संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में चीन में भारत को मिली सफलता के किस्से तो खूब हैं पर गुड़गांव का जाम मुद्दा नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार जाम इतना जबरदस्त था कि 2017 का गुरुजाम याद आ गया जब लोग अपनी गाड़ी सड़क पर छोड़कर पैदल घर को निकल गये थे। इसी तरह, पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया और यह खबर द टेलीग्राफ में छोटी सी है। पेट्रोल में इथेनॉल की मिलावट सरकार की “एथनॉल ब्लेंडिंग” नीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त आय देना और प्रदूषण घटाना है। तकनीकी रूप से यह सही हो सकता है। इथेनॉल एक स्वच्छ बायोफ्यूल है और कई देशों में वर्षों से इसका उपयोग हो रहा है। लेकिन मूल सवाल यह है कि जब उत्पाद की प्रकृति बदली जा रही है—मसलन अब वह शुद्ध पेट्रोल नहीं, बल्कि मिश्रित ईंधन है—तो क्या उपभोक्ता को इसका लाभ नहीं मिलना चाहिए? इथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है, ऐसे में जब पेट्रोल में इसकी मिलावट 10% या 20% तक होती है तो पेट्रोल की कीमत में भी अनुपातिक कमी आनी चाहिए। यह वैसे ही है जैसे दूध में फैट के अनुसार कीमतें तय होती हैं। वहां तो ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार कम या ज्यादा फैट वाला दूध खरीदता है लेकिन यहां तो सबके लिए समान मिलावट है। यह फायदेमंद या नुकसानदेह हो सकती है — इसकी परवाह ही नहीं है। उपभोक्ता के लिए पेट्रोल या ईंधन भी एक उत्पाद ही है और यह दूध से अलग नहीं है। कीमत शुद्धता के आधार पर ही तय होना चाहिये वरना कृत्रिम जेवर की कीमत कम क्यों हो? यह दिलचस्प है कि मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा तो सरकार की ओर से इसे “लॉबी का प्रभाव” कहा गया और खबरों के अनुसार अदालत ने इसे स्वीकार कर अपील को खारिज भी कर दिया।
मुझे नहीं पता कि अपील क्या थी और फिर अपील हो सकती है कि नहीं लेकिन अखबार क्या कर रहे हैं? आम उपभोक्ता कहां जाये, किससे मदद मांगे? अखबार किसलिये होते हैं? वह भी तब जब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पारदर्शिता बनाए रखे और मिलावट उसका काम नहीं है। मिलावट से कमाना उसका मकसद नहीं हो सकता है। इसके बावजूद सरकार 2025 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिश्रण (ई20) का लक्ष्य लेकर चल रही है। कीमत कम नहीं करने के पीछ सरकार का तर्क है कि मिश्रण से होने वाली बचत को इन्फ्रास्ट्रक्चर, इथेनॉल उत्पादन और किसानों को सब्सिडी देने में लगाया जाता है। पर खबर है कि इससे केंद्रीय मंत्री के बेटे की कंपनी कमा रही है। दूसरी ओर, इथेनॉल मिले पेट्रोल से माइलेज कम होने, इंजन जल्दी खराब होने जैसी शिकायतें और शंकाएं हैं। सरकार ने उस मामले में भी आश्वस्त नहीं किया है। यहां अनलेडेड पेट्रोल (सीसा रहित पेट्रोल) बेचने के निर्णय का उदाहरण है। तब सरकार ने जो भी किया था पारदर्शिता के साथ और सबको सब कुछ पता था। तब उसका मकसद पर्यावरण की रक्षा करना था। सरकार ने 1990 के दशक में धीरे-धीरे अनलेडेड पेट्रोल पेश करना शुरू किया। उस समय, यह एक प्रीमियम उत्पाद था, और इसकी कीमत लेडेड पेट्रोल से अधिक थी। पर्यावरण के लिए लोगों ने इसे स्वीकार किया। अब पपर्यावरण के लिए इथेनॉल के उत्पादन से लाभ हो सकता है तो सरकार उसे खुद हजम करना चाहती है। पर्यावरण के लिए भारत में अब अनलेडेड पेट्रोल का ही उपयोग होता है। सरकार ने लेडेड पेट्रोल की बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया। यह 2000 के दशक की शुरुआत में हुआ था। कुल मिलाकर, पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के बाद भी कीमत कम न करना और गुणवत्ता पर पारदर्शिता न रखना गंभीर मुद्दा है। सरकार जो कर रही है, कर कर सकती हो तो भी अखबार और खबर?
