जो सेवाओं के निर्यात से संबंधित है। खबर के अनुसार सेवाओं के निर्यात से पहली तिमाही में भारत का व्यापार घाटा 9.4 प्रतिशत कम हो गया। ऐसा सेवाओं के निर्यात में 11 प्रतिशत की वृद्धि से संभव हुआ है। इससे संपूर्ण व्यापार घाटा घट कर 20.3 बिलियन डॉलर रह गया। अखबार ने बताया है कि निर्यात का मौजूदा विकास पटरी पर है और वाणिज्य सचिव का दावा है कि 825 बिलियन डॉलर के गए साल के रिकार्ड आंकड़े को पीछे छोड़ देगा। द हिन्दू की दूसरी खबर भी सरकारी प्रचार है। यह यमन में भारतीय नर्स निमिशा प्रिया की फांसी टल जाने से संबंधित है और बताया गया है कि, संबंधित संवेदनशीलताओं के बावजूद भारतीय अधिकारी स्थानीय जेल अधिकारियों और अभियोजन कार्यालय से नियमित संपर्क में रहे हैं जिससे मामले को टालना संभव हुआ है। पहले की रिपोर्ट के अनुसार निमिशा प्रिया को आज (बुधवार) फांसी दी जानी थी हालांकि, आधिकारिक घोषणा उपलब्ध नहीं कराई गई थी। भारत में यमन के दूतावास ने पूर्व में एक बयान जारी कर कहा था कि सुश्री प्रिया को यमन सरकार ने फांसी नहीं दी है। अखबार ने लिखा है कि उसे बताया गया था कि सरकार मामले से संबंधित सभी स्टेकधारकों के साथ आपसी सहमति योग्य समाधान चाहती है। समझौते के बीच अभी फांसी टली है। खबर के अनुसार केरल की रहने वाली सुश्री प्रिया 2017 में एक हत्या की दोषी पाये जाने के बाद से फांसी का इंतजार में थीं। केरल और यमन की यह खबर आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर तीन कॉलम में है। आप जानते हैं कि भाजपा केरल में पांव जमाने की कोशिश कर रही है और हाल में राज्यसभा के लिए मनोनीत चार लोगों में एक, केरल के वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सी सदानंदन मस्ते भी हैं। मस्ते केरल भाजपा के सदस्य रहे हैं। वे पूर्व में शिक्षक थे। उन्हें भाजपा ने 2021 के विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया था। इससे पहले, 25 जनवरी 1994 को सदानंदन मस्ते को राजनीतिक हिंसा के शिकार बनाया गया था। तब उनके पैतृक गांव पेरिंचरी के पास माकपा कार्यकर्ताओं ने उनके दोनों पैर काट दिए थे।
केरल की नर्स और यमन का मामला आज दि एशियन एज में पांच कॉलम में है। टाइम्स ऑफ इंडिया में चार कॉलम में है (लेकिन पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने के पीछे) हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस और द टेलीग्राफ में तीन कॉलम, टाइम्स ऑफ इंडिया में दो कॉलम, नवोदय टाइम्स में सिंगल कॉलम में है। देशबन्धु में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां जिन्दगी की जंग हार गई छात्रा – सिंगल कॉलम की खबर है। उपशीर्षक है, सहायक प्रोफेसर से परेशान होकर किया था आत्मदाह। इसके नीचे की सिंगल खबर का शीर्षक है,”यह आत्महत्या नहीं ‘सिस्टम’ द्वारा संगठित हत्या है : राहुल”। उड़ीशा की छात्रा का मामला या तो पहले पन्ने पर नहीं है या फिर सिंगल कॉलम में ही। अमर उजाला अपवाद है। इसमें दोनों खबरें पहले पन्ने पर हैं और प्रमुखता से। उड़ीशा की खबर यहां चार कॉलम में है।


