श्रीलंका से लौटे पत्रकार दयानंद पांडेय का एक अदभुत यात्रा वृत्तांत पढ़िए

दीप्तमान द्वीप में सागर से रोमांस

आज पंद्रह दिन हो गया है श्रीलंका से लौटे हुए लेकिन कोलंबो में सागर की लहरों का सुना हुआ शोर अभी भी मन में शेष है । थमा नहीं है । यह शोर है कि जाता ही नहीं । कान और मन जैसे अभी भी उस शोर में डूबे हुए हैं । उन दूधिया लहरों की उफान भरी उछाल भी लहरों के शोर के साथ आंखों में बसी हुई है । लहरों का चट्टानों से टकराना जैसे मेरे मन से ही टकराना था । दिल से टकराना था । लहरों का यह शोर मेरे मन का ही शोर था । मेरे दिल का शोर था । यह शोर अब संगीत में तब्दील है शायद इसी लिए अभी भी मन में तारी है । स्मृतियों में तैरता हुआ । तो क्या यह वही शोर है , वही दर्प है जो राम को समुद्र पर सेतु बनाने से रोक रहा था ? जिस पर राम  क्रोधित हो गए थे ? तुलसी दास को लिखना पड़ा था :

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥

खैर , श्रीलंका में सागर की लहरों का शोर , वनस्पतियों का वैभव , वहां की हरियाली का मन में बस जाना और वहां के लोगों की आत्मीयता का सरोवर जैसे सर्वदा के लिए मन में स्थिर हो गया है । सर्वदा-सर्वदा के लिए बस गया है । यह सरोवर अब किसी सूरत सूखने वाला नहीं है । नहीं सूखने वाली हैं वहां की मधुर स्मृतियां । वहां की संस्कृति , खुलापन और टटकापन । वहां के राजनेताओं की सादगी भी कैसे भूल सकता हूं । कभी पढ़ा था कि श्रीलंका हिंद महासागर का मोती है । श्रीलंका जा कर पता चला कि सचमुच वह मोती ही है । अनमोल मोती । कभी सीलोन , फिर लंका और अब श्रीलंका । बीते पांच दशक में इस देश का नाम तीन बार बदल चुका है । बचपन में हम फ़िल्मी गाने सुनते ही थे रेडियो सीलोन से । अब हम उसी सीलोन जा रहे थे जिसे अब श्रीलंका कहते हैं । श्रीलंका का संस्कृत में अर्थ है दीप्तमान द्वीप । तो इस दीप्तमान द्वीप से ख़ुशनुमा यादों की बारात ले कर लौटा हूं । इसी दीप्तमान द्वीप में सागर से गहरा रोमांस कर के लौटा हूं ।

सागर से रोमांस? कृपया मुझे कहने दीजिए कि दुनिया में रोमांस से ज़्यादा रहस्यमय कुछ भी नहीं।

24 अक्टूबर की रात जब मैं भंडारनायके एयरपोर्ट पर उतरा तो वहां की धरती बरसात से भीगी हुई थी । लगा जैसे बरसात अभी-अभी विदा हुई हो । बरसात को हमारे भारत में शुभ ही माना जाता है । मैं भी मानता हूं। मान लिया कि श्रीलंका की धरती ने हमारा स्वागत बरसात से किया है । सारा रनवे बरसात के पानी से तर था । जैसे भीगा-भीगा मन हो । मन भीग गया तब भी वहां जब वहां श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन के कुर्लू कार्यकरवन , उन की पत्नी गीतिका ताल्लुकदार और सुभाषिनी डिसेल्वा ने भाव विभोर हो कर सब का स्वागत किया । कोलंबो के होटल रोड पर ब्रिटिश पीरियड के 1806 में बने होटल माऊंट लेविनिया में हमारे ठहरने का बढ़िया बंदोबस्त था । इस विक्टोरियन होटल में सौभाग्य से हमारा कमरा समुद्र से ठीक सटा हुआ था । रात तो हम खाना कर सो गए । समुद्र का सुख नहीं जान पाए । लेकिन जब सुबह उठा और बालकनी का परदा खोला तो दिल जैसे उछल पड़ा । समुद्र की लहरें उछल-उछल कर जैसे हमारे कमरे के बाहरी किनारे को चूम रही थीं । चट्टान से टकराती इन लहरों के हुस्न का अंदाज़ा तब मिला जब हम ने बालकनी में लगे शीशे के दरवाज़े को अचानक खोल दिया । अब उछलती लहरें थीं , उन का शोर था और मैं था । चट्टान से जैसे लहरें नहीं , मैं टकरा रहा था । बारंबार । समुद्र हमने भारत में भी दो जगह देखा था अब तक । एक तो गंगा सागर में दूसरे , कालीकट में । पर समुद्र का यह हुस्न , यह अदा ,  नाज़-अंदाज़ , ऐसा अविरल सौंदर्य और यह औदार्य नहीं देखा था , जो कोलंबो में अब देख रहा था , महसूस रहा था , आत्मसात कर रहा था , जी रहा था । सुबह सर्वदा ही सुहानी होती है लेकिन यह सुबह तो सुनहरी हो गई थी । एक अर्थ में लवली मॉरनिंग हो गई थी । मैं एक साथ सूर्य और सागर दोनों देवताओं को प्रणाम कर रहा था । प्रणाम कर धन्य हो रहा था । सागर की लहरों का शोर जैसे मेरे मन के शोर से क़दमताल कर रहा था । गोया मन मेरा चट्टान था और मैं उस से टकरा रहा था । टकराता जा रहा था । बहुत देर तक बालकनी में बैठा लहरों के साथ रोमांस के सांस लेता रहा । कामतानाथ का एक उपन्यास है समुद्र तट पर खुलने वाली खिड़की । पर यहां तो पूरी बालकनी ही समुद्र तट से सटी हुई थी , खुली हुई थी। नाश्ते का समय हो गया था । नहा-धो कर , पूजा कर नाश्ते के लिया गया । डायनिंग हाल के बाहर स्विमिंग पुल के पार नीले समुद्र के हुस्न का दीदार और दिलकश था । दिलकश और दिलफ़रेब । सागर की लहरों की उछाल तो वैसी ही थी पर लहरों का शोर यहां मद्धम था । हां , आकाश की अनगूंज भी यहां साथ थी । यह दूरी थी , आकाश का खुलापन था या कोई बैरियर । कहना मुश्किल था तब । तो क्या सागर आकाश से भय खाता है , बच्चों की तरह । कि शोर की सदा थम जाती है । मद्धम पड़ जाती है ।

क्या पता!

कि जैसे समुद्र सेतु बनाते समय राम से उलझा और फिर डर गया।

लेकिन सागर का सौंदर्य जैसे यहां और निखर गया था । उस के हुस्न में जैसे नमक बढ़ गया था । स्विमिंग पुल में टू पीस में नहाती गौरांग स्त्रियों को देखें या सागर के सौंदर्य को देखें , यह तय करना भी उस वक्त मेरे लिए एक परीक्षा थी । अंतत: मैं ने सागर को देखना तय किया । इस लिए भी कि सागर के सौंदर्य में जो कशिश थी , जो बुलावा , मनुहार , निमंत्रण और मस्ती थी , वह स्विमिंग पुल में नहाती स्त्रियों में नदारद थी । हालां कि एक साथी बार-बार कह क्या उकसा ही रहे थे कि स्विमिंग पुल में नहाया जाए । लेकिन इस सब के लिए मेरे पास अवकाश नहीं था । समुद्र का निर्वस्त्र सौंदर्य मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण था । इतना मनोहारी और इतना रोमांचकारी । और फिर जल्दी ही श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन की इकसठवीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में शरीक होने के लिए भी हमें जाना था ।

इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के बीस पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल जब जनरल सेक्रेटरी परमानंद पांडेय के नेतृत्व में कोलंबो के भंडारनायके मेमोरियल हाल में पहुंचा तो वहां भारतीय प्रतिनिधिमंडल का जिस पारंपरिक ढंग से सब को पान दे कर नृत्य और संगीत के साथ स्वागत किया गया वह बहुत ही आत्मीय और भावभीना था । मन हर लेने वाला । श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया । भारतीय पत्रकारों के प्रतिनिधिमंडल का भी उन्हों ने स्वागत किया और भारतीय पत्रकारों ने उन का अभिनंदन । इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट के महासचिव परमानंद पांडेय ने अपने भाषण में श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन को उस की वर्षगांठ पर भावभीनी बधाई दी और राष्ट्रपति का भारत की तरफ से अभिनंदन किया । इस मौके पर श्रीलंका के कई बुजुर्ग पत्रकारों को सम्मानित भी किया गया । कार्यक्रम में श्रीलंका के कई सारे राजनीतिज्ञ , मंत्री , मुख्य मंत्री और नेता प्रतिपक्ष भी उपस्थित थे । किसी भी राजनीतिज्ञ के साथ कोई फौज फाटा नहीं । कोई दिखावा नहीं । सब के साथ सारे राजनीतिज्ञ साधारण जन की तरह मिल रहे थे । सिर्फ़  एक राष्ट्रपति के साथ थोड़ा सा प्रोटोकाल और गिनती के चार-छह सुरक्षाकर्मी दिखे । बाक़ी किसी के साथ नहीं । रास्ते में भी कहीं कोई रोक-टोक नहीं हुई । कि राष्ट्रपति आ रहे हैं । कहीं कोई पेनिक नहीं । सारी जनता आसानी से आ जा रही थी । हमारे लिए यह आश्चर्य का विषय था । आश्चर्य का विषय यह भी था हमारे लिए कि मय राष्ट्रपति के किसी भी को मंच पर नहीं बिठाया गया । मंच पर न कोई कुर्सी , न कोई मेज । बस माइक और उदघोषक । बारी-बारी लोग बुलाए जाते रहे और अपनी-अपनी बात कह कर मंच से उतर कर अपनी-अपनी जगह बैठ जाते रहे । न कोई  वी आई पी , न कोई ख़ुदा । सभी के साथ एक जैसा सुलूक । राष्ट्रपति हों या नेता प्रतिपक्ष , कोई मुख्य मंत्री या मंत्री । या कोई पत्रकार । सब के लिए एक सुलूक ।  बाद के दिनों में भी , श्रीलंका के बाक़ी शहरों में भी सरकारी और ग़ैर सरकारी कार्यक्रमों में भी यही परंपरा तारी थी । कि स्टेज हर किसी आम और ख़ास का था । किसी खुदाई के लिए नहीं । श्रीलंका में प्रोटोकाल की सरलता का अंदाज़ा आप इस एक बात से भी लगा सकते हैं कि जिस भंडारनायके मेमोरियल हाल में श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन की इकसठवीं वर्षगांठ का समारोह मनाया गया और राष्ट्रपति की गरिमामयी उपस्थिति थी उसी भंडारनायके मेमोरियल हाल में उसी समय किसी कालेज या विश्वविद्यालय का भी कार्यक्रम था । और साथ-साथ । हम लोग जब भंडारनायके मेमोरियल हाल से विदा ले रहे थे , तब बच्चे जैसे अपनी डिग्री का जश्न मना रहे थे । श्रीलंका के राष्ट्रपति का उदबोधन भी सरल था । वह भारत के राजनीतिज्ञों की तरह किसी खुदाई में डूब कर नहीं बोल रहे थे । उन के बोलने और मिलने में सदाशयता और विनम्रता दोनों ही दिख रही थी । पत्रकारों को भौतिक चीजों के पीछे बहुत ज़्यादा न भागने की उन की सलाह थी । समाज कल्याण और अध्यात्म पर ज़ोर ज़्यादा था । वैसे भी राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरीसेन एक समय खुद पत्रकार रहे थे ।

कार्यक्रम के बाद शाम को ही सबरगमुवा प्रांत की राजधानी रतनपुर के लिए हम लोग रवाना हो गए । रास्ते भर जगमगाती सड़कें बता रही थीं कि यहां बिजली की स्थिति क्या है । गड्ढामुक्त सड़कें बता रही थीं कि वहां भ्रष्टाचार की स्थिति क्या है । लगभग ढाई-तीन सौ किलोमीटर का रास्ता किसी सुहाने सफ़र की तरह कटा । हिंदी फ़िल्मी गाने सुनते हुए । कोलंबो  से रतनपुर तक न आबादी ख़त्म हुई न रौशनी । न सड़क पर कहीं कोई गड्ढा , न हचका , न ट्रैफिक जाम । अविसावेल , बलांगुड़ और वेलीहललायर जैसे शहर-दर-शहर हम ऐसे पार करते गए गोया हम सड़क से नहीं नदी से गुज़र रहे हों । रतनपुर में रत्नालोक होटल में हम सभी ठहरे । सुबह दस बजे सबरगमुवा प्रांत के मुख्य मंत्री महिपाल हेरा से मिलने का कार्यक्रम था । सबरगमुवा प्रांत के सचिवालय में भी पान भेंट कर संगीतमय स्वागत किया गया । मुख्य मंत्री ने भारतीय पत्रकारों का औपचारिक भी स्वागत किया । कुछ रत्न भेंट किए । स्कूली बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए । बाद में सबरगमुवा प्रांत के मुख्य मंत्री अपने कार्यालय में भी भारतीय पत्रकारों से मिले । जहां जनता भी अपने काम के लिए बैठी हुई थी । जल्दी ही हम लोग वहां से विदा हुए ।

हम लोग अब शमन मंदिर के लिए चले । बताया गया कि अशोक वाटिका जाने के पहले इस मंदिर में आना ज़रुरी है । ऐसे जैसे इजाजत लेनी हो वहां जाने के लिए । शमन का मतलब पूछा तो श्रीलंका प्रेस एसोशियेशन के उपुल जनक जयसिंघे ने बताया कि लक्ष्मण , लक्ष्मण , लक्ष्मण , लक्समन , लक्समन  होते-होते शमन , शमन हो गया । यानी एक तरह से लक्ष्मण का ही रुप । शमन भगवान का वाहन हाथी है । वहां हाथी भी उपस्थित था । वैसे भी दुनिया में सब से ज़्यादा हाथी अगर अभी कहीं हैं तो वह श्रीलंका हैं । बताते हैं कि श्रीलंका में हाथी की लीद से कागज़ भी बनाया जाता है । मंदिर में भगवान शमन की मूर्ति तो थी ही , बड़े-बड़े असली हाथी दांत भी थे ।

