प्रियंका दुबे-
दिलीप मंडल जी के संदर्भ में यह तथ्य रेखांकित करना बहुत जरूरी है कि जब उन्होंने इंडिया टुडे (हिन्दी) के संपादक का पद सम्भाला तब जिन आवरण कथाओं के लिए उन्हेंने सबसे ज्यादा नकारात्मक्त प्रचार बटोरा उसमें सबसे प्रमुख कवर स्टोरी थी- उभार की सनक.
इस कवर स्टोरी में उन्होंने क्लीवेज दिखाते हुए किसी स्त्री के स्तन की तस्वीर इंडिया टुडे के कवर पर छापी और शीर्षक दिया – उभार की सनक. वह कहानी ब्रेस्ट इंप्लांट(स) की तथाकथित प्रसिद्धि पर थी. मैं तब तहलका में रंगरूट रिपोर्ट थी. समाज के हाशिए पर जी रहे लोगों की खबरें लिखते हुए मेरे और मेरे दोस्तों के सामने यह कवर आया तो हम हैरान रह गए.
हमें, कम से कम मुझे तो उनसे बहुत उम्मीदें थीं ही. मैं उनकी इज्जत करती थी. इसलिए तब यह समझना और मुश्किल हुआ ….आख़िर ऐसा कैसे हा रहा था कि वंचितों की बात करने वाले एक आदमी को जब एक महत्वपूर्ण मौका मिला तो वह उन सारे ज्वलंत मुद्दों को छोड़ कर जो देश में तब घटित हो रहे थे – ‘उभार की सनक’ छाप रहा था ? ऐसा कैसे हो रहा था – इस सवाल ने मुझे कई दिनों तक परेशान किया.
पत्रिका का सर्कुलेशन बढ़ाने का जो दंभ मंडल सर की पोस्ट्स में नजर आता है, उसके बीज में स्त्रियों के शरीर का जिस कदर ऑब्जेक्टिफ़िकेशन है , इसे उस एक आवरण कथा से समझा जा सकता है. खैर. पत्रकारिता जल्दी में दर्ज इतिहास तो है ही.
आवरण कथाएँ याद रखी जाती हैं. इतना सब होने पर भी दुख ही होता है आज उनको देख कर. शब्द को अगर ईमानदारी से बरता जाए तो वह सोना है ! मुझे आज तक वह लोग समझ नहीं आये जो सोने की बजाय मिट्टी को चुनते हैं .
ख़ुशदीप सहगल-
‘दिलीप सी.मंडल’ में सी.(C.) सही लगा है…ये जब 2012 के आसपास इंडिया टुडे हिन्दी पत्रिका के संपादक बने थे तो कहा जा रहा है कि इन्होंने फेसबुक पेज डिलीट कर नया पेज बना लिया था…
अभी हाल में सरकारी मीडिया एडवाइजर बने दिलीप मंडल ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया है कि उन्होंने इंडिया टुडे का संपादक बनने के बाद सर्कुलेशन बढ़ा दिया था… और उस वक़्त इंडिया टुडे इंग्लिश के एडिटर के समान ही हिन्दी के संपादक को भी बड़ा केबिन मिला था…
अब देखिए उस वक़्त इंडिया टुडे हिन्दी संपादक बनते ही ‘उभार की सनक’ के नाम से इन्होंने क्या कारगुज़ारी की थी…तत्काल ‘सर्कुलेशन बढ़ाने की सनक’ में…।



