मनोज अभिज्ञान-
तेज़ी से बदलते डिजिटल भारत में पैसा अब सिर्फ़ आर्थिक निर्णय नहीं रहा। वह सामाजिक हैसियत, आत्म-छवि और भविष्य की आशा का प्रतीक बन चुका है। इस बदलाव में तकनीक की भूमिका जितनी निर्णायक रही है, उतनी ही भूमिका मीडिया की भी रही है। मोबाइल स्क्रीन पर चलती रीलें, आत्मविश्वास से भरी आवाज़ें और सीमित लेकिन चमकदार सफलता कथाएँ केवल सोशल मीडिया एल्गोरिदम की देन नहीं हैं; वे उस सूचना-पर्यावरण का हिस्सा हैं जिसे मुख्यधारा और डिजिटल मीडिया दोनों मिलकर गढ़ते हैं।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) के अनुसार, Avadhut Sathe और उनकी Avadhut Sathe Trading Academy Private Limited ने जुलाई 2015 से अक्टूबर 2025 के बीच विभिन्न ट्रेडिंग और निवेश कोर्सों के नाम पर लगभग 3.37 लाख प्रतिभागियों से ₹600 करोड़ से अधिक की राशि एकत्र की। इसमें से ₹545 करोड़ से अधिक रकम महामारी के बाद के वर्षों में आई। नियामक का आरोप है कि बिना वैधानिक पंजीकरण के निवेश सलाह और स्टॉक विश्लेषण दिया गया, सोशल मीडिया पर असाधारण मुनाफे के दावे किए गए और चुनिंदा सफलता कथाओं के ज़रिए आम निवेशकों को आकर्षित किया गया, जबकि उसी अवधि में अकादमी की अपनी ट्रेडिंग गतिविधियों में कथित तौर पर भारी नुकसान हुआ।
यह मामला केवल नियामकीय चूक या किसी एक उद्यमी की नैतिकता का प्रश्न नहीं है। यह उस मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र की भी जाँच करता है, जिसने ऐसे दावों को या तो बिना पर्याप्त पड़ताल के मंच दिया, या फिर समय रहते सवाल पूछने से परहेज़ किया।
मीडिया का पारंपरिक दावा रहा है कि वह जनता की आंख और कान है। लेकिन निवेश और बाज़ार के मामलों में, मीडिया अक्सर दो भूमिकाओं के बीच फँस जाता है—सूचना देने और आकर्षण पैदा करने के बीच। जब किसी व्यक्ति या प्लेटफ़ॉर्म की कहानी ‘तेज़ सफलता’, ‘आसान कमाई’ और ‘नए भारत की उद्यमशीलता’ के नैरेटिव में फिट बैठती है, तो आलोचनात्मक दृष्टि पीछे छूट जाती है। ख़बर धीरे-धीरे प्रोफ़ाइल बन जाती है, और प्रोफ़ाइल कभी-कभी प्रचार का रूप ले लेती है।
इतिहास इस टकराव के उदाहरणों से भरा पड़ा है। अठारहवीं सदी की शुरुआत में फ्रांस में जब एक व्यापारिक कंपनी के शेयर इस अफ़वाह पर आसमान छूने लगे कि उसके पास उत्तरी अमेरिका की एक विशाल नदी घाटी में असीम चाँदी है, उस समय के पर्चे और अख़बार उस उत्साह के वाहक बने। सवाल पूछने की बजाय उन्होंने सपने बेचे। परिणाम एक आर्थिक पतन के रूप में सामने आया। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में अमेरिका में दशकों तक चलने वाली एक निवेश योजना को लेकर भी शुरुआती मीडिया कवरेज में प्रशंसा और रहस्य का स्वर अधिक था, जाँच का नहीं। जब तक सच्चाई सामने आई, तब तक अरबों डॉलर दांव पर लग चुके थे।
भारत में 1990 के दशक के शेयर बाज़ार उछाल के दौरान भी कुछ व्यक्तियों और शेयरों को ‘प्रतिभा’ और ‘नए युग’ का प्रतीक बनाकर पेश किया गया। मीडिया ने उत्साह को जगह दी, लेकिन जोखिम और संरचनात्मक कमज़ोरियों पर सीमित चर्चा की। बाज़ार गिरा तो यह स्पष्ट हुआ कि सूचना और प्रचार के बीच की रेखा कितनी धुंधली हो चुकी थी।
डिजिटल युग में यह समस्या और जटिल हो गई है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रही सामग्री को मुख्यधारा मीडिया अक्सर ट्रेंड के रूप में उठा लेता है। लेकिन ट्रेंड होना सत्य होने की गारंटी नहीं है। जब मीडिया बिना स्वतंत्र सत्यापन के ऐसे दावों को दोहराता है, तो वह अनजाने में भरोसे के उस बाज़ार का हिस्सा बन जाता है, जहाँ उत्पाद ज्ञान नहीं, बल्कि आश्वासन होता है।
वित्तीय बाज़ार मनोविज्ञान से चलते हैं, यह अब कोई नई बात नहीं है। कीमतें केवल आँकड़ों से नहीं, बल्कि उम्मीद, भय और लालच से तय होती हैं। मीडिया इस मनोविज्ञान को या तो संतुलित कर सकता है, या उसे और भड़का सकता है। जब सुर्खियाँ असाधारण मुनाफे पर केंद्रित होती हैं और जोखिम को फुटनोट में धकेल दिया जाता है, तो निवेशक का विवेक कमजोर पड़ता है।
मीडिया की भूमिका यहाँ केवल यह बताने की नहीं है कि “क्या लोकप्रिय है”, बल्कि यह पूछने की है कि “क्या वैध है”, “क्या टिकाऊ है” और “क्या सामान्य निवेशक इसे वहन कर सकता है”। इतिहास गवाह है कि हर आर्थिक उछाल के दौर में ऐसे चेहरे उभरते हैं जिन्हें समय का नायक बताया जाता है। कुछ सच में नवाचार करते हैं, कुछ माहौल का लाभ उठाते हैं। फर्क पहचानने का काम मीडिया का है, न कि सिर्फ़ नियामक का।
अच्छे समय में धोखाधड़ी अक्सर ख़बर नहीं बनती, क्योंकि सब कुछ चलता हुआ दिखता है। पैसा घूमता है, कहानियाँ बनती हैं, और चेतावनी देने वाला स्वर नीरस लगता है। लेकिन जैसे ही बाज़ार ठहरता है, वही चुप्पी सवाल बनकर लौटती है। तब पूछा जाता है कि पहले क्यों नहीं लिखा गया, पहले क्यों नहीं टोका गया।
नियम बनते रहेंगे, तकनीक बदलती रहेगी, और नए मंच आते रहेंगे। लेकिन अगर मीडिया अपनी भूमिका को केवल दर्शक या उत्प्रेरक तक सीमित रखेगा, तो इतिहास खुद को दोहराता रहेगा। बाज़ार खुद को साफ़ कर सकता है, लेकिन भरोसे की क्षति को भरने में वर्षों लगते हैं।
इसलिए डिजिटल निवेश के इस नए दौर में मीडिया की असली परीक्षा यही है कि वह उत्साह के शोर में विवेक की आवाज़ बन पाए या नहीं। क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देता है, तब अगला बुलबुला सिर्फ़ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी होता है।


