
संजय कुमार सिंह
संसद सत्र के दौरान संसद की खबर ही लीड होनी चाहिये। जब विपक्ष कमजोर था तो सत्ता पक्ष विपक्ष को बोलने नहीं देता था अब जब विपक्ष बोल रहा है तो अखबारों की खबरें, ‘विपक्ष का आरोप’, ‘विपक्ष का प्रदर्शन, बजट में पक्षपात का आरोप’, ‘वित्तमंत्री ने कहा आरोप अन्यायपूर्ण, विपक्ष ने बजट को अनुचित कहा’, ‘सरकार ने आरोप से इनकार’ किया जैसे शीर्षक लगाये हैं। इनसे बजट पर लगाये गये आरोपों का पता नहीं चलता है। टाइम्स ऑफ इंडिया और द टेलीग्राफ में यह खबर लीड नहीं है। अकले हिन्दुस्तान टाइम्स ने कई आरोप और उनके कथित जवाब छापे हैं जिससे पाठक खुद तय कर पायें कि आरोप कितना दमदार है या उसका जवाब लचर है अथवा उसमें भी दम है।
द टेलीग्राफ में बजट पर चर्चा की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। अंदर के पन्ने पर जो आरोप लगाये गये हैं उसका फ्लैग शीर्षक है, “बजट में ‘अनुचित व्यवहार’ पर संसद में विरोध”। मुख्य खबर का शीर्षक है, “गैर राजग राज्यों को कोई ग्रांट नहीं : विपक्ष”। इसके साथ एक और खबर है, “रोजगार बढ़ाने की लॉली भरोसा बढ़ाने में नाकाम रही : चिदंबरम”। सिंगल कॉलम की एक खबर रेल कवच पर भी है। इसका शीर्षक है, मंत्री ने रेल कवच पर सवाल का जवाब नहीं दिया, प्रधानमंत्री का बचाव किया। खबर में बताया गया है कि इसकी मांग 2012 से है और 2023 में एक के बाद एक कई दुर्घटनाओं के मद्देनजर इसकी मांग बढ़ गई थी लेकिन अभी तक यह पूरे रेल नेटवर्क के दो प्रतिशत से कुछ ही ज्यादा को कवर करता है। इस बार रेलवे का बजट 262 लाख करोड़ रुपये का है और इसमें 1113 करोड़ कवच के लिए आवंटित किये गये हैं।
आज के अखबारों में पहले पन्ने पर बजट पर चर्चा की सबसे अच्छी खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में है। इसमें किसने क्या कहा और जवाब में वित्त मंत्री ने क्या कहा वह सब अलग-अलग है। इनमें सबसे दिलचस्प भाजपा नेता बिपलब देब का बयान है। हिन्दी में यह कुछ इस तरह होगा – “कांग्रेस की (कुमारी) शैलजा जी ने कहा कि यह ‘कुर्सी बचाओ बजट’ है …. इसका मतलब है कांग्रेस को बिहार और आंध्र प्रदेश की जरूरत नहीं है”। इस ‘मतलब’ पर मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं कहूंगा बल्कि यह बताना चाहूंगा कि भाजपा नेता सुरेश नखुआ की शिकायत पर दिल्ली की एक अदालत ने यू ट्यूबर ध्रुव राठी के खिलाफ समन जारी किया है। राठी ने नखुआ को कथित रूप से वायलेंट और एब्यूजिव ट्रोल (हिंसक और गालीबाज) कहा था। इसपर नखुआ ने अवमानना का मामला दायर किया है। समन की खबर पर कल ध्रुव ने एक्स पर कहा है, (अनुवाद मेरा) भाजपा के एक अंकल ने मेरे खिलाफ 20 लाख रुपये का कोर्ट केस दायर किया है क्योंकि मैंने उन्हें गालीबाज कहा।
आगे वे सवाल करते हैं, क्यूं इतनी बेइज्जती कराने का शौक है इनको अब इन अंकल की पूरी एब्यूजिव हिस्ट्री (गालीबाजी का इतिहास) दोबारा सार्वजनिक होगी। ऊपर के दो उदाहरणों से मैं भाजपा के लोगों का बचाव, उसका स्तर और कार्यशैली बताना चाहता हूं। बजट पर आरोपों और जवाब की खबर का हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, “विपक्ष ने बजट की प्राथमिकताओं की आलोचना की तो सदन में भिड़ंत”। इसमें राज्यसभा और लोकसभा के