कुछ देवियों और बुद्ध की बड़ी सी मूर्ति भी थी । यह मंदिर एक ट्रस्ट के तहत चलता है । इस का परिसर बहुत बड़ा है । बाक़ी सब कुछ भारत जैसा ही है । जैसे भारत में मंदिर के आस-पास फूल , प्रसाद , बच्चों के खिलौने , गृहस्ती के छोटे-मोटे सामान आदि की दुकानें होती हैं , खाने-पीने की दुकानें होती हैं , यहां भी थीं । ढेर सारी । ऐसे ही भारत और श्रीलंका में निन्यानवे प्रतिशत समानताएं मिलीं । हर चीज़ में । यहां तक कि  नाम भी भारतीयों के नाम जैसे । एक सरनेम हटा दीजिए , सारे नाम यही हैं । भाषा और कुछ विधियों का ही फ़र्क है । वहां की भाषा पर भी संस्कृत का बहुत प्रभाव है । वहां बोली जाने वाली , लिखी जाने वाली सिंहली और तमिल की भी संस्कृत जैसे मां है । बहुत सारे शब्द इसी लिए हिंदी जैसे लगते हैं । जैसे जन्मादि शब्द कई बार सुना तो मैं ने पता किया कि इस का अर्थ क्या है । पता चला कि मीडिया । इसी तरह वहां एक शब्द है स्तुति । हर कोई वक्ता अपने संबोधन के बाद स्तुति ज़रुर कहता । हमारे यहां स्तुति प्रार्थना के अर्थ में है । लेकिन वहां स्तुति का अर्थ है धन्यवाद , शुक्रिया । लेकिन सभापति , उप सभापति जैसे शब्दों के अर्थ जो भारत में हैं , वही श्रीलंका में भी । हम लोग सुविधा के तौर पर भले श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन कहते रहे और वह लोग भी लेकिन वह आपसी संबोधन में इसे श्रीलंका पत्र कला परिषद संबोधित करते रहे । करते ही हैं । संबोधन में भी । ऐसे ही तमाम सारे शब्द , वाक्य , वाक्य विन्यास भी हिंदी के बहुत क़रीब दीखते हैं । हिंदी क्या सच कहिए तो संस्कृत । संस्कृत ही उन की भाषाओं की जननी है । वैसे कहा जाता है कि सिंहली भाषा पर गुजराती और सिंधी भाषा का भी बहुत प्रभाव है । तो भारतीय भाषा ही नहीं , भारतीय भोजन , फूल , फल आदि भी । बस उन के भोजन की थाली में रोटी न के बराबर है । चावल बहुत है । वह भी मोटा चावल । पांच सितारा , सात सितारा होटलों में भी इसी मोटे चावल की धमक थी । उस में भी भुजिया चावल ज़्यादा । बस कोलंबो के होटल माउंट लेविनिया में खीर में एक दिन अपेक्षाकृत थोड़ा महीन चावल ज़रुर मिला ।

सबरगमुवा प्रांत की वनस्पतियों के वैभव के क्या कहने । रास्ते भर वहां की वनस्पतियों और उन की हरियाली को हम आंखों ही आंखों बीनते रहे , मन में भरते रहे । वहां के पर्वत जिस तरह हरे-भरे हैं, अपने भारत के पर्वतों से वह हरियाली लगभग ग़ायब हो चली है । बस एक शिमला की ग्रीन वैली में ऐसी हरियाली , ऐसी प्रकृति देखी है मैं ने या फिर शिलांग से चेरापूंजी के रास्ते में । चाय बागान वाले पर्वतों को छोड़ दीजिए तो बाक़ी पर्वत अपनी हरियाली गंवा चुके हैं । ख़ास कर अपने उत्तराखंड के पर्वत तो हरियाली से , वनस्पतियों के वैभव से पूरी तरह विपन्न हो चुके हैं , दरिद्र हो चुके हैं । रास्ते में एक रेस्टोरेंट में लंच के बाद वहां विभिन्न रत्नों की खदानें और एक चाय फैक्ट्री भी हमने देखी । कुछ साथियों ने रत्न और चाय भी ख़रीदे । इस के पहले रतनपुर में रत्नों का संग्रहालय भी हमने देखा ।

26 अक्टूबर की रात हम लोगों को एक गांव सीलगम में रुकना था । इस गांव को सबरगमुवा प्रांत की सरकार ने विलेज टूरिज्म के तौर पर विकसित किया है । इस गांव में पहुंचते-पहुंचते रात घिर आई थी । पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव में हम लोग जब पहुंचे तो यहां भी सभी को पान भेंट कर नृत्य और संगीत के साथ स्वागत किया गया । सबरगमुवा प्रांत के पर्यटन मंत्री अतुल कुमार भी उपस्थित थे । लेकिन स्वागत किया गांव के लोगों ने ही । सबरगमुवा यूनिवर्सिटी में टूरिज्म डिपार्टमेंट के सीनियर लेक्चरर डॉक्टर एम एस असलम ने वहां के टूरिज्म के बाबत एक प्रजेंटेशन भी पेश किया । पर्यटन मंत्री ने भी भारतीय पत्रकारों का अभिनंदन किया । अपना पर्यटन साहित्य भेंट किया । और सब से सरलता से मिलते रहे । बाद में गांव के बच्चों और लोगों ने लोक नृत्य और पारंपरिक गीत प्रस्तुत किए । डिनर के बाद गांव के अलग-अलग घरों में भारतीय पत्रकारों को ठहराया गया । किसी घर में एक , किसी घर में दो । सभी पत्रकारों ने अपने घर की तरह इन घरों को समझा । और घर का पूरा आनंद लिया । गांव के लोगों ने भी हर किसी को मेहमान की तरह सिर-माथे पर बिठाया । इस गांव का भोजन और आतिथ्य सत्कार श्रीलंका के किसी सात सितारा होटल से भी ज़्यादा अनन्य था , अतुल्य था । आत्मीयता , सरलता और निजता में भिगो कर भावुक कर देने वाला । देसीपन में ऊभ-चूभ ।

माटी की महक , गमक और सुगंध में डूबा किसी आरती में कपूर की तरह महकता और इतराता हुआ । आत्मीयता और नेह के सागर में छलकता हुआ । सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद बिलकुल सामान्य और साधारणजन की तरह दिखने वाले पर्यटन मंत्री अतुल कुमार से मैं ने पूछा कि आप की इतनी सरलता का राज क्या है ? तो वह शरमाते और सकुचाते हुए बोले , ‘ मैं तो ऐसे ही हूं !’ इस धुर देहात में भी मंत्री के साथ कोई सुरक्षाकर्मी और फौज-फाटा न देख कर उन से पूछा कि आप की सिक्योरिटी के लोग कहां हैं ? आप के स्टाफ़  के लोग कहां हैं ? तो वह फिर सकुचाए और बोले , ‘ सिक्योरिटी हमारे साथ कभी होती नहीं । उस की ज़रुरत भी नहीं । स्टाफ़  के लोगों की यहां ज़रुरत नहीं ।’

तो क्या फिर अकेले ही आए हैं यहां ? वह सकुचाते हुए फिर शरमाए और बोले , ‘ नहीं अकेले नहीं आया हूं । एक सरकारी ड्राइवर है  न ! ‘ अद्भुत था यह भी । यहां भारत में तो एक ग्राम प्रधान या सभासद भी अकेले नहीं चलता । कोई  विधायक भी बिना गनर और फ़ौज फाटे के नहीं चलता । और मंत्री ? वह तो धरती हिलाते हुए , धूम-धड़ाका करते हुए , पूरी ब्रिगेड लिए चलता है । पूरा इलाक़ा जान जाता है कि मंत्री जी आने वाले हैं । सारा सिस्टम नतमस्तक रहता है । थाना , डी एम  , यह और वह कौन नहीं होता ? प्रोटोकाल की जैसे बारिश होती रहती है । पर यहां बरसे कंबल भीजे पानी वाला आलम था ।

