यशवंत सिंह-
दिलीप मंडल की सैलरी ढाई लाख रुपये महीने है।
ढाई लाख रुपये महीने की सैलरी पाकर दिलीप जी दलित शोषित पिछड़ा चिंतक से सीधे बीजेपी-मोदी चिंतक बन गए।
ढाई लाख रुपये महीने पाकर दिलीप जी अब रोज-रोज मोदी जी का गुणगान करते हैं!
एक नौकरी की खातिर आदमी क्या से क्या हो जाता है!
दिलीप मंडल होना अब एक मुहावरा हो चुका है। दिलीप मंडल होना अब एक फ़ेनामिना हो चुका है।
दिलीप मंडल तब रोज़ रोज़ मोदी शाह बीजेपी संघ को गालियाँ देते थे। एक अदद नौकरी मिलने के बाद पूरी तरह पलटी मार कर अब रोज़ रोज़ मोदी चालीसा का एक एक श्लोक चौपाई रचते हैं!

दिलीप मंडल अब रोज़ रोज़ कांग्रेस कम्युनिस्ट समेत सभी ग़ैर-बीजेपी दलों को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तरीक़े से गाली देते हैं! उन्हें मासिक सैलरी को जस्टिफाई जो करना है!
गर्वी रावत-
दिलीप मंडल, जो कभी बहुजन समाज के एक प्रमुख विचारक और सत्तारूढ़ बीजेपी व नरेंद्र मोदी सरकार के प्रखर आलोचक माने जाते थे, आज अपनी पुरानी छवि के ठीक उलट काम कर रहे हैं।
एक समय था जब वे खुलकर बहुजन समाज के अधिकारों के लिए आवाज उठाते थे और मोदी सरकार की नीतियों को “नीच” कहकर आलोचना करते थे। लेकिन वक्त के साथ सत्ता की लालसा ने उनकी विचारधारा और आत्मसम्मान को पूरी तरह बदल दिया।
राज्यसभा की सीट पाने की उम्मीद में उन्होंने संघ और बीजेपी से नजदीकियां बढ़ाईं, लेकिन जब उनका यह सपना अधूरा रह गया, तो भी उन्होंने आत्मसम्मान को त्यागकर मोदी और बीजेपी की विचारधारा को अपनाने में कोई देरी नहीं की। जब राज्यसभा सीट नहीं मिली, तो उन्होंने उपवर्गीकरण जैसे बहुजन हितैषी मुद्दे पर बीजेपी की पोल खोलने की धमकी दी। लेकिन इसके बजाय उन्हें सूचना सलाहकार का पद देकर शांत कर दिया गया।
इसके बाद से दिलीप मंडल ने दिन-रात नरेंद्र मोदी और बीजेपी की प्रशंसा में लेख और ट्वीट लिखने शुरू कर दिए। लेकिन इन चापलूसियों के बावजूद न तो प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें मिलने का समय दिया और न ही एक्स पर फॉलो किया।
दिलीप मंडल, जो कभी बहुजन समाज की आवाज हुआ करते थे, अब संघ और मोदी की नफरत की राजनीति को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। हर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम रंग देकर बहस को भटकाने का उनका प्रयास बहुजन समाज में गहरी निंदा का कारण बन चुका है।
बौद्ध धर्म की विचारधारा को भटकाने और बहुजन समाज में भ्रम फैलाने के उनके प्रयासों को भी लोग समझने लगे हैं। उनकी गिरती साख और अप्रासंगिकता ने उनके प्रभाव को लगभग समाप्त कर दिया है। अब उनकी स्थिति ऐसी हो गई है कि वे संघ और मोदी के घुटनों के बल बैठे नजर आते हैं, लेकिन उनकी यह चापलूसी भी उन्हें बीजेपी में कोई सम्मानजनक स्थान दिलाने में नाकाम रही है।
इस बीच, आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी ने उनके गिरते नैतिक स्तर को और उजागर कर दिया है। पता चला है कि दिलीप मंडल, जो दिन-रात मुस्लिमों, यादवों, दलितों और विपक्षी दलों के खिलाफ नफरत फैलाते हैं, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से ढाई लाख रुपये प्रति माह का भुगतान प्राप्त कर रहे हैं।
यह राशि उन्हें उनके विचारों और लेखन के माध्यम से बीजेपी की नीतियों और संघ के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए दी जा रही है। बहुजन समाज, जो कभी उन्हें अपनी आवाज मानता था, आज उन्हें अपने अधिकारों और मूल विचारधारा का सौदा करने वाला व्यक्ति मानता है। उनकी जमीर की यह सस्ती कीमत, जो सवा कोड़ी से भी कम पर बिक गई, उन्हें समाज की नजरों में पूरी तरह गिरा चुकी है।
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