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सुख-दुख

डोपेमीन का अध्यात्म : मनुष्यों के अवचेतन-संसार में झाँकें तो सबसे सर्वव्यापी तत्व कौन-सा होगा, जो सृष्टि को संचालित कर रहा है?

सुशोभित-

यूनिवर्स में हाइड्रोजन सर्वाधिक बहुल तत्व है। एटमोस्फ़ीयर में नाइट्रोजन। धरती पर ऑक्सीजन। लेकिन अगर मनुष्यों के अवचेतन-संसार में झाँकें तो सबसे सर्वव्यापी तत्व कौन-सा होगा, जो सृष्टि को संचालित कर रहा है? मैं कहूँगा- यह है डोपेमीन। यह फ़ील-गुड हॉर्मोन है और सुख की अनुभूति कराता है। दिमाग़ में जगने वाली एक चिनगारी। मनुष्य सुख की खोज करने को लगभग बाध्य हैं। अगर वो यह सोचकर दु:ख मनाने लग जावेंगे कि हमें बाध्य कर दिया गया है तो आत्मसंघर्ष रचेंगे। एवॅल्यूशन यह नहीं चाहती। एवॅल्यूशन ने निश्चित कर दिया है कि जो चीज़ें आपके सर्वाइवल के लिए ज़रूरी हैं, उनसे आपको सुख मिले- ताकि आप जीवन से उदासीन न हो जाएँ। एवॅल्यूशन एक यांत्रिक प्रक्रिया है, जिसका केवल और केवल एक ही मक़सद है- जीवन-व्यापार का सुचारु संचालन। इस एवॅल्यूशनरी मैकेनिज़्म ने ही यह संसार रचा है।

डोपेमीन एक रिवाॅर्ड-सिस्टम की तरह काम करता है। हमारा स्नायु-तंत्र हमें सुख की अनुभूति कराकर पुरस्कृत करता है, जब हम कुछ वैसा करें जो सर्वाइवल के लिए ज़रूरी है- जैसे भोजन, प्रतिस्पर्धा और सम्भोग। करोड़ों वर्षों की एवॅल्यूशनरी-प्रक्रिया के बाद इंसानों का दिमाग़ उन कार्यों को करने के लिए प्रशिक्षित हो गया है, जो डोपेमीन रिलीज़ करते हों। यह उसके डीएनए में पैबस्त हो गया है। क्या मनुष्य अपने डीएनए और ब्रेन-सेल्स को बदलने में सक्षम हैं- मेडिटेशन और अवेकनिंग या व्यवहारगत-बदलावों से? और क्या यह एक जीवनकाल में सम्भव है?

इसी परिप्रेक्ष्य में देह और चेतना के द्वैत को समझें। मनुष्य देह है या चेतना है? या मनुष्य वह चेतना है जो देह में रहती है? देह के नियम एवॅल्यूशन से बँधे हैं और आपने उनका पालन करना है। आपको लगता है आप देह के स्वामी हैं। सच यह है कि देह आपकी स्वामिनी है। उसे पोषण चाहिए तो वह आपसे भोजन करवाती है। उसे विश्रान्ति चाहिए तो वह आपको नींद में धकेलती है। उसे प्रजनन चाहिए तो वह आपको सम्भोग के लिए प्रेरित करती है और उसमें ऐंद्रिक सुख की अनुभूति जोड़ देती है ताकि आप इस काम को टालें नहीं। कालान्तर में मनुष्यों ने सम्भोग को प्रजनन से भी अधिक सुख का साधन बना लिया, इससे आपके ब्रेन को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। वह अपनी आदत के अनुसार डोपेमीन रिलीज़ करता रहेगा, जब आप सेक्शुअल एक्ट में होंगे।