ख़ैर भोजन के बाद के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा के घर गया रहने और सोने के लिए । थोड़ी पहाड़ी चढ़ कर । साधारण सा घर । एक छोटे से कमरे में एक डबल बेड और दो सिंगिल बेड । बिलकुल ठसाठस । गृह स्वामी को उम्मीद थी कि चार लोग भी आ सकते हैं । लेकिन पहुंचे हम दो लोग ही । एक मैं और दूसरे चमोली , उत्तराखंड के देवेंद्र सिंह रावत । कमरा तो साधारण था ही , कमरे से थोड़ी  दूर पर बाथरुम और साधारण । बल्कि जुगाड़ तकनीक पर आधारित । ख़ास कर कमोड का फ़्लश । देख कर पहले तो मैं उकताया लेकिन फिर हंस पड़ा । ढक्कन ग़ायब । और फ़्लश के नॉब की जगह एक तार रस्सी जैसा बंधा था । खींचते ही फ़्लश का पानी निकल पड़ता था । खिड़की पर शेविंग वाले रिजेक्टेड ब्लेड से जगह-जगह पैबंद की तरह लटका कर खिड़की को कवर करने का जुगाड़ बनाया गया था । स्पष्ट है कि इस सुदूर देहात में प्लम्बर और बाथरुम से जुड़े सामान का मिलना सुलभ नहीं होगा तो यह जुगाड़ तकनीक खोज ली गई होगी । शावर भी जुगाड़ के दम पर था । ऐसे ही और भी कई सारे जुगाड़ । लेकिन कमरा , बाथरुम भले साधारण था , जुगाड़ तकनीक पर आधारित था लेकिन के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा साधारण लोग नहीं थे । शबरी भाव से भरे हुए थे । आतिथ्य सत्कार में नत । रात का भोजन हम लोग कर चुके थे सो अब सोना ही था । भाषा की समस्या भी थी । वह सिंघली बोलने वाले लोग थे । हम हिंदी और भोजपुरी भाषी । लेकिन गांव वाले हम भी हैं । गांव की संवेदना , गांव का अनुराग और उस का वैभव , उस की संलिप्तता और शुरुर हमारे भीतर भी था ।  उन के भीतर भी । इस दंपति की सत्कार की आतुरता देख कर मुझे अपना बचपन याद आ गया । जब शहर से गांव जाता था तो अम्मा को लगता था कि  क्या बना दे , क्या खिला दे , क्या दे दे । जब टीन एज हुआ तो जब कभी नानी के गांव यानी अपने ननिहाल जाता था और अचानक थोड़ी देर बाद चलने लगता तो वापसी के समय नानी बेचैन हो जातीं । कोई ताख , कोई  बक्सा उलटने-पलटने लगतीं । और कहतीं , नाती बस तनी  एक रुकि जा ! वह बेचैन हो कर रुपया , दो रुपया खोज रही होतीं थीं , कि मिल जाए तो नाती के हाथ में रख दें । मैं कहता भी कि  इस की कोई  ज़रुरत नहीं । लेकिन नानी हाथ पकड़ कर , माथा चूम कर रोक लेतीं । कहतीं , अइसे कइसे छूछे हाथ जाए देईं ? बिना सोलह-बत्तीस आना हाथ पर धरे ? और वह कैसे भी कुछ न कुछ खोज कर दो रुपया , पांच रुपया दे ज़रुर देतीं । साथ में चिवड़ा , मीठा भी बांध देतीं । भर अंकवार भेंट कर , माथा चूम कर , आशीष से लाद  देतीं । अम्मा और नानी का यही भाव इस दंपति के चेहरे पर भी मैं पढ़ रहा था । आत्मीयता में विभोर छटपटाहट की वही रेखाएं देख रहा था । कि हम लोगों को कोई असुविधा न हो । सो असुविधा की सारी इबारतें इस शबरी भाव में बह गईं । और हम उस खुरदुरे बिस्तर पर सो गए । नींद भी अच्छी आई ।

अमूमन मेरी सुबह थोड़ी देर से होती है । मतलब देर तक सोता हूं । लेकिन सबरगमुवा प्रांत के इस सीलगम गांव में मेरी सुबह अपेक्षाकृत ज़रा जल्दी हो गई । खुली खिड़की से आती रौशनी ने जगा दिया ।  श्री के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा पहले ही से जगे हुए थे । ऐसे जैसे हमारे जागने की प्रतीक्षा में ही थे । चाय के लिए पूछा । अपनी टूटी फूटी अंगरेजी में । मैं ने हाथ जोड़ कर उन्हें बताया कि सारी , मैं चाय नहीं पीता । सुन कर वह लोग उदास हो गए । हम उन के घर का छोटा सा बग़ीचा घूमने लगे । किसिम-किसिम के फूल , फल दिखाने लगे दोनों जन । कटहल , केला , आंवला , आम आदि । अजब था किसी पेड़ पर आम के बौर , किसी पेड़ पर टिकोरा तो किसी पेड़ पर पका हुआ या कच्चा आम भी । यह कैसे संभव बन पा रहा है , एक ही मौसम में । यह दंपति हमें भाषा की दिक्कत के चलते समझा नहीं पाए और हम नहीं समझ पाए । जैसे टूटी-फूटी अंगरेजी उन की थी , कुछ वैसी ही टूटी-फूटी अंगरेजी हमारी भी तो थी । और उस घर में ठहरे हमारे साथी देवेंद्र सिंह रावत तो हम सब से आगे की चीज़ थे । अंगरेजी में हेलो , यस-नो और ओ के से आगे उन की कोई दुनिया ही नहीं थी । कोई ज़मीन ही नहीं थी । फिर वह बेधड़क हिंदी पर आ जाते । आप को समझ आए तो समझिए , नहीं आता तो मत समझिए । और आगे बढ़िए । न सिर्फ़ रावत बल्कि कुछ और भारतीय साथियों के साथ भी यह मुसीबत तारी थी । जैसे एक साथी डायनिंग टेबिल पर थे । उन्हें नैपकिन की ज़रुरत थी । हेलो कह कर एक वेटर को उन्हों ने बुलाया । वेटर के आते ही उन्हों ने हाथ के इशारे से हाथ पोंछने का अभिनय किया । वेटर ने फ़ौरन उन्हें नैपकिन ला कर दे दिया । यह और ऐसे तमाम काम कई सारे साथी इशारों से भी संपन्न कर लेते थे बाख़ुशी। इतना कि कई बार नरेश सक्सेना की कविता याद आ जाती थी :