मिलेनियम सिटी कहे जाने वाल गुरुग्राम और पहले के गुड़गांव में कल जबरदस्त जाम था। ड्रोन से आजकल जबरदस्त तस्वीर उतारी जा सकती है और वीडियो से स्क्रीन शॉट लिये जा सकते हैं। सोशल मीडिया में मैंने कल एक-से-बढ़कर एक वीडियो देखे। उनमें से कोई स्क्रीन शॉट आज अखबार के पाठकों के लिए भव्य और नया होता। गुरुग्राम के बारे में जान पाते वो अलग। लेकिन आज मेरे अखबारों में आमतौर से पहले पन्ने पर ऐसी कोई खबर या तस्वीर नहीं है जो बताये कि स्थिति सड़क पर गाड़ी छोड़कर किसी भी तरह घर पहुंचने की थी और ऐसा बारिश के कारण हुआ। वैसे भी आज कल किसी भी शहर में जरा सी बारिश से पानी भर जाना और कुछ लोगों की मौत आम बात हो गई है। विदेशी निवेश और गुड़गांव की सुविधाओं के कारण कई लोगों ने वहां घर खरीदे हैं, रहते हैं पर शहर (दिल्ली समेत) बहुत ही तकलीफदेह है। यह तकलीफ अखबार वाले भी झेलते और देखते हैं लेकिन खबर छापने में इतनी कंजूसी पहले नहीं दिखती थी। आज अखबारों की चिन्ता प्रधानमंत्री की चीन यात्रा लग रही है और उपयोगी व सुविधाजनक चीनी ऐप्प पर प्रतिबंध लगाया जाना मुद्दा ही नहीं है। इसी मई के आखिरी दिनों में प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘छोटी आंखों वाले गणेश जी भी विदेश से आ रहे…’। आजतक डॉट इन की एक खबर के अनुसार, उन्होंने बिना नाम लिए अमेरिका और चीन को सख्त संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ सैन्यबल के भरोसे नहीं बल्कि इसमें जनबल की भागीदारी होना भी जरूरी है।
पीएम मोदी ने कहा था, 2047 तक विकसित भारत बनाने और अर्थव्यवस्था को तत्काल चार से तीन नंबर पर ले जाने के लिए अब हम किसी विदेशी चीज का इस्तेमाल नहीं करेंगे। हमें गांव-गांव व्यापारियों को शपथ दिलवानी होगी कि विदेशी सामानों से कितना भी मुनाफा क्यों न हो, कोई भी विदेशी चीज नहीं बेचेंगे। उन्होंने कहा कि आज छोटी आंखों वाले गणेश जी भी विदेश से आ जाते हैं, गणेश जी की आंख भी नहीं खुल रही हैं। होली पर रंग और पिचकारी तक विदेशों से आ रहे हैं। सीधे तौर पर यहां पीएम मोदी का इशारा चीन की तरफ था, जिसके प्रोडक्ट त्योहारों पर भारतीय बाजारों में धड़ल्ले से बिकते हैं। अब मोदी जी की प्राथमिकता बदल गई है और ज्यादातर अखबारों ने उनके मन की बात की है। उदाहरण के लिए अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, एससीओ ने एक सुर में की पहलगाम हमले की निन्दा…. आतंक से लड़ाई में दोहरा मापदंड मंजूर। लगभग यही शीर्षक नवोदय टाइम्स का है। अबकी बार ट्रम्प सरकार के बाद प्रधानमंत्री ने कहा है और अखबारों ने शीर्षक बनाया है, भारत-रूस संबंध क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता के संबंध हैं। देशबन्धु ने अफगानिस्तान में भूकंप की खबर को लीड बनाया है। चीन में एससीओ की बैठक में नरेन्द्र मोदी ने जो कहा वह लीड है। शीर्षक है, आतंक पर दोहरा मापदंड मंजूर नहीं। हेडलाइन मैनेजमेंट करने वाली सरकार जब जरूरत के अनुसार विधेयक ले आती है और दूसरी खबर मिलने तक उसी को भुनाती रहती है तब ऐसे बयानों का कोई मतलब नहीं है जो सुर्खियों में रहने के लिए दिये जाते हैं। आप जानते हैं और यह सबको पता है कि ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया था और अचानक युद्ध विराम हो गया। इसकी घोषणा ट्रम्प ने की। ना कोई सवाल हुआ ना अभी तक कोई जवाब है। चीन ने अगर पाकिस्तान का साथ दिया तो उससे अब क्या उम्मीद की जा रही है और क्यों – इसकी चर्चा नहीं है। दोहरा मापदंड मंजूर नहीं है – यह प्रमुखता से है। किसे सच मानू? अगर कभी कहा गया होता कि चीन दूध का धुला है, राहुल गांधी वहां नहीं जाते हैं या वहां सोरोस नहीं है तो मैं मान लेता पर अभी मुश्किल है लेकिन यही और ऐसी ही खबरें लीड हैं।
