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सुख-दुख

पत्रकारिता के स्कूल हैं दिलीप शुक्ला!

विवेक शुक्ला-

पत्रकारिता का स्कूल हैं भाईजी दिलीप शुक्ला… कुछ दिन पहले पता चला कि कानपुर प्रेस क्लब दिलीप शुक्ला भाई जी को सम्मानित करने जा रहा है। यह सुनते ही लगा कि मैं भी भाई जी के सम्मान में हो रहे कार्यक्रम का हिस्सा बन जाऊं। पर वक्त की कमी के कारण यह मुमकिन नहीं हुआ। दसेक पहले इस तरह का आयोजन हो रहा होता तो मैं कार से निकल लेता। पर अब लंबे सफर पर कार चलाने से बचता हूं।

दिलीप शुक्ला

दिलीप शुक्ला सबके भाई जी हैं। वे पत्रकारिता का स्कूल हैं। उनका अपना एक अघोषित संप्रदाय है। उनके शिष्यों की तादाद असंख्य है। कानपुर, लखनऊ और कुछ हदतक दिल्ली के जिन पत्रकारों ने उनके साथ काम किया है उन्हें पता है कि दिलीप शुक्ला भाईजी होने का मतलब क्या है। उन्होंने बेखौफ और फकीर के अंदाज में जीवन व्यतीत करते हुए पत्रकारिता की है। दैनिक जागरण, आज, असली भारत और दैनिक भास्कर वगैरह में रहे। अपनी शर्तों पर नौकरी की। खुद्दारी और स्वाभिमान का दूसरा नाम है भाई जी।

वे कब दफ्तर में प्रकट हो जाएं और कब दफ्तर से चले जाएं, यह कोई नहीं जान सका है। एम.जे. अकबर, एस.पी. सिंह, उदयन शर्मा समेत ना जाने कितने नामवर एडिटर उनसे उत्तर प्रदेश के सियासी हालत को समझने के लिए मिलते रहे। उत्तर प्रदेश के चप्पे- चप्पे की भाईजी को जानकारी है। रामजन्मभूमि आंदोलन और बीहड़ों में डकैतों का खौफ सहित अनगिनत ऐसी खबरें हैं, जिससे उनकी मीडिया में पहचान बनी ।

भाई जी पत्रकार से सियासत में आए राजीव शुक्ला जी के बड़े भाई हैं। मेरी भाई जी से पहली मुलाकात राजीव जी के मिन्टो रोड वाले फ्लैट में 1983 में हुई थी। मैं उनके बातचीत के विशिष्ट अंदाज और भव्य पर्सनेल्टी को देखते ही शिष्य बन गया था। मैंने उन्हें अपने अग्रज और गुरु के रूप में स्वीकार किया। भाई जी ने भी मुझे सदैव अपना माना। अपने पुत्र की तरह स्नेह और आशीर्वाद दिया। उन्होंने दर्जनों युवाओं को खबर लिखना समझाया-बताया। मैं भी उन्हें पढ़-पढ़कर काम चलाने लगा।

दिलीप शुक्ला भाई जी की शख्सियत अतुलनीय है। उनसे जो एक बार मिला वह उनका हो गया। मैंने उनके कानपुर के घर के दरवाजों को कभी बंद नहीं देखा है। वहां पर सुबह से शाम तक भाई जी के मित्र आते रहते हैं। उनके घर में जो आएगा उसे नाश्ता या भोजन करके जाना ही होगा।

उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता को जानने वालों को पता है कि वीरेंद्र शाही जैसे दबंग विधायक उनके गिलास में पानी भरते थे, हरिशंकर तिवारी उनकी आवाभगत करने के बाद बाहर तक विदा करने आते थे, राजमंगल पांडे जैसे दिग्गज राजनेता से अगर वह कुछ दिन न मिलें तो वह खुद उनके पास पहुंच जाते। मुलायम सिंह यादव, संजय सिंह, अकबर अहमद डंपी, बलराम सिंह न जाने कितने नेता उनके करीबी रहे।

दिलीप शुक्ल भाई जी ने अमिताभ बच्चन का इंटरव्यू तब किया जब वह इलाहाबाद संसदीय सीट से इस्तीफा देकर बुरे दिनों से गुज़र रहे थे। जगजीवन राम का इंटरव्यू लिया पर कई दिन तक प्रकाशित नहीं हुआ तो उनके पुत्र सुरेश राम ने संकोच से पूछा…भाई जी इंटरव्यू का क्या हुआ…दिलीप जी का जवाब था…छप जाएगा..छप जाएगा..धीरज धरो..” राजीव गांधी भी उनसे छोटी मुलाकात कर प्रभावित हुए थे। उस दौर के कई राजनेताओं से उनके करीबी रिश्ते थे। जिससे दोस्ती की हर परिस्थिति में निभाई, अभाव में भी स्वभाव नहीं बदला, जो किया, भरपूर दिल से किया, दौलत नहीं, दिलों पर राज किया।

कानपुर के एक पुराने पत्रकार शैलेश अवस्थी जी बता रहे थे कि कोई 25 साल पहले कानपुर में एक दबंग, ज़िद्दी बड़े प्रशासनिक अफसर की पोस्टिंग हुई। वह किसी को भी हड़का देते, यह बात दिलीप भाई के पत्रकार मन को बुरी लगी। फ़ोन कर खरी-खोटी सुना दी। उन्होंने उन्हें पकड़ने के लिए कई थानों की फ़ोर्स भेज दी। दिलीप जी को पता लगा तो वह रात 12 बजे उस बड़े अफसर के घर चुनौती देकर पहुंचे। वहां कई थानों का फोर्स था, पर वहीं ख़री-खरी सुनाने लगे। वहां मौजूद हर अफसर सकते में था कि यह कैसा शख्स है जो शेर की मांद में घुसकर ललकार रहा है। वह बड़े अफसर उन्हें अपने कैम्प ऑफिस ले गए। दिलीप जी ने उन्हें कई उदाहरण देकर समझाया कि “आप पब्लिक सर्वेंट हो, अहंकार शोभा नहीं देता, आप ईमानदार हो तो सब बेईमान भी नहीं हैं। दिलीप जी मस्ती में बोले जा रहे थे और वह सुन रहे थे। दिलीप जी के बारे में तफसील से जानकारी करने के बार उस अफसर ने गलती मानी ।

केंद्रीय मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन ने एमबीबीएस की डिग्री कानपुर से ली है. वे एक बता रहे थे कि कानपुर में रहते हुए उन्हें दिलीप शुक्ला को जानने का मौका मिला. उस दौरान, उन्होंने दिलीप जी की निर्भीक पत्रकारिता को जाना.

भाई जी कभी करियर माइंडेड शख्स नहीं रहे। उनके सामने सब पद बौने हैं! क्या आप कभी उनसे मिले हैं? नहीं मिले तो एक बार अवश्य मिल लीजिए. एक शेर उनको समर्पित है-

ये मेहर-ए-ताबाँ से जाके कह दो, वो अपनी किरनों को गिनके रखले
मैं अपने सेहरा के ज़र्रे ज़र्रे को ख़ुद चमकना सिखा रहा हूँ

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