शिशु लोरी के शब्द नहीं
संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है

यह कविता और इस की ध्वनि श्रीलंका में बारंबार मिली । मिलती ही रही । दोनों ही तरफ से । भाषाई तोतलापन कैसे तो अच्छे खासे आदमी को शिशु बना देता है , लाचार बना देता है । यह देखना भी एक निर्मल अनुभव था । जैसे कि एक बार कोलंबो के माउंट लेविनिया होटल में मेरे साथ भी हुआ । इडली के साथ सांभर में अचानक मिर्च इतनी ज़्यादा मिली कि मैं जैसे छटपटा पड़ा । सिर हिलाने के साथ ही पैर पटकने लगा । कि तभी एक वेटर पानी लिए दौड़ आया । पानी दे कर वह पलटा । अब की उस के हाथ में रसमलाई की प्लेट थी । पानी पी कर , रसमलाई खा कर जान में जान आई । उस ने शब्दों में मुझ से कुछ नहीं कहा । न ही मैं ने कुछ कहा । लेकिन मेरी आंखों में उस के लिए कृतज्ञता थी । और मैं ने प्लेट मेज़ पर रखा फिर उस से हाथ मिलाया । वह सिर झुका कर कृतज्ञ भाव में हंसते हुए चला गया । ऐसे जैसे मैं ने उसे क्या दे दिया था । ऐसे ही साझा कृतज्ञ भाव में डूबे हुए थे हम और के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा दंपति । वह चाय के लिए फिर-फिर पूछ रहे थे । और मैं उन्हें हाथ जोड़ कर विनय पूर्वक मना करता रहा । वह चाहते थे कि कुछ तो मैं ले लूं । मैं ने उन्हें बताया कि बिना नहाए-धोए , पूजा किए मैं कुछ भी नहीं खाता-पीता । वह मान गए । नहा कर मैं ने पूजा के लिए पूछा कि  कोई ऐतराज तो नहीं । वह मुझे अपने घर में रखी कुछ फोटुओं के पास ले गए । वहां बुद्ध की छोटी सी मूर्ति के साथ-साथ दुर्गा और अन्य देवियों की फोटो भी लगी थी । उन्हों ने मुझे अगरबत्ती का पैकेट और दियासलाई भी दी । मेरे साथ उन्हों ने भी हाथ जोड़ कर शीश नवाया ।  वह अपने पूजा स्थल पर दो मिनट मेरे पूजा कर लेने से हर्ष विभोर थे । मैं कमरे में आ कर बैठा ही था कि वह मेरे लिए आंवला का जूस ले कर आए । रावत जी ने चाय पी और मैं ने आंवला का जूस । हम ने एक दूसरे के परिवार के बारे में , काम धाम के बारे में बात की । बच्चों के बारे में बात की । इस दंपति के चार बच्चे हैं । दो बेटा , दो बेटी । सब की शादी हो गई । सब बच्चे शहरों में सेटिल्ड हो गए हैं । अच्छी नौकरियों में हैं । कोई कैंडी में है , कोई कोलंबो में । अब गांव में यह दंपति अकेले रह गए हैं । कभी-कभी बच्चे आ जाते हैं गांव । तो कभी यह लोग बच्चों के पास चले जाते हैं । फ़ोन पर बात होती रहती है । हालचाल मिलता रहता है । मुझे अपने अम्मा , पिता जी की याद आ गई । वह लोग भी गोरखपुर के अपने गांव में रहते हैं । कभी हम चले जाते हैं , कभी वह लोग आ जाते हैं । फ़ोन पर बातचीत होती रहती है । हालचाल मिलता रहता है । स्थितियां लगभग एक सी हैं । अम्मा-पिता जी गांव किसी क़ीमत छोड़ना नहीं चाहते , इस दंपति का भी यही क़िस्सा है । अपनी माटी से मोह का मोल यही है । अनमोल रिश्ता यही है । जिसे कोई सुविधा , कोई सौगात समूची दुनिया में छीन नहीं सकती । हां , हमारे अम्मा-पिता जी के साथ एक सौभाग्य यह है कि वह अकेले नहीं रहते । एक छोटे भाई की पत्नी और छोटे बच्चे उन के साथ रहते हैं । ताकि उन्हें भोजन बनाने आदि अन्य काम में दिक्कत न हो । अकेलेपन का भान न हो । इस दंपति के साथ यह सौभाग्य नहीं है । बात अब बच्चों से हारी-बीमारी और सुख-दुःख पर आ गई है । श्रीमान के वी जयसेकर तो इकसठ-बासठ वर्ष के हो कर भी स्वस्थ हैं । ठीक मेरे बयासी वर्षीय पिता जी की तरह । लेकिन श्रीमती बद्रा के साथ बीमारियों का डेरा है । शुगर तो है ही , उन के घुटने की कटोरी घिस गई है । यह बात उन्हें मुझे समझाने और मुझे इसे समझने में बहुत समय लग गया । और अंततः नरेश सक्सेना की कविता की शरण में जा कर यानी इशारों-इशारों में समझना पड़ा । और जब मैं समझ गया तो श्री जयसेकर के चेहरे पर किसी बच्चे की सी चमक आ गई । मैं ने कहा कि इस का ऑपरेशन करवा कर कटोरी रिप्लेस करवा लें । उन्हों ने माना तो कि यही एक उपाय है । भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के घुटने के रिप्लेस के बारे में भी उन्हों ने पढ़ रखा है लेकिन सब कुछ के बावजूद श्रीमती बद्रा इस के लिए मानसिक रुप से तैयार नहीं हैं । जाने पैसे की दिक़्क़त है या कुछ और जानना मुश्किल था । बहरहाल एक नोटबुक ला कर श्री जयसेकर ने हमारे सामने रख दी । कि उस पर कोई कमेंट अंगरेजी में लिख दूं । ताकि सनद रहे और वक़्त ज़रुरत काम आए ।  उन्हों ने यह भी बताया कि आप लोग पहले टूरिस्ट हैं जो हमारे घर ठहरने आए । गांव में और लोगों के घर तो टूरिस्ट आते रहे हैं पर उन के घर हम पहले टूरिस्ट थे । हमने तो काम चलाऊ अंगरेजी में एक छोटा सा नोट लिख दिया । पर अपने रावत जी को जब लिखने को कहा गया तो उन्हों ने बेधड़क पन्ना पलटा और हिंदी में चार लाइन लिख कर नोट बुक फट से बंद कर के खड़े हो गए । अब  के वी जयसेकर और श्रीमती बद्रा के घर से विदा लेने का समय आ गया था । यह दंपति अनुनय-विनय कर रहे थे , कह रहे थे कि आप फिर कभी सपरिवार आइए न यहां और हमारे ही घर ठहरिए । हम यस-यस और श्योर-श्योर कहते रहे । शायद झूठ ही । अपने झूठ पर शर्म भी आ रही थी । लेकिन कहते भी तो उन से क्या कहते भला ? एक घर में प्रतिनिधिमंडल के सभी लोगों के एक साथ ब्रेक फास्ट की व्यवस्था थी । वहीं जहां हम लोगों  ने रात में डिनर लिया था । हम लोगों ने विदा के पूर्व अपने-अपने मोबाइल से एक दूसरे के साथ फ़ोटो  खिंचवाई । गले मिले । चलते समय श्रीमती बद्रा अचानक झुकीं और मेरे पांव पर अपना माथा रख कर प्रणाम की मुद्रा में आ गईं । पीछे हटते हुए मैं लज्जित हो गया । मैं ने उन्हें ऐसा करने से मना किया और हाथ जोड़ लिया । वह फिर गले लग गईं ।

हम लोग ब्रेकफास्ट की जगह पहुंचे । इस बहाने गांव और उस की प्रकृति भी देखी । रात आए थे तब अंधेरा था । जहां-जहां बिजली की रौशनी थी वही जगह दिखी । पर कोई गांव भी भला बिजली की रौशनी में देखा जाता है ? या दीखता है भला ? अब चटक सुबह थी और चलते-फिरते हम लोग थे । पहाड़ी के बीच बसा यह गांव था । चढ़ाई-उतराई थी । नहर में बहता पानी था , धान के खेत थे । बींस और तमाम सब्जियों से भरे खेत थे । फलों से लदे वृक्ष और तमाम वनस्पतियां थीं । आम , कटहल , केला आदि के वृक्ष फलों से लदे पड़े थे। बस नहीं था तो गांव में तरुणाई नहीं थी । जैसे वृद्धों का गांव था यह । हमारे भारतीय गांवों की तरह । तरुणाई यहां भी शहरों की तरफ कूच कर गई थी । जैसे पूरी दुनिया का यही हाल है । ग्लोबलाईजेशन की कीमत है यह । इक्का-दुक्का युवा । मुंह तंबाकू से लाल और हरे-भरे । पर्यटन विभाग इन परिवारों को प्रति व्यक्ति , प्रति दिन के हिसाब से साढ़े सात सौ रुपए रहने के लिए देता है । यह वृद्धों का गांव इस को भी अपना रोजगार और सौभाग्य मान लेता है ।

ब्रेकफास्ट की जगह जैसे सारा गांव हम लोगों को विदा करने के लिए इकट्ठा हो गया है । स्त्री-पुरुष , छिटपुट बच्चे भी । ब्रेकफास्ट के बाद हम लोग चले । चले क्या विदा हुए । जैसे कोई मेहमान विदा हो । जैसे घर से कोई बेटी विदा हो । रात आए थे हम लोग तो अंधेरा मिश्रित बिजली की रौशनी में भी गांव चहक रहा था । स्वागत में चहक रहा था । अब चटक सुबह में भी उदास था । कोई नृत्य , कोई गायन , कोई संगीत , कोई पान नहीं था । विदा की थकन और गहरी उदासी तारी थी सभी ग्रामवासियों के चेहरे पर । बच्चन जी की मधुशाला की एक रुबाई याद आ रही थी :

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करूं, पी लूं हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया ‘जानेवाला’,
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।