अध्यक्षों की भूमिका भी रेखांकित हो गई। राज्यसभा में अपनी बात रखते हुए मल्किार्जुन खरगे ने कह दिया माताजी बोलने में एक्सपर्ट हैं। टेलीविजन प्रसारण में जो दिख रहा था उसके अनुसार धनखड़ चाहते थे कि खरगे अपनी बात पूरी करें और वित्त मंत्री को बोलने (जवाब देने) का मौका दें। इसपर खरगे वित्त मंत्री के लिए माताजी कह गये। इसके कारणों या उपयुक्तता अथवा अनुचित होने पर गये बगैर मेरा मानना है कि धनखड़ को कोई टिप्पणी (बिना ध्यान दिलाये, अपनी ओर से) करने की जरूरत नहीं थी। पर वे यह कहते हुए सुने गये, वह आपकी बेटी की उम्र की हैं।
मुझे लगता है कि यह वित्त मंत्री का अनावश्यक बचाव है, खरगे को अपनी बात पूरी करने से रोकने का प्रयास तो है ही। निर्मता सीतारमन खरगे की बेटी के बराबर हों भी तो माताजी की उम्र भी है। इसलिए, खरगे ने जो कहा वह गैरजरूरी भी हो तो उपराष्ट्रपति ने जो कहा वह कत्तई जरूरी नहीं था। मैं इसकी चर्चा नहीं करता अगर यह अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं होता। बेशक यह खबर है और उल्लेखनीय है। पर इससे यह भी पता चलता है कि धनखड़ खरगे को बोलने नहीं दे रहे थे। लेकिन खबर में इसका जिक्र नहीं है। उल्टे ऐसा लग रहा है जैसे खरगे का ‘माताजी’ कहना बहुत ही अनुचित था और धनखड़ ने कोई नई बात बताई या ऐसी बात बताई जिसका अहसास खरगे को नहीं था जबकि जो हुआ उससे ऐसा कुछ पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है। आज के समय और राजनीति में यह ऐसी बात भी नहीं है कि इसे इतना महत्व दिया जाये।
लोकसभा में बजट पर अपनी बात रखने के लिए अभिषेक बनर्जी ने नोटबंदी का जिक्र किया तो लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा, “माननीय सदस्य, 2016 बीत गया। 2019 का चुनाव भी हो गया। अब इस बजट पर बात कीजिए।” इस पर बनर्जी चुप नहीं हुए और नोटबंदी कैसे फेल हुई और लोग कैसे लाइनों में लगकर मरते रहे, इसकी बात करने लगे। इसपर सत्ता पक्ष के लोगों ने शोर-शराबा शुरू कर दिया। तब स्पीकर ने अभिषेक बनर्जी को फिर से बजट पर बात करने के लिए कहा। इस पर पलटवार करते हुए अभिषेक बनर्जी ने कहा कि जब भाजपा सांसद नेहरू की बात कर रहे थे, तब आप चुप थे और जब मैं नोटबंदी की बात कर रहा हूं तो आपको चुभ रहा है। (लाइव हिन्दुस्तान से)
निर्मला सीतारमन ने जो कहा वह हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है और लीड के साथ तीन कॉलम में दो लाइन के शीर्षक की तरह छपा है, “बजट में सहयोगियों के लिए सौगात के आरोप पर वित्त मंत्री ने कहा कि प्रत्येक राज्य का नाम नहीं ले सकती”। यहां तृणमूल कांग्रेस सांसद अभिषेक बनर्जी की बातों और दलीलों का उल्लेख किया जाना चाहिये। उन्होंने बजट को “जनविरोधी” और “दो राजनीतिक दलों को रिश्वत देने तथा सरकार गिरने से पहले कुछ समय पाने” के लिए बनाया गया कहा। “…उन्होंने (भाजपा ने) बंगाल को 100 दिन के काम और आवास योजना के लिए पैसा कब और कितना दिया? अगर वे 10 पैसे भी साबित करने में सक्षम हुए, तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा। मैंने 1000 बार कहा है कि उन्हें श्वेत पत्र लाना चाहिए और बताना चाहिए कि क्या उन्होंने इन तीन वित्तीय वर्षों में बंगाल को 10 पैसे भी दिए हैं…।”
