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ध्रुव राठी पर एफआईआर की ये खबरें अघोषित इमरजेंसी की गोदी पत्रकारिता के उदाहरण हैं

संजय कुमार सिंह

आज जब उपचुनाव के नतीजों की खबर है और ज्यादातर अखबारों की लीड वही है तब इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कथित पलटवार को लीड बनाया है। अमर उजाला के अनुसार, आठ करोड़ रोजगार ने झूठी धारणा गढ़ने वालों की बोलती की बंद। पीएम ने कहा, देश की जनता उनके हर झूठ और प्रपंच को नकार रही है। चार कॉलम की इस लीड के ऊपर अमर उजाला में ही छपा है, विपक्षी गठबंधन ने दिखाई ताकत, भाजपा को नुकसान। इसके बावजूद प्रधानमंत्री ने कहा है कि देश की जनता उनके (झूठी धारणा गढ़ने वालों) हर झूठ व प्रपंच को नकार रही है। इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में बताया है कि प्रधानमंत्री मुंबई दौरे पर थे, 29 हजार करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन किया और विपक्ष पर यह कहते हुए पलटवार किया कि इंफ्रा (आधारभूत संरचना) परियोजनाओं में वृद्धि की रफ्तार बढ़ाई गई है इसलिए ज्यादा रोजगार मिलेंगे। प्रधानमंत्री ने कहा है तो यह खबर है ही पर आज जब सभी अखबारों ने चुनाव नतीजे की खबर को लीड बनाया है तो इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला की यह लीड रेखांकित करने लायक है

नतीजों पर राहुल गांधी की टिप्पणी को द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने पर अपना कोट बनाया है। यह इस प्रकार है, सात राज्यों में हुए उपचुनावों की खबर से यह स्पष्ट हो गया है कि भाजपा ने भय और भ्रम का जो जाल बुन रखा है वह टूट गया है। अमर उजाला की खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री ने कहा है, जब कहीं पुल या रेलवे ट्रैक बनता है, सड़क बनती है, तो किसी न किसी को रोजगार मिलता ही है। मुझे लगता है कि यह बात पकौड़ा रोजगार की ही तरह है और तब उसकी जितनी आलोचना हुई थी उसपर ध्यान दिया होता तो आज फिर ऐसी बात करने का कोई मतलब नहीं है। परियोजनाएं जरूरत के अनुसार बनती हैं और बनती रहती हैं। धन की उपलब्धता और दूसरे कारणों से उसमें तेजी और मंदी भी आती है, उसमें रोजगार की संभावना भी होती है पर वह रोजगार देने का तरीका नहीं है। ना ही रोजगार के मौके बनाने के सामान्य तरीकों का विकल्प है। बहुत बड़ी और मंहगी परियोजना में नौकरी की संभावना बहुत कम पैसों से शुरू किये जा सकने वाले व्यवसाय के मुकाबले कम हो सकती है। यही नहीं, परियोजना पूरी हो जाये तो रोजगार के मौके भी खत्म हो जायेंगे जबकि व्यवसाय चलता रह सकता है और नौकरी स्थायी होती है। इसे समझना मुश्किल नहीं है। मुझे नहीं लगता है प्रधानमंत्री के कहने या अखबारों में प्रमुखता मिलने से लोगों की समझ बदल जायेगी पर प्रधानमंत्री नहीं बदले हैं यह तो तय है।