तो अब इस गांव की यात्रा अब समाप्ति पर थी । हमारे क्षणिक लेकिन अनमोल संबंधों की मधुशाला बंद हो रही थी । हम फिर गले मिल रहे थे , विदा हो रहे थे । अब हमें सेंट्रल प्राविंस के नुवारा एलिया ज़िले के लिए प्रस्थान करना था । वहां जहां कहा जाता है कि सीता के अपहरण के बाद रावण ने सीता को रखा था । यह मंदोदरी के मायके का इलाक़ा था । यानी रावण की ससुराल थी । हम लोग जिसे अशोक वाटिका के रुप में रामायण में पढ़ते हैं । नुवारा एलिया को श्रीलंका के स्वीटजरलैंड के रुप में भी जाना जाता है । श्रीलंका के पहाड़ी रास्ते भी बहुत मनमोहक हैं । ख़ूबसूरत मोड़ और हरियाली से संपन्न। नुवारा एलिया हम लोग पहुंचे । रास्ते में अशोक वाटिका भी पड़ी । श्रीरामजयम नाम से मंदिर है । जिसे प्रणाम करते हुए हम गुज़रे । तय हुआ कि लंच कर के यहां लौटेंगे । फिर आराम से मंदिर देखेंगे । नुवारा एलिया के स्थानीय पत्रकारों ने एक कार्यक्रम भी रखा था । हम लंच कर और उस कार्यक्रम को अटेंड कर लौटे भी । श्रीरामजयम मंदिर । शहर से थोड़ी दूरी पर बना यह मंदिर है हालां कि प्रतीकात्मक ही । यह तथ्य वहां स्पष्ट रुप से लिखा भी है एक पत्थर पर । फिर भी आस्था , विश्वास और मन का भाव ही असल होता है । इस छोटे से मंदिर में पहुंच कर हम ने शीश नवाया और सीता के दुःख में डूब गए । उन की यातना और तकलीफ की खोह में समा गए । कि कैसे एक अकेली स्त्री , अपहरित स्त्री इस वियाबान में , पर्वतीय वन में रही होगी । अब तो यहां कोई अशोक का वृक्ष भी नहीं है जो मेरे शोक को हरता । पर हमारे मन में सीता हरण के वह त्रासद क्षण और कष्ट दर्ज थे । मंदिर में भीतर तो राम , लक्ष्मण और सीता की मूर्तियां हैं । अलग से हनुमान का मंदिर भी है । लेकिन बाहर पहाड़ी नदी किनारे खुले में सीता से भेंट करते हुए हनुमान की मूर्ति है । साथ में एक हिरन है । हनुमान के पद-चिन्ह हैं । मूर्ति का यह खंड विचलित करता है । पास ही एक ऊंची पर्वत माला है । जहां कहा जाता है कि सीता को अशोक वाटिका में क़ैद करने के बाद अपना महल छोड़ कर अस्थाई रुप से रावण यहीं ऊंची पहाड़ी पर रहने लगा था । भारत को श्रीलंका का बड़ा भाई मानने वाले यहां के लोग सीता , राम या हनुमान का निरादर तो नहीं करते , आदर के साथ ही उन का नाम लेते हैं लेकिन इस सब के बावजूद रावण को वह अपना हीरो मानते हैं । रावण के खिलाफ कुछ सुनना नहीं चाहते । इस तरह की बहुत सारी बातें हैं , बहुत सारी कथाएं हैं । वाचिक भी , लिखित भी । बहरहाल जैसा कि तुलसीदास ने सुंदर कांड में लिखा है कि जब अशोक वाटिका में हनुमान ने सीता को देखा तो :

देखि मनहि महुं कीन्ह प्रनामा।
बैठेहिं बीति जात निसि जामा॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी।
जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी॥

मैं ने भी सीता जी को , उन की व्यथा को मन ही मन ही नहीं हाथ जोड़ कर भी प्रणाम किया । और उन की उन की मूर्ति के पास जा कर बैठ गया । उन के दुःख को भीतर से महसूस किया । तुलसीदास लिख ही गए हैं :

निज पद नयन दिए मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन ॥

अब यह कथा , कथा का दुःख सभी को मालूम है । हम ने भी तुलसीदास के लिखे के भाव में शीश नवाए , रस्सी से बंधा घंटा बजाया , फ़ोटो खिंचवाया और चले आए :

बार बार नाएसि पद सीसा।
बोला बचन जोरि कर कीसा॥
अब कृतकृत्य भयउ मैं माता।
आसिष तव अमोघ बिख्याता॥

नुवारा एलिया में एक सुंदर झील है । झील किनारे मादक हरियाली है । अपने भारतीय झीलों की तरह उन के किनारे होटलों और दुकानों की भीड़ नहीं है । हां , रेसकोर्स है । झील में बोट हैं , बोटिंग के लिए । तैरता हुआ बड़ा सा हाऊस बोट भी है । इसी हाऊस बोट पर नुवारा एलिया के स्थानीय पत्रकारों ने रात में कॉकटेल पार्टी आयोजित की थी भारतीय पत्रकारों के लिए । शाम को ठंड बढ़ गई थी । शिमला की तरह । हम सब ने हलके गरम कपड़े पहने । इस पार्टी में हिंदी गानों की बहार थी । वहां के स्थानीय लोगों ने आर्केस्ट्रा का भी बंदोबस्त भी किया था । इस सुरमई शाम को और दिलकश किया गीतांजलि ताल्लुकदार और उत्कर्ष सिनहा ने अपने गाए हिंदी फ़िल्मी डुवेट गानों से । गीतांजलि भारत में गौहाटी की हैं , भारत की बेटी हैं लेकिन अब श्रीलंका की बहू हैं । उत्कर्ष सिनहा गोरखपुर के हैं , अब लखनऊ में रहते हैं । पर बिना किसी रिहर्सल के गीतांजलि और उत्कर्ष ने डुएट गीतों की जो दरिया बहाई वह अनन्य थी । कॉकटेल की बहार थी ही , इस बहार की बयार में हम जैसे लोग झूम कर नाचने भी लगे । इस के एक दिन पहले भी रास्ते में गीतांजलि ने अपने मधुर कंठ से रास्ते में हिंदी फ़िल्मी गाने सुनाए थे । ये शमां , शमां है सुहाना और अजीब दास्तां है ये , न तुम समझ सके न हम ! जैसे गाने सुनाए थे । उत्कर्ष भी लगातार रास्ते में अपने मोबाइल से एक से एक सजीले और दुर्लभ गीत – ग़ज़ल सुनवाते रहे थे पर वह ख़ुद भी इतने सुरीले हैं , अच्छा गाते हैं यह इस कॉकटेल पार्टी में ही पता चला । इस मौके पर मैं ने उन के चेहरे को अपनी हथेली में भर कर उन्हें विश भी किया ।

दूसरी सुबह हम लोगों को कैंडी के लिए निकलना था । कैंडी होते हुए कोलंबो पहुंचना था । सुबह चले भी हम कैंडी के लिए । लेकिन शाम को फेयरवेल पार्टी भी थी । लगा कि कोलंबो पहुंचने में बहुत देर हो जाएगी । सो बीच रास्ते में कैंडी जाना कैंसिल हो गया और हम कोलंबो के रास्ते पर चल पड़े । भारत में ही दोस्तों ने कहा था कि कैंडी ज़रुर जाइएगा । श्रीलंका की सब से खूबसूरत जगह है । अफ़सोस बहुत हुआ कैंडी न जा पाने पर । पर करते भी तो क्या करते । खैर , केजल्ल  मावलेन , रामबड़  , वेलिमा ,  , पुसलेवान , गाम पोवर , पेरादेनिया और खड़गन्नाव जैसे शहरों से गुज़रते हुए रास्ते भर चाय बागानों का हुस्न , उन की मादक हरियाली मन में उफान भरती रही । हम ने दार्जिलिंग , गैंगटोक और गौहाटी के चाय बागान भी देखे हैं , उन का हुस्न और अंदाज़ भी जाना है लेकिन श्रीलंका के चाय बागानों के हुस्न के क्या कहने । रास्ते भर हम हरियाली पीते रहे और मन जुड़ाता रहा । इतना कि अपनी ही एक ग़ज़ल के मतले का शेर याद आ गया :

