अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
सीजफायर पर भावना नहीं, समझदारी से सोचें : सीजफायर कमज़ोरी की नहीं, रणनीतिक उद्देश्य के पूरे हो जाने की निशानी है। अगर मकसद यह था कि LOC पार आतंकवादी लॉन्च पैड्स को तबाह करना है, तो वो काम पूरा हो गया।
भारतीय सेना ने पाक में घुसकर मारा, और ये कोई पहली बार नहीं हुआ — सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट भी यही बता चुके हैं कि भारत अब सिर्फ बातों तक सीमित नहीं है।
हालांकि सोशल मीडिया पर कुछ लोग सीजफायर को लेकर तरह-तरह के आरोप लगा रहे हैं – कोई कह रहा है कि भारत डर गया, कोई कह रहा है कि अमेरिका के दबाव में झुक गया, तो कोई मान रहा है कि पाकिस्तान और चीन ने मिलकर भारत को ‘झुका’ दिया। यहां भावना नहीं बल्कि थोड़ा ठहरकर समझदारी से सोचना चाहिए।
चीन-पाक गठजोड़ की बात करने वाले भूल जाते हैं कि चीन की आर्थिक हालत अभी खस्ता है और पाकिस्तान की हालत तो हम सभी जानते हैं — IMF की दया पर चलने वाला देश, जिसके पास युद्ध लड़ने की न आर्थिक ताकत है, न जनमत।
और रही बात अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय दबाव की — तो ये दुनिया का सामान्य डिप्लोमैटिक तरीका होता है कि मकसद पूरा होने के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर सीजफायर कर लिया जाए।
लेकिन किसी ने भारत से यह तो नहीं कहा है कि आतंकवादी घटना अगर दोबारा हुई तो खुद को डिफेंड मत करो। भारत ने इस बार न सिर्फ सीमा पार जाकर खुद को डिफेंड किया बल्कि प्री-एंप्टिव स्ट्राइक करके साफ संदेश दे दिया कि आतंक का मतलब है कार्रवाई — चाहे वो सीमा के इस पार हो या उस पार।
ये लड़ाई सीमा पर गोली चलाने की नहीं, मनौवैज्ञानिक दबाव की है। और वो काम भारत ने बखूबी कर दिया — दुनिया को ये दिखाकर कि आतंक के मुद्दे पर हम चुप नहीं बैठेंगे।
तो अगली बार जब कोई कहे कि “भारत ने झुककर सीजफायर किया”, तो सिर्फ इतना पूछिए — “तो फिर पाकिस्तान के आतंकवादी कैंप किसने और कैसे तबाह कर दिए?”
भारत ने लक्ष्य साधकर किया है युद्ध विराम !
सीजफायर को लेकर जो बहस चल रही है, उसमें एक चीज़ लोग मिस कर रहे हैं — परिणाम।
भारत ने इस ऑपरेशन में क्या हासिल किया?
प्वाइंट 1: आतंकवादी लॉन्च पैड्स और ठिकाने LOC पार जाकर तबाह किए गए। ये प्रूव किया गया कि भारत सिर्फ वॉर्निंग नहीं देता, एक्शन भी लेता है। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट के बाद ये तीसरी बड़ी कार्रवाई थी — और इस बार बिना शोर, सीधा वार।
प्वाइंट 2: पाकिस्तान ने दुनिया से कहा कि भारत ने सीमा पार हमला किया, लेकिन खुद इस मामले को संयुक्त राष्ट्र नहीं ले गया। क्यों? क्योंकि इस बार भारत ने सबूत को लेकर पाक के सवाल के लिए कोई जगह ही नहीं छोड़ी। जो दिखाना था, वो भारतीय हमले के बाद पूरी दुनिया को मलबे और आतंकियों के लीडर्स के विलाप में दिख गया।
प्वाइंट 3: भारत ने अमेरिका और UNSC को पहले ही ब्रीफ कर दिया था — मतलब यह हमला ‘surprise’ नहीं था, बल्कि एक well-informed strategic step था। यही वजह है कि किसी भी देश ने भारत की आलोचना नहीं की।
प्वाइंट 4: इसके तुरंत बाद सीजफायर घोषित किया गया — ये बताने के लिए कि मकसद युद्ध नहीं, संदेश देना था। अगर भारत कमजोर होता, तो क्या पाकिस्तान शांति के लिए राज़ी होता? नहीं। पाकिस्तान तब मानता है जब उसे झटका लगता है — और वो झटका इस बार सीधा कैंपों पर पड़ा।
प्वाइंट 5: चीन की बात करें — उसका रुख दिखावटी रहा। भारत को घेरने की कोशिश की, लेकिन LAC पर खुद बचाव की मुद्रा में है। उसकी इकोनॉमी नकली सोने की तरह है — खोखली चमक।
प्वाइंट 6: दुनिया भर में भारत की छवि अब “संतुलित शक्ति” की बन रही है — जो हमला भी कर सकती है, और संयम भी रखती है। यही वजह है कि फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत को अब अकेले क्षेत्रीय ताकत नहीं, वैश्विक खिलाड़ी मानते हैं।
अब असली सवाल — ये सब भारत ने कैसे किया?