वित्त मंत्री का इंटरव्यू और पक्ष प्रचार
टाइम्स ऑफ इंडिया ने इंडेक्सेशन बेनिफिट हटाने पर सरकार की सफाई को लीड बनाया है और यह वित्त मंत्री की अखबार से विशेष बातचीत पर आधारित है। इस खबर के साथ बताया गया है कि इंटरव्यू अंदर के पन्ने पर है। लीड का इंट्रो भी बजट पर सबसे प्रमुख आरोप का जवाब है, “आंध्र प्रदेश से वादा पूरा किया, बिहार की बाढ़ विभीषिका दूर करने की कोशिश की”। बिहार में बाढ़ की विभीषिका आज की नहीं है और दस साल उसपर ध्यान नहीं दिया गया। अब जब नीतिश के समर्थन से सरकार चल रही है तो उसे दूर करने की कोशिश की गई है और यह कोशिश इस तथ्य के बावजूद की गई है कि बिहार में हाल में कई पुल बह गये हैं। अगर पुल बह रहे हैं तो बाढ़ की विभीषिका कैसे और कितनी रुकेगी यह तो बाद की बात है। इस साल के बजट में इसका प्रावधान समर्थन की कीमत है। यह आरोप दमदार लगता है। आंध्र प्रदेश की स्थिति बिहार जैसी नहीं है पर समर्थन की कीमत मांगी गई और मिल गई। बहुतों को नहीं मिला यह अपनी जगह सही है। जिसे मिला उसे क्यों मिला यह दावा और आरोप तो अलग हो ही सकता है।
इसके अलावा, आज की बड़ी खबरों में जम्मू कश्मीर में एक सैनिक और एक आतंकवादी के मारे जाने की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर नेपाल विमान दुर्घटना में 18 लोगों के मारे जाने की खबर को लीड बनाया है और दूसरी खबर एक सैनिक के शहीद होने की है। दो कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, जम्मू कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में वृद्धि से जुलाई महीने में 11वें सैनिक की मृत्यु हुई। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है, “कुपवाड़ा में सैनिक, आतंकवादी की मौत”। द हिन्दू में एक और खबर सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक है, नई प्रौद्योगिकियों को अपना कर यूपीएसएसी परीक्षाओं को नये सिरे से दुरुस्त करेगा। आज की ऐसी खास खबरों में एक, टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर चार कॉलम का बॉटम है। इसके अनुसार कॉलेज यूनिवर्सिटी के दाखिले के लिए एनटीए द्वारा आयोजित की जाने वाली परीक्षा सीयूईटी के नतीजे अभी तक नहीं आये हैं जबकि परीक्षा मई में ही हुई थी।
किसानों का मामला अमर उजाला में लीड है। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, अभी नहीं खुलेगा शंभू बॉर्डर। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, सरकारों व किसानों में विश्वास की कमी, बातचीत से निकालें समाधान। इसी खबर का शीर्षक हिन्दुस्तान टाइम्स में जो है वह हिन्दी में इस तरह होगा, सुप्रीम कोर्ट ने किसानों और सरकार के बीच भरोसे की कमी को रेखांकित किया। ऐसे में एक बड़ी खबर सिर्फ टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है, एमएसपी को लेकर किसान राहुल के पांस पहुंचे। इस खबर के अनुसार शंभू बॉर्डर पर विरोध कर रहे किसान संगठनों के प्रतिनिधि बुधवार को संसद भवन में राहुल गांधी से मिले। और अपील की कि लोकसभा में इंडिया समूह की बढ़ी ताकत का उपयोग करते हुए उनकी मांगों को जोर देते हुए उठायें। खासकर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर लीगल गारंटी के मुद्दे को।