कभी जीप तो कभी हाथी पर बैठ कर जंगल-जंगल फ़ोटो खींच रहा हूं
अपने भीतर तुम को चीन्ह रहा हूं मैं तो हर पल हरियाली बीन रहा हूं

हम ने इस रास्ते में सिर्फ़ चाय बागान ही नहीं देखे बल्कि चाय के कुछ पेड़ भी देखे । हमारी दुभाषिया सुभाषिनी जी इन सारे विवरणों से हमें निरंतर परिचित और समृद्ध करवाती रहीं । सुभाषिनी श्रीलंका की ही हैं । लेकिन सिंहली , और हिंदी पर पूरा अधिकार रखती हैं । इस भाषा से उस भाषा में बात को चुटकी बजाते ही बता देना , रख देना सुभाषिनी के लिए जैसे बच्चों का खेल था । एक राष्ट्रपति वाले कार्यक्रम में हमें एक हियर रिंग दिया गया था जिस से सिंहली का अनुवाद फौरन हिंदी में मिल जाता था । चाहे जिस भी किसी का संबोधन हो । लेकिन बाक़ी जगहों पर सुभाषिनी ही हम लोगों को हिंदी और स्थानीय लोगों को सिंहली में हमारी बात बताती रहीं । चाहे भाषण हो या बातचीत । सुभाषिनी हर कहीं किसी पुष्प की सुगंध की तरह अपनी पूरी सरलता के साथ उपस्थित रहतीं । कोई रास्ता हो , कार्यक्रम हो हर कहीं सुभाषिनी अपने सुभाषित के साथ उपस्थित । सुभाषिनी श्रीलंका रेडियो में तो काम कर ही चुकी हैं , लखनऊ के भातखंडे संगीत विश्वविद्यालय में संगीत की शिक्षा भी ले चुकी हैं । लखनऊ आ कर ही उन्हों ने हिंदी सीखी थी । इस हरे-भरे मदमाते रास्ते में अंबे पुस रेस्टोरेंट में हम लोगों ने लंच लिया । इस रेस्टोरेंट में भी हिंदी फ़िल्मी गाने सुनाने वाले लोग मिले । एक से एक गाने । परदेस में संगीतमय लंच की ऐसी यादें मन की अलमारी में सर्वदा अपने टटकेपन के साथ उपस्थित रहती हैं । इस बात को शायद इस रेस्टोरेंट के प्रबंधन के लोग बेहतर जानते हैं । श्रीलंका के शहर दर शहर घूमते हुए , वहां की समृद्धि को देखते हुए यह विश्वास नहीं होता कि कोई बारह बरस पहले 2004 में आई सुनामी से यह देश बुरी तरह बरबाद हो गया था । विनाश का एक भी निशान नहीं । यह आसान नहीं है । बहुत बड़ी बात है ।

हम लोग सांझ घिरते-घिरते कोलंबो आ गए । उसी पुराने होटल माउंट लेवेनिया में ठहरे जहां भारत से आ कर पहली रात ठहरे थे । हम तो चाहते थे कि हमें फिर से वही हमारा पुराना कमरा मिल जाए । सागर के सौंदर्य और उस के शोर का वही नज़ारा मिल जाए । लेकिन नहीं  मिला । कमरा दूसरा मिला पर यह कमरा भी समुद्र की लहरों की लज्ज़त लिए हुए था । तासीर वह  नहीं थी , नज़दीकी भी वह नहीं थी पर लहरों की सरग़ोशी और सौंदर्य तो वही था । लहरों का शोर और उस की उछाल वही थी । लेकिन वह पहले सी मुहब्बत नहीं थी । फैज़ ने लिखा ही है:

मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात
तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है
तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये
यूँ न था, मैने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

यही हुआ मेरे साथ भी । पर जो भी होता है , अच्छा ही होता है । यह कमरा भी अच्छा था । उस कमरे का हुस्न जुदा था तो इस कमरे का अपना हुस्न था । मुझे तो बस सागर और उस के सौंदर्य से आशिक़ी करनी थी , उसी से मतलब था । और आशिक़ी जैसे भी हो निभा लेने में ही सुख है । आकाश और धरती उस में आड़े नहीं आते । मैं ने निभाया । सागर की लहरों का शोर और दूधिया लहरों की उछाल ऐसी थी गोया आप की माशूक़ा आप के ऊपर अनायास ही , अचानक ही सवार हो जाए । और आप हकबक रह जाएं । मारे प्यार के । प्यार का बुखार होता ही ऐसा है । रोमांस का ज्वार जैसे मुझ पर ही नहीं सागर पर भी सवार था । दोनों ही सुर्खुरु थे । रात में हम लोग फेयरवेल पार्टी में पहुंचे । आत्मीयता और मेहमाननवाज़ी की नदी यहां भी बहती मिली ।  आज इंडियन फेडरेशन आफ वर्किंग जर्नलिस्ट की 67 वीं वर्षगांठ भी थी । जिसे केक काट कर उपाध्यक्ष हेमंत तिवारी के नेतृत्व में मनाई गई । जनरल सेक्रेटरी परमानंद पांडेय दो दिन पहले ही भारत जा चुके थे । हेमंत  तिवारी ने अध्यक्ष मल्लिकार्जुनैया की उपस्थिति में बहुत भावुक कर देने वाला भाषण भी इस मौक़े पर दिया । श्रीलंका प्रेस एसोशिएशन के साथियों ने भी भाव-विभोर किया अपने उदबोधन में । हम लोगों की पूरी यात्रा पहले 30 अक्टूबर तक की तय थी । पर 30 अक्टूबर को दीपावली पड़ जाने के कारण कार्यक्रम तितर-बितर हुआ । दो दिन पहले ही सब कुछ समेटना पड़ा । 29 अक्टूबर को दिन में कुछ साथी भारत के लिए चले गए । लेकिन हमारी फ्लाइट 30 अक्टूबर की सुबह की थी । हम 29 अक्टूबर को भी रहे । कुछ और साथी भी । कर्नाटक , उड़ीसा और उत्तराखंड के साथी भी रहे ।

29 अक्टूबर की सुबह जब डाइनिंग हाल में हम ब्रेकफास्ट के लिए पहुंचे तो दीपावली का सा नज़ारा था । रंगोली सजी हुई थी । दिये जल रहे थे । भारतीय मिठाइयां सजी हुई थीं । जलेबी , रसमलाई , चावल की खीर , बादाम की खीर । होटल स्टाफ़ हैपी दीपावली बोल रहा था । हम चकित थे । शाम को भी इंडियन कल्चर सेंटर में दीपावली का आयोजन था । सुश्री शिरीन कुरेशी ने मुझे इस दीपावली कार्यक्रम में पहले ही से आमंत्रित कर रखा था । सुश्री शिरीन कुरेशी भारत की ही हैं । इंदौर की रहने वाली हैं । कोलंबो में दो साल से हैं । उन के पिता मोहम्मद नवाब हसन कुरेशी भी साथ रहते हैं । शेरो शायरी और फ़िल्मी गानों के बेहद शौक़ीन ।

