
अविनाश दास-
धरती के इस हिस्से में हाल ही में एक अद्भुत आविष्कार हुआ है। इसका नाम है फ़िल्मी राष्ट्रवाद। यह असली राष्ट्रवाद से कहीं ज़्यादा सुरक्षित है क्योंकि इसमें मरना नहीं पड़ता, बस ताली बजानी पड़ती है।
इस आविष्कार का ताज़ा नमूना धुरंधर नामक फ़िल्म है। भारत में इसे देखकर लोग अपने गाल बजा रहे हैं। पाकिस्तान में इसे देखकर लोग अपने दांत पीस रहे हैं। दोनों तरफ़ लोग इतने व्यस्त हैं कि किसी को यह पूछने का वक़्त नहीं कि फ़िल्म है क्या।
फ़िल्म में दुश्मन बड़ा बुरा है। यह बात दर्शक को पहले मिनट में समझा दी जाती है, ताकि उसे सोचना न पड़े। सोचने से राष्ट्रवाद में गैस बनती है।
भारत में लोग कह रहे हैं, “हमने उनको दिखा दिया।”
पाकिस्तान में लोग कह रहे हैं, “इन्होंने झूठ दिखाया।”
दोनों बिल्कुल सही हैं। क्योंकि फ़िल्म का काम सच दिखाना नहीं, संतोष देना है। और संतोष सबसे आसानी से तब मिलता है जब कोई और ग़लत हो।
दोनों देशों में मीम बन रहे हैं। दोनों देशों के मीम एक-दूसरे को ऐसे देख रहे हैं जैसे दो भूखे आदमी एक ही हड्डी को राष्ट्र समझ बैठे हों।
यह बड़ा दिलचस्प है कि जिन देशों में असली युद्धों ने कब्रें भर दीं, वहां आज फ़िल्मी युद्धों ने व्हाट्सएप भर दिये हैं। अब कोई सैनिक नहीं मरता, सिर्फ़ टिप्पणी मरती है। और मरने के अगले मिनट टिप्पणी पुनर्जन्म ले लेती है।
राष्ट्रवाद अब फुटबॉल बन चुका है। एक गोल भारत का। एक गोल पाकिस्तान का। और रेफरी वही मीडिया है, जो हर बार सीटी बजाकर कहता है, “बहस जारी रहेगी।”
दर्शक कहते हैं, “नहीं, यह हमारी भावना है।”
सरकारें चुप रहती हैं क्योंकि उन्हें पता है भावना से अच्छा कोई ईंधन नहीं होता।
इस पूरे तमाशे में एक बात ग़ायब है। वह आदमी, जो सीमा के दोनों ओर बिल्कुल एक जैसा दिखता है। उसी तरह डरता है। उसी तरह काम ढूंढता है। उसी तरह बच्चे पालता है। उसी तरह टीवी बंद कर देता है जब बहुत ज़्यादा शोर हो जाता है।
उसे न धुरंधर ने जीत दिलायी, न मीम उसे हरा पाया।
वह बस यह सोचता रहा, “काश हमारे मुल्कों में भी लोग उतनी मेहनत से सच्चाई बनाते, जितनी मेहनत से झूठ पर ताली बजाते हैं।”
और शायद इसी वजह से भारत और पाकिस्तान, दोनों देशों में, आज भी सबसे ज़्यादा टिकट सिनेमा हॉल में नहीं, सीमाओं पर कटते हैं।
अविनाश दास वरिष्ठ पत्रकार, फ़िल्म मेकर, फ़िल्म समीक्षक और ब्लॉगर हैं.
मैंने धुरंधर आज देखी।
और अब मैं कह सकता हूं कि यह अनावश्यक रूप से खींची हुई लंबी, उबाऊ और थकाऊ फिल्म है।
कलाकारों में रणवीर सिंह, राकेश बेदी और आर माधवन अपने किरदारों को निभा ले जाते हैं।
संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और अक्षय खन्ना बिल्कुल सपाट और एकआयामी हैं।
आईएसआई के इकबाल ने 1972 में जिया उल हक का भाषण कैसे सुन लिया?
वह तो 1979 में सत्ता पलट कर सैनिक शासन ले आए थे।
और भी दिक्कतें हैं।-अजय ब्रह्मात्मज