भले नीतिश कुमार और चंद्र बाबू नायडू यह प्रचार करें कि वे अपने राज्यों के लाभ के लिए मोदी सरकार को समर्थन दे रहे हैं या बैसाखी बने हुए हैं। महाराष्ट्र में चुनाव है और वहां 29,000 करोड़ की परियोजनाओं का उद्घाटन निश्चित रूप से वहां के लोगों का दिल जीतने की कोशिश है और रोजागर का यह प्रचार भी उसी के लिए होगा और जाहिर है चुनाव नतीजे पक्ष में नहीं आने का असर उनकी राजनीति पर नहीं पड़ा है। अमर उजाला के पहले पन्ने की खबरों में आज एक खबर है, बिरला की बेटी पर पोस्ट में यू ट्यूबर ध्रुव राठी पर केस। यह सही है कि केस हुआ है। लेकिन यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला है। इसलिए ऐसी खबरों के मामले में अखबारों का काम है कि वे सतर्क रहें और जनहित में काम करें। ठीक है, कि पोस्ट आपत्तिजनक हो तो कार्रवाई हो सकती है, होनी चाहिये। पर जब सरकार 49 साल पहले की इमरजेंसी की ज्यादतियों के लिए संविधान हत्या दिवस मनाने की घोषणा कर रही है, अमर उजाला ने कल उसे लीड बनाया था तब अखबारों का काम है कि वे इस सरकार के काम पर नजर रखें और जब इमरजेंसी नहीं लगी है तब ध्यान रखें कि इमरजेंसी जैसी ज्यादती न हो और हो तो उसे सामने लाया जाये।

कहने की जरूरत नहीं है कि लोकसभा चुनाव से पहले के अपने सरकार विरोधी वीडियो के लिए ध्रुव राठी सरकार और सरकार समर्थकों के निशाने पर रहा है। उसे परेशान करने और फंसाने के तरीके ढूंढ़े जा रहे होंगे और मिल जायें तो फंसाना भी ठीक हो सकता है। पर जिस मामले में एफआईआर हुई है वह उसके अकाउंट से नहीं किया गया है, उसने नहीं किया है। उसके नाम से चलाये जाने वाले किसी पैरोडी अकाउंट से हुए ट्वीट में गलत या असत्य सूचना है। इसके लिए कार्रवाई उसपर की जानी चाहिये जो ध्रुव राठी के नाम से अकाउंट चलाता है न कि ध्रुव राठी के खिलाफ। वैसे भी उसने माफी मांग ली है और ट्वीट डिलीट कर दिया है। जो तथ्य इस ट्वीट या इस अकाउंट से प्रचारित किया गया था वह गलत तथ्य इंटरनेट पर पहले से मौजूद है, चर्चा में रहा है और खबरें भी दिखती रही हैं। ऐसे में किसी ने उसपर भरोसा कर लिया तो यह अपराध नहीं है भले खबर हो। कल सोशल मीडिया पर सारी बात आ चुकी है। वैसे भी, सामान्य तरीका है कि जिसके खिलाफ खबर छापी जाये उसका पक्ष लिया जाये। अब यह काम और आसान हो गया है। संबंधित व्यक्ति या हस्ती का सोशल मीडिया अकाउंट देख लिया जाये तो पक्ष मिल जाता है। ध्रुव राठी ने कल ही इसपर अपना पक्ष रख दिया था और यह खबर उसके बाद की तो नहीं ही है और बासी तो है ही।

एफआईआर की खबर कल टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी थी और उसी में लिखा था एक्स हैंडल ध्रुव राठी पैरोडी से ट्वीट किया गया है। इसीलिए ध्रुव ने अपना ट्वीट टाइम्स ऑफ इंडिया को टैग करके लिखा था, आपका अखबार पहले पन्ने पर मेरे बारे में फेक न्यूज क्यों फैला रहा है? लीजिये अपनी आंखों का उपयोग कीजिये और देख लीजिये कि कथित पोस्ट किसी पैरोडी ट्वीटर अकाउंट से किया गया है। मेरा इससे कोई लेना-देना नहीं है। इस लिहाज से आज की खबर में यह तथ्य होना ही चाहिये था कि ध्रुव राठी ने कहा है कि उसका संबंधित ट्वीट से कोई लेना-देना नहीं है। यह मूल खबर में भी था फिर भी एफआईआर ध्रुव राठी के खिलाफ हुई है। और यह पैरोडी अकाउंट के लिये है। इस तरह तथ्यों के साथ ध्रुव राठी को बदनाम करने का लक्ष्य साधा जा सकता था पर अभी तो इरादा समझ में आ रहा है।