- सैन्य ताकत से — बिना सीमा तोड़े, आतंक के खिलाफ सटीक वार।
- कूटनीति से — पहले अंतरराष्ट्रीय ब्रीफिंग, फिर कार्रवाई, फिर शांति।
- मनोवैज्ञानिक बढ़त से — पाकिस्तान को खुद ये दिखाना पड़ा कि वो “शांति” चाहता है।
यह रणनीति है, न कि मजबूरी।
तो जब अगली बार कोई कहे कि भारत ने सीजफायर करके कमजोरी दिखाई, तो उससे इतना पूछिए:
“कमजोर देश LOC पार जाकर सर्जिकल प्रिसिजन से आतंकवादी ठिकाने तबाह कर सकते हैं क्या?”
पाकिस्तान का पुराना खेल है कि किसी भी तरह तीसरे पक्ष को कश्मीर में घसीट लाओ…
इस बार फर्क ये है कि भारत ने उसे वही करके जवाब दिया है, जो वो सबसे ज़्यादा डरता है — unilateral action।
अब ट्रंप जो भी बोलें, उससे फर्क नहीं पड़ता — भारत ने इस बार पहले से सबको ब्रीफ किया, कार्रवाई की, और फिर शांति दिखाई। भारत ने न संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाया, न अमेरिका से मध्यस्थता मांगी। और यही भारत की ताकत है — कोई कुछ बोले, भारत अब करता वही है जो उसे सही लगता है।
रही बात ट्रंप की भाषा की — तो ध्यान दीजिए, उन्होंने दोनों देशों की लीडरशिप को एक ही लाइन में रखा, और यह कोई नई बात नहीं है। दुनिया के हर नेता को कूटनीतिक भाषा में सबको ‘credit’ देना पड़ता है — यह कोई पाकिस्तान की जीत नहीं,
बल्कि भारत की तरफ से तय एजेंडे को ग्लोबल समर्थन दिलाने की चतुराई है।
इस ऑपरेशन से भारत ने क्या हासिल किया, वो ज़मीन पर दिख रहा है — टेरर कैंप उड़ गए, पाक सफाई दे रहा है, और दुनिया खामोश है। एक्शन का असर किसे लगा। इस बार वो असर सीधा पाकिस्तान को लगा।
मिथिलेश धर दुबे-
मोदी जी का मास्टर स्ट्रोक और वे ‘बेचारे’ : और कुछ हो या ना हो, लेकिन सीजफायर पर सहमति के बाद मोदी सरकार ने अपने अंध भक्त और अंध विरोधियों को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है। बेचारे समर्थक पहले कराची में नाश्ता और सीधे लाहौर जाकर लाहौरी जीरा का स्वाद लेने का ख्वाब देख रहे थे। लेकिन अब चूंकि ठहरे अंध भक्त, तो उन्होंने अपनी सरकार की तरह पलटी मारते हुए तत्काल प्रभाव से अपनी सोच बदली और अब बेचारे युद्ध से होने वाले नुकसान की बात कर रहे हैं। इन्हें अब जिम्मेदारी सौंप दी गई है अगले चुनाव तक रील बनाकर ये बताते रहना है कि कैसे पाकिस्तान ने गिड़गिड़ाते हुए मोदी सरकार के सामने घुटने टेक दिये और सीजफायर की भीख मांगी। बीच-बीच में गेम वाले वीडियो भी आपलोड करते रहना है। बेचारे भक्त।
उधर बेचारे अंधविरोधी भी सांसत में हैं। पहले तो पहलगाम का बदला लेने की मांग कर रहे थे। कुछ मामला शुरू हुआ तो उन्हें लगा कि सरकार तो अगले चुनाव में इसका फायदा उठा लेगी तो भाई लोगों ने गांधी जी की शांति वाली तस्वीर लगाकर अहिंसा का बात शुरू कर दी। युद्ध से होने वाले नुकसान की बात करने लगे। और जब सरकार युद्ध रोकने पर सहमत हो गई तो बेचारे फिर फंस गये। इसके बाद तत्काल प्रभाव से इंदिरा जी की बढ़िया तस्वीर निकाली गई और अब बताया जा रहा कि एक इंदिरा जी थीं, जिन्हांने पाकिस्तान के दो टुकड़े करके ही दम लिया। अमेरिका की बात को अनसुना कर दिया था। आयरन लेडी। हिम्मती लेडी। फायर लेडी। और अब की कायर सरकार, डरपोक सरकार पीछे हट गई। कहां गया 56 इंच का सीना, आदि, आदि।
बहुत दुख है भा ई इस संसार में। भगवान सबको हिम्मत दे।