होटल माऊंट लेवेनिया जहां हम ठहरे हुए थे इंडियन कल्चर सेंटर के अब्दुल गफूर मुझे लेने आए । साथ में चमोली के देवेंद्र सिंह रावत ने भी चलने की इच्छा जताई तो मैं ने कहा चलिए । हम लोग जब इंडियन कल्चर सेंटर पहुंचे तो वहां तो भारी भीड़ थी । मुझे लगा था कि कोई औपचारिक सा सरकारी कार्यक्रम होगा । संक्षिप्त सा । लेकिन शिरीन जी ने तो न सिर्फ़ लोगों को इकट्ठा कर रखा था बल्कि दीपावली की पूजा , दिया , संगीत , मिठाई और पटाखे का दिलकश बंदोबस्त भी कर रखा था । इस में भारतीय लोग भी थे और श्रीलंका के स्थानीय लोग भी । बल्कि स्थानीय लोग ज़्यादा थे । और अच्छी – खासी हिंदी बोलते और फ़िल्मी गाने गाते हुए ।  मैं ने वहां दीप जलाया , पूजन किया । श्रीमती अंजली मिश्रा ने इस में मेरी मदद की । आरती गाई। श्रीमती अंजलि मिश्र हैं तो मध्य प्रदेश की लेकिन उन का ननिहाल बनारस में है । सो वह भोजपुरी भी बढ़िया जानती थीं । उन से भोजपुरी में भी बात हुई । भारत की बेटी अंजलि मिश्र भी अब श्रीलंका की बहू हैं । लेकिन अपनी परंपराओं को जीती हुई । यहां वह यूनिवर्सिटी में पढ़ाती हैं । इस दीपावली के मौके पर अपनी एक ग़ज़ल यह मन के दीप जलने का समय है तुम कहां हो भी सुनाई मैं ने । जिसे भाव-विभोर हो कर सुना भी लोगों ने ।

यह मन के दीप जलने का समय है तुम कहां हो
प्राण में पुलकित नदी की धार मेरी तुम कहां हो

रंगोली के रंगों में बैठी हो तुम , दिये करते हैं इंकार जलने से
लौट आओ वर्जना के द्वार सारे तोड़ कर परवाज़ मेरी तुम कहां हो

लौट आओ कि दीप सारे पुकारते हैं तुम्हें साथ मेरे
रौशनी की इस प्रीति सभा में प्राण मेरी तुम कहां हो

देहरी के दीप नवाते हैं बारंबार शीश तुम को
सांझ की इस मनुहार में आवाज़ मेरी तुम कहां हो

न आज चांद दिखेगा , न तारे , तुम तो दिख जाओ
सांझ की सिहरन सुलगती है , जान मेरी तुम कहां हो

हर कहीं तेरी महक है , तेल में , दिये में और बाती में
माटी की खुशबू में तुम चहकती,  शान मेरी तुम कहां हो

घर का हर हिस्सा धड़कता है तुम्हारी निरुपम मुस्कान में
दिल की बाती जल गई दिये के तेल में , आग मेरी तुम कहां हो

सांस क्षण-क्षण दहकती है तुम्हारी याद में , विरह की आग में तेरी
अंधेरे भी उजाला मांगते हैं तुम से  , अरमान मेरी तुम कहां हो

यह घर के दीप हैं , दीवार और खिड़की , रंगोली है , मन के पुष्प भी
तुम्हारे इस्तकबाल ख़ातिर सब खड़े हैं , सौभाग्य मेरी तुम कहां हो

फिर हिंदी फ़िल्मों के गाने गाए गए । मिठाई खाई गई और पटाखे छोड़े गए । इस कार्यक्रम में भारतीय मूल के लोग भी थे लेकिन श्रीलंका मूल के लोग ज़्यादा थे । ख़ास कर हिंदी बोलते और हिंदी गाने गाते बच्चे । भारत में हिंदी भले उपेक्षित हो रही हो लेकिन श्रीलंका में हिंदी गर्व का विषय है। हिंदी गाने गाने वाले लोग श्रीलंका मूल के ही लोग थे । श्रीलंका मूल की स्नेहा मिलीं । धाराप्रवाह हिंदी बोलती हुई । अभी पढ़ती हैं । पांच मिनट की बातचीत में स्नेहा  मेरी बेटी बन गईं । मैं ने उन्हें बताया कि बेटियां तो साझी होती हैं । चाहे वह कहीं की भी हों । तो वह और खुश हो गईं । इंडियन कल्चर सेंटर से अब्दुल गफूर फिर हमें होटल तक छोड़ गए । अब्दुल गफूर भी इंडियन कल्चर सेंटर में हैं और भारत में गुजरात के रहने वाले हैं । सपरिवार रहते हैं श्रीलंका में बीते कई बरस से । बच्चे बड़े हो गए हैं । बच्चे कारोबारी हैं । अपना-अपना व्यवसाय करते हैं । कोलंबो में ही । कोलंबो की सड़कों पर जैसे भारतीय बाज़ार ही सजा दीखता है । हच और एयरटेल  की मोबाईल सर्विस एयरपोर्ट से ही दिखने लगती है । पूरे श्रीलंका में दिखती है । नैनो की टैक्सियां भी बहुतेरी । अशोक लेलैंड की बसें । बजाज की थ्री ह्वीलर । एशियन पेंट्स और बाटा की दुकानें वहां आम हैं । चाइनीज सामानों से यहां के बाज़ार भी अटे पड़े हैं । वैसे ही बढ़ते हुए माल , वैसे ही दुकानें । मोल-तोल करते लोग । वैसे ही रेस्टोरेंट , वैसे ही लोग । जैसे भारतीय । खैर , हम लौटे इंडियन कल्चर सेंटर से । पैराडाइज बीच पर गए । अंधेरे में भी समुद्र की लहरों का रोमांस जिया । लहरों के साथ टहले । बीच पर ही एक रेस्टोरेंट में कैंडिल लाईट डिनर किया । समुद्र की लहरों को चूमते हुए टहलते रहे । फिर समुद्र देवता को प्रणाम किया और होटल लौटे ।

अब हम फिर भंडारनायके एयरपोर्ट पर थे । ऊंघते हुए एयरपोर्ट पर भी हिंदी फ़िल्मी गाने बज रहे थे । इंस्ट्रूमेंटल म्यूजिक में । बहुत प्यार करते हैं तुम को सनम । सुन कर हम भी गाना चाहते हैं बहुत प्यार करते हैं श्रीलंका को हम ।  पासपोर्ट पर वापसी के लिए इमिग्रेशन की मुहर लग चुकी है । हम जहाज में हैं और जहाज रनवे पर ।  एयरपोर्ट भी समुद्र किनारे ही है । उड़ान भरते ही नीचे समुद्र दीखता है । लहराता हुआ । कोलंबो शहर छूट रहा है । श्रीलंका छूट रहा है । एक ही द्वीप में बसा हिंद महासागर का यह मोती छूट रहा है । अपनी ख़ूबसूरत पहाड़ियों में धड़कते हुए , कुछ सोए , कुछ जगे समुद्र किनारे बसे इस देश को छोड़ आया हूं। फिर-फिर जाने की ललक और कशिश लिए हुए ।  नीचे छलकता समुद्र है ऊपर आकाश में लालिमा छाई हुई है । आसमान में छाई लालिमा जैसे दिया बन कर जल रही है और दीवाली मना रही है । जगर-मगर दीवाली । यह तीस अक्टूबर , 2016 की अल्लसुबह है । प्रणाम इस सुबह को । प्रणाम श्रीलंका की धरती को । श्रीलंका के राष्ट्र गान में श्रीलंका को आनंद और विजय की भूमि कहा गया है । इस आनंद और विजय की भूमि को हम राम के विजयधाम के रुप में भी जानते हैं । इस लिए भी प्रणाम । प्रणाम अभी , बस अभी आने वाली अपनी धरती को । स्तुति श्रीलंका !

श्रीलंका के कोलंबो में स्थित इंडियन कल्चरल सेंटर में ग़ज़ल गायन करते पत्रकार दयानंद पांडेय.

इस यात्रा वृत्तांत के लेखक दयानंद पांडेय लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. विविध विषयों और भावों पर दयानंद के लेखन / रचना को पढ़ने के लिए उनके ब्लाग सरोकारनामा पर जा सकते हैं.

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