आज नवोदय टाइम्स में सिंगल कॉलम की एक खबर है, कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने शनिवार को मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि स्पाईवेयर से उनके फोन की जासूसी हो रही है। यह पर्याप्त गंभीर आरोप है और न सिर्फ असंवैधानिक है, निजता का हनन भी है। मुझे लगता है कि इमरजेंसी हत्या दिवस की खबर छापने वालों के लिए यह खबर ज्यादा महत्वपूर्ण है और उन्हें बताना चाहिये कि सरकार ने पेगासस खरीदा है कि नहीं। आप जानते हैं कि आईफोन ने अपने ग्राहकों को अलर्ट किया तो खबर थी कि सरकार ने आईफोन पर अलर्ट संशोधित करने के लिये दबाव डाला, कई लोगों के मामले में भिन्न कारणों से यह शक है सरकार उनकी जासूसी करा रही है। यही नहीं जासूसी का इजराइली, पेगासस सॉफ्टवेयर सिर्फ सरकार को बेचा जाता है और भारतीय नागरिकों की जासूसी उससे हो रही है तो सरकार को बताना चाहिये कि यह जासूसी वही करवा रही है या किसी और देश से हो रहा है। पर स्थिति यह है कि सरकार ने ना तो पेगासस खरीदना स्वीकार किया है और ना इनकार किया है। ऐसे में जब कोई विपक्षी नेता उससे जासूसी का आरोप लगाये तो उसका मतलब है। अमर उजाला में यह खबर नहीं है और नवोदय टाइम्स में ध्रुव राठी वाली खबर नहीं है और यह दोनों अखबारों की पत्रकारिता का अंतर है भले दोनों के लीड एक होते हों। हालांकि, आज तो वह भी अलग है। आज इमरजेंसी की याद दिलाने वाली एक और खबर है। यह जम्मू औऱ कश्मीर में उपराज्यपाल को ज्यादा अधिकार दिये जाने से संबंधित है। द टेलीग्राफ ने इसे जम्मू और कश्मीर चुनाव से पहले, एक समझी जा सकने वाली कार्रवाई कहा है। आप जानते हैं कि 2019 में राज्य में लागू अनुच्छेद 370 हटा दिये गये थे तब से राज्य में विधान सभा और स्थानीय निकाय चुनाव नहीं हुए हैं। हाल में लोकसभा चुनाव जरूर हुए पर भाजपा ने कई सीटों पर उम्मीदवार ही नहीं उतारे और उस समय एक राज्य को बांट कर दो केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था। उसका फायदा चाहे जो हुआ चुनाव नहीं हो पाये हैं और जो हुए उसमें ज्यादातर में भाजपा लड़ नहीं पाई। इसके बावजूद अब जब चुनाव करीब हैं (सुप्रीम कोर्ट का आदेश और भाजपा का प्रचार दोनों है) तो यह कार्रवाई खासतौर से महत्वपूर्ण है। नवोदय टाइम्स में छपी खबर के अनुसार विपक्षी दलों ने इसे लोकतंत्र की हत्या कहा है। अमर उजाला में छपी इस खबर के अनुसार, जम्मू कश्मीर में तबादले और पोस्टिंग के लिए अब एलजी की मंजूरी जरूरी होगी और विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने दिल्ली के एलजी जैसी शक्तियां बढ़ाने वाली धाराएं जोड़ी हैं। आप जानते हैं कि दिल्ली में निर्वाचित सरकार के मुख्यमंत्री जेल में हैं और केंद्र की भाजपा सरकार मनोनीत उपराज्यपाल के जरिये सरकार चला रही है। अब अमर उजाला की खबर के शीर्षक के अनुसार, जम्मू कश्मीर में भी यही होगा – सरकार कोई हो, ताकत एलजी के पास।

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