प्रमोद रंजन-
दिलीप वाली खबर सच है क्या? कोई सरकारी नोटिफिकेशन है, या यूं ही हवा में सब है?
दिलीप मंडल साधारण मानव नहीं है, वे कुछ भी फैला सकते हैं। एक बार फैला दिया था कि एक यूनिवर्सिटी के वीसी बनने वाले हैं, एक बार फैलाया कि अडानी उनका मित्र है, कुछ लोगों को लगता कि तेजस्वी और अखिलेश जैसे उनके चेले हैं और बहन जी उनके घर हर तीसरे दिन डिनर करने आती हैं। एक बार फैला दिया था कि जस्टिस कर्णन पर किताब लिखने के लिए उन्हें एक प्रकाशक 50 लाख रुपए दे रहा है।
और, यह मानने वाले तो बहुतेरे हैं कि वे सचमुच प्रोफेसर हैं। अधिकांश लोग यह भी समझते हैं कि वे बहुत सीनियर पत्रकार हैं, जिसने बड़े-बड़े संस्थानों में सर्वोच्च पदों पर काम किया है।दिलीप की माया अपरंपार है!
वैसे उनसे पूछ सकते हैं, कहां गई ये महान किताब?
लेकिन उन्होंने शुरुआती दौर में मायावती, फिर अखिलेश, फिर राजद और फिर कांग्रेस के समर्थन में खूब लिखा है. अंत में वो अपने सही घर पहुंचे है. मैंने कहीं पढ़ा कि मीडिया सलाहकार बनाए गए हैं. उन्हें झूठ बोलना बखूबी आता है. मेरा तो व्यक्तिगत अनुभव है. बीबीसी की एक कहानी पूरी पूरी चुरा कर छाप दिए थे. पकड़े गए तो बोले मैं सौ वेबसाइट्स का एडिटर हूं. सबकी जिम्मेदारी नहीं ले सकता. यहीं फेसबुक पर. फिर तीन दिन बाद अपना सब कमेंट डिलीट कर दिए. -जे सुशील
हर किसी की क़ीमत होती है, और जैसे ही क़ीमत चुकाने वाला मिलता, वह बिकने के लिए तैयार हो जाता है। दिलीप मण्डल जी बिकने की कोशिश तो लम्बे समय से कर रहे थे, अब जाकर डील सतह पर आया है। मुझे लगता है कि ग़ैर-भाजपा जमात को यह सीख लेनी चाहिए कि वह किसी एक के पीछे सब कुछ गाँव पर न लगा दे। पिछले दस वर्षों के दौरान इसने इस मोर्चे पर लगातार ग़लतियाँ की हैं। -कुमार सर्वेश
हर आदमी को अपने ज्ञान का उचित इस्तेमाल कर पैसा कमाने का अधिकार है. दिलीप जी बहुत दिनों से जो चाह रहे थे उन्हें वो मिला है. उनका स्किल यही है कि वो किसी के भी पक्ष में अच्छा या खराब बोल लिख सकते हैं. इसके लिए पैसा कमा रहे हैं तो गलत क्या है. हां मुझे कष्ट है कि उनको बड़ी डील मिलनी चाहिए। बहुत छोटे में मान गए. -जे. सुशील
दिलीप मंडल सर कम्युनिकेशन के उस्ताद हैं। उनका इस तरह बदलना दुःखद है। जिस विचारधारा से पहचान बनी है उसके साथ डटे रहना चाहिए। -मरिंदर मिश्रा