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समस्या तब आती है, जब आपके भीतर देह और चेतना के द्वैत का बोध जागता है। जब एक दिन सहसा आप पाते हैं कि आप इस देह के भीतर हैं, लेकिन आपको ठीक-ठीक पता नहीं है कि आप देह में कहाँ पर स्थित हैं। मस्तिष्क में, हृदय में, स्नायु-तंत्र में या वृत्तियों में? देह अपना काम करती रहती है, जिस पर आपका कोई वश नहीं। हृदय धड़कता रहता है- आप इसे न रोक सकते हैं न चला सकते हैं। श्वास चलती रहती है। रक्त दौड़ता रहता है। अगर आप सजग होकर सोचें तो पाएँगे कि आईने में जिस देह को आप देखकर कहते हैं यह मैं हूँ, यह मेरा हाथ है, यह मेरे आँख-कान हैं, वो आपसे पूर्णतया पृथक हैं इन मायनों में कि उनका आपके नियंत्रण से परे एक पृथक अस्तित्व है। वे आपसे स्वतंत्र हैं। यह देह एक दिन जर्जर हो जाएगी और आपसे कहेगी, अब यहाँ से चले जाओ। वह मनुष्य के जीवन का सबसे मर्मांतक क्षण होता है, जब उसे देह से निकाल बाहर किया जाएगा और वह सोचेगा, अब मैं कहाँ रहूँगा? अब तक मैं जहाँ रहता था, क्या वह मेरा घर नहीं था? क्या मैं यह देह नहीं था? तब मैं कौन हूँ?

जब ऐसे प्रश्न आपके भीतर जागते हैं तो आप अपने डोपेमीन-सिस्टम, अपने डीएनए-फ़ॉर्मेशन और अपने एवॅल्यूशनरी-मैकेनिज़्म के विरुद्ध विद्रोह करते हैं। यह सबसे बड़ा विद्रोह है। क्योंकि सामान्यतया जिन बातों को संसार में विद्रोह कहा जाता है, वो तमाम डोपेमीन को रिलीज़ करने वाले कृत्य हैं, उनसे हममें प्रतिस्पर्धा का भाव आता है, हम सर्वाइवल के लिए संघर्ष करते हैं और अपनी आत्मचेतना को पोसते हैं। वास्तविक विद्रोह तब होता है, जब विरक्ति उत्पन्न हो। वैराग्य फलित हो। आप पूछ बैठें- जैसे कि गौतम सिद्धार्थ ने पूछा था- कि जब जरा-जीर्ण, जर्जर होकर मृत्यु को ही उपलब्ध होना है फिर इस देह के जीवन का क्या अर्थ, इससे परे का सत्य कहाँ है? आपका ब्रेन ऐसी चीज़ें सोचने के लिए हार्ड-वायर्ड नहीं है। न ही आपका शरीर इसमें रुचि लेने वाला है। उसके पास एक टाइमलाइन है- औसतन सत्तर साल की। उसे इस टाइमलाइन में अपना काम पूरा करके चले जाना है। उसका काम क्या है? सर्वाइवल और रीप्रोडक्शन। जीवित बने रहना और संतान उत्पन्न करके विदा हो जाना। लेकिन चेतना इस यांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध विद्रोह करती है। करेगी ही- देर-अबेर।

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यही कारण है कि अध्यात्म देह और चेतना के द्वैत का कुरुक्षेत्र बन जाता है। देह का काम है चेतना को भुलाए रखना। चेतना का काम है देह को अतिक्रांत करना। आप देह में स्थित हैं या चेतना में? निश्चित ही- अभी तो आप, मैं, हम सब देह में स्थित हैं। और भले हम चैतन्य हैं- सुबह जागते हैं, काम करते हैं, सोचते हैं, अनुभूत करते हैं- लेकिन आत्मचैतन्य नहीं हैं। चेतना की धारा बाहर बह रही है। स्वयं को भुलाए हुए हैं। और अलबत्ता साइंस ने अभी तक नहीं कहा, पर मैं कहूँगा- बहिर्गमन में भी डोपेमीन रिलीज़ होता है। उसका भी रिवॉर्ड-सिस्टम है।

आप किसी न किसी काम में मसरूफ़ रहें, सोशल मीडिया को स्क्रॉल ही करते रहें, रील्स देखते रहें, कुछ खटपट करते रहें- आपका शरीर आपको इसके लिए प्रेरित करता है। वो कहेगा- ठीक है तुम व्यस्त रहो, मैं अपना काम इधर करता रहूँगा। जहाँ तुम सचेत हुए और इस तरह के प्रश्न पूछने लगे कि जीवन का प्रयोजन क्या है, मृत्यु के बाद मेरा क्या होगा, मैं देह हूँ या चेतना हूँ- तो मुश्किल खड़ी होगी। जीवन में बाधा आएगी। सर्वाइवल कठिन हो जाएगा। आपका शरीर आपको इस विचारगृह से लगभग धक्के देकर बाहर निकाल देने वाला है कि ऐसी बातें नहीं सोचते। आख़िर, रिवर्स-डोपेमीन भी काम करता है।