चीन में एससीओ की बैठक में नरेन्द्र मोदी ने जो कहा वह लीड है लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, मोदी-शी-पुतिन जब महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चा में थे तो ट्रम्प ने टैरिफ का हमला फिर शुरू किया। जाहिर है, मामला भारत का ही नहीं है और सिर्फ भारत से बड़ा है। लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक भी प्रधानमंत्री को महान दिखाने वाला है। एससीओ में प्रधानमंत्री ने आतंकवाद का मुद्दा जोर-शोर से रखा, रणनीतिक संतुलन स्थापित किया। दूसरा शीर्षक भी ऐसा ही है — प्रधानमंत्री, पुतिन ने विशेष संबंधों की चर्चा की, यूक्रेन टकराव को खत्म करने के प्रयास। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, तियांजिन त्रोइका, हेलो ट्रम्प (तियांजिन में तीन विश्व नेताओं की बैठक, आप क्या सोच रहे हैं ट्रम्प साब)। बाकी शीर्षक वही सब है जो दूसरे अखबारों में है और मैंने पहले चर्चा की है। एक शीर्षक जो अलग है वह इस प्रकार है – “बदलाव : दो महीने पहले एससीओ ने पहलगाम को छोड़ दिया था, अब ‘दृढ़ता से निन्दा’ की है”। इंडियन एक्सप्रेस में एक और शीर्षक है जो दूसरे अखबारों में नहीं है। यह है, विपक्ष ने चेताया, पाकिस्तान-चीन की जुगलबंदी की याद दिलाई। कुल मिलाकर, इस मामले के कई पहलू हैं लेकिन अखबारों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को महान बनाने वाले शीर्षक ही प्रमुखता से छापे हैं।
उदाहरण के लिए, द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, एससीओ प्रमुखों ने पहलगाम में आतंकी हमले की दृढ़ता से निन्दा की। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक से अलग यहां उपशीर्षक है, इस घोषणा को सभी सदस्यों ने अपनाया और उसपर दस्तखत किये। इनलोगों ने एकतरफा अवपीड़क उपायों की भी आलोचना की। इनमें आर्थिक प्रकृति के उपाय शामिल हैं। दि एशियन एज ने इसे भारत के लिए बड़ी कामयाबी कहा है और लीड का शीर्षक है, भारत की बड़ी जीत : एससीओ ने पहलगाम में सीमा पार के आतंकी हमले की निन्दा की। द टेलीग्राफ की लीड और शीर्षक इंडियन एक्सप्रेस जैसा है। यह फ्लैग शीर्षक से स्पष्ट है। इसके अनुसार, मोदी, पुतिन और शी ने चाइना समिट में अपनी दोस्ती दिखाई, अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिल्ली से कहा, देर हो रही है। इससे संबंधित खबर दि एशियन एज में है। सिंगल कॉलम की इस खबर का शीर्षक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के हवाले से है। उन्होंने कहा है कि भारत ने (आयात पर) अपने टैरिफ (शुल्क) में किसी कटौती की पेशकश नहीं की है। पर देर हो रही है। द टेलीग्राफ के फ्लैग शीर्षक के तहत दो मुख्य खबरें हैं। इनमें पहली का शीर्षक है, चीनी मेजबानी से कुढ़े ट्रम्प। दूसरी खबर का शीर्षक है, आतंकवाद पर एससीओ की संतुलन बनाने की कार्रवाई। आप समझ सकते हैं कि अमेरिका से दोस्ती का प्रचार करने वाले भारतीय राष्ट्रपति चीन के खिलाफ थे, चीनी सामान पर प्रतिबंध लगाया था। चीन से सीमा विवाद भी चल रहा था भले वह एकतरफा था। फिर ऑपरेशन सिन्दूर आया, अचानक युद्ध विराम हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति को जो कहना था कहते रहे, करते रहे। टैरिफ लागू हो गया। इससे समस्या निर्यातकों को थी पर सरकार और प्रचारक स्वदेशी का मंत्र देने लगे। इस बीच चीन में एससीओ हुआ। विश्व शक्तियां जुटीं। फिर जो हुआ उसकी खबर आज है और आप देख सकते हैं कि देश के ज्यादातर अखबार भारत के यू-टर्न से बेपरवाह उसकी मजबूत स्थिति पर खुशी जता रहे हैं। ऐसे में राहुल गांधी की यह घोषणा कि, देश को वोट चोरी की सच्चाई पता चलने जा रही है, पहले की खबरों और खुलासे के आलोक में दिल दहलाने वाली है। एक और खबर है, तेजस्वी यादव ने अधिकारियों को दी चेतावनी। पर यह खबर दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


