पंद्रह बीस से ज्यादा दिशाओं में नरेंद्र मोदी सरकार का डंका बज रहा है। भारत में नित नए करतब दिखाते मोदी ईरान के चाबहार प्रोजेक्ट पर घिर गए हैं। विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी लपेटे में हैं। कहा जा रहा है कि भारत का 120 मिलियन डॉलर का चाबहार प्रोजेक्ट अमेरिका की धमकी के बाद मोदी सरकार छोड़कर भाग आई। सोशल मीडिया पर लोग तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं, उधर हिंदू भी जाग गया है और हिंदूहृदय सम्राट डमरूवादक को जमकर कोस रहा है।
आप बस आखिर तक टिप्पणियां और कमेंट पढ़ आइए….
अशोक कुमार पांडेय-
जिन एंकर्स के सामने चाबहार प्रोजेक्ट को ‘बहुत बड़ा काम’ बता कर प्रधानमंत्री दावा कर रहे थे कि ‘किसी तीसरे की नहीं सुनूँगा’, वे यह सवाल करने की हिम्मत रखते हैं-
‘किसी तीसरे के कहने पर 120 मिलियन डॉलर लुटाकर योजना से बाहर क्यों निकल आए?’
डॉ मुकेश कुमार-
साहेब बड़े-बड़े बोल बोल रहे थे। चाबहार पोर्ट के बारे में, मगर ट्रम्प की धमकियों के सामने हवा निकल गई। अब कुछ नहीं बोलेंगे।
जैसे गलवान पर चुप रहे, युद्ध विराम पर ट्रम्प के हमलों पर चुप रहे, मणिपुर पर चुप रहे, इस बार भी चुप रहेंगे। इनका यही कैरेक्टर है।
चाबहार भारत के लिए सामरिक और आर्थिक दोनों लिहाज़ से ज़रूरी था। लेकिन राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जिस तरह की समझ और साहस चाहिए वह वर्तमान नेतृत्व के पास नहीं है। वह एक धमकी में ही सरेंडर कर देता है।
रणविजय सिंह-
खबर है कि ईरान के चाबहार पोर्ट को मोदी सरकार ने छोड़ दिया है. इस पोर्ट पर देश के करीब 10,860,000,000 रुपए लगाए गए और ट्रंप के दबाव की वजह से इसे छोड़ दिया गया.
देश को 1086 करोड़ का नुकसान हो गया. अगर ये पैसे लोगों में बांटे जाते तो 1,08,600 लोगों को 1-1 लाख रुपए मिल जाते.
India may be trying to exit Chabahar project quietly, reports Economic Times. Acc to documents, India won its extension on sanctions waiver from US by promising to “wind up” operations.- सुहासिनी हैदर, संपादक, द हिंदू
पवन खेड़ा-
चाबहार कोई साधारण बंदरगाह नहीं है। यह भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ने वाला एक बेहद अहम और सीधा समुद्री मार्ग उपलब्ध कराता है, जिससे हम पाकिस्तान को दरकिनार कर सकते हैं और चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का प्रभावी जवाब दे सकते हैं।
ऐसे में यह सुनना कि अमेरिका के दबाव की पहली आहट पर ही भारत ने चाबहार से बिना किसी ठोस कारण के पीछे हटने का फैसला कर लिया, इस सरकार की विदेश नीति के संचालन में अब तक का सबसे निचला स्तर दर्शाता है। आखिर कब तक भारत सरकार वॉशिंगटन को हमारे राष्ट्रीय हित तय करने देने वाली है?
इसलिए सवाल चाबहार बंदरगाह या रूसी तेल का नहीं है। असली सवाल यह है कि मोदी सरकार अमेरिका को भारत पर दबाव बनाने और उसे झुकाने की इजाज़त क्यों दे रही है?
डॉ रागिनी नायक-
“चाबहार पोर्ट का मेरा फाइनल एग्रीमेंट हुआ है- ये इकोनॉमी का बहुत बड़ा काम हुआ है” मोदी जी गाल बजा रहे थे और उनके पत्रकार बंधु दांत दिखा रहे थे!
अब इनमें से कोई पूछेगा कि Narender ने ट्रंप के आगे फिर Surrender करते हुए ‘चाबहार पोर्ट’ का control क्यों छोड़ दिया? इस project में देश के जो 120m$ लगे थे, उनकी बर्बादी की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
अपूर्व भारद्वाज-
- ट्रंप ने कहा ब्रिक्स छोड़ दो….. छोड़ दिया
- ट्रंप ने कहा चाबहार पोर्ट छोड़ दो…… छोड़ दिया
- ट्रंप ने कहा रूस से तेल खरीदना छोड़ दो….. छोड़ दिया
- ट्रंप ने कहा आपरेशन सिन्दूर छोड़ दो…. छोड़ दिया
नाम है विश्वगुरु उर्फ छोडूं….
आवेश तिवारी-
एक बेहद छोटा सा उपनिवेश ग्रीनलैंड जिसकी आबादी दिल्ली के किसी एक मोहल्ले जितनी होगी अमेरिका से नहीं डरता। वहीं हम दुनिया के नक्शे पर खुद को सबसे बड़ा लोकतंत्र कहने वाले 150 करोड़ की आबादी वाले लोग एक पगलेठ राष्ट्रपति की धमकी में आ कर आत्मसमर्पण कर दिए।
बिके हुए पत्रकारों के बड़ी-बड़ी डींगे हांकना अलग बात है विश्व के मानचित्र पर खुद को साबित करके दिखाना और देश एवं देशवासियों के सम्मान को बचाए रखना अलग बात।
विडंबना है कि देश के पीएम बार बार अपने ही कहे को झूठा साबित करते दिखते हैं। मैं नहीं जानता ऐसा दावा वो क्यों करते हैं? नेहरू तो दूर की बात हैं कम से कम अटल जी जितना स्वाभिमान ही बचा लेते। आज मन खराब हो गया।
चाबहार से बोरिया बिस्तर समेटने की बात तो छह महिने पहले ही तय हो चुका था….- केके चक्रवर्ती


आजतक के इस ट्वीट पर आए कुछ कमेंट भी पढ़ें…