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हम देह में हैं, देह के नियमों के अधीन हैं, लेकिन जब देह के भीतर नहीं होंगे, तब किसके नियमों के अधीन होंगे- यही सबसे बुनियादी प्रश्न है! संसार के असंख्य प्रश्न एक तरफ़ और यह महाप्रश्न दूसरी तरफ़ कि यह जो मेरी चेतना है, क्या वह देह के साथ नष्ट हो जायेगी या देह के उपरान्त भी उसकी यात्रा है? अगर यात्रा नहीं है, तब तो बात ही समाप्त हो गई। तब यही एक जीवन है, जिसके बाद महाअँधकार है। हालांकि उस महाअँधकार को जानने वाला भी कोई शेष न रहेगा। लेकिन अगर यात्रा है, तब मैं कौन हूँ? और क्या देह में रहकर मैं उस महायात्रा की तैयारी कर सकता हूँ?

मज़े की बात यह है कि अगर ऐसे प्रश्न पूछकर भी मुझे एक बौद्धिक सुख मिलता है तो वह और सूक्ष्म डोपेमीन है, क्योंकि एवॅल्यूशन ने यह भी सुनिश्चित किया है कि हम चीज़ें को जानें, समझें, उसमें भी प्लेज़र है। भले वह रिवॉर्ड सिस्टम को झुठलाने वाला प्लेज़र हो। देह के साथ एक छल। बुद्धि के साथ एक धोखा। जिसमें वो कहे, मैंने तुमसे इसलिए सोचने को कहा था कि तुम फ़िटेस्ट हो सको, जीवन चलाते रहो- एक अच्छी स्पेशीज़ की तरह। इसलिए नहीं सोचने को कहा था कि तुम जीवन के परे की बातें सोचने लगो। जीवन के परे कुछ नहीं है।

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और यह सच है कि जीवन के परे कुछ नहीं है। लेकिन- कदाचित्- केवल देह के लिए!


जीवन से परे कुछ नहीं है, यह बात निश्चयपूर्वक कहने के लिए जीवन से बाहर जाना होगा। जैसे किसी घर की बाहर की दीवारों पर कोई नया रंग पुता है, वह रंग क्या है, यह जानने के लिए आपको घर से बाहर जाकर देखना होगा, भीतर से नहीं देख सकेंगे। उसी तरह यही एक जीवन है, इसके बाद कुछ नहीं- यह तभी निश्चित होगा जब इस जीवन का अंत होगा। अगर उसके साथ आप भी समाप्त हो गए तो कहें जीवन के परे कुछ नहीं। अगर उसके बाद भी आप रह गए तो ही कहेंगे कि जो जीवन मेरी देह से बँधा था, उसके समापन के बाद भी एक और यात्रा है।

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रिचर्ड प्रुम ने एक किताब लिखी है- एवॅल्यूशन ऑफ़ ब्यूटी। इसके बारे में मैंने अपनी पुस्तक आइंस्टाइन के कान में चर्चा की है। प्रुम का कहना है कि जेनेटिकली सुसंगत साथी के बजाय एस्थेटिकली सुंदर साथी का चयन करना नेचरल-सिलेक्शन को झुठलाता है या वह उसका एक और आयाम है? एवॅल्यूशन में सुंदरता का स्थान कहाँ है? इसी में आगे जोड़ें, कलात्मक अनुभूति से मिलने वाला सुख डोपेमीन के जिस रिवॉर्ड सिस्टम से सम्बद्ध है, क्या वह मौलिक है? क्योंकि कलात्मक अनुभूति तो सवाईवल के लिए अनिवार्य नहीं, उलटे शायद उसमें वह बाधा ही हो। आप देखेंगे कि अपने बुनियादी ढाँचों के विरुद्ध विद्रोह करने की मनुष्य की आदत नई नहीं है। प्रश्न इतना ही है कि वह अभी विद्रोह के किस सोपान पर है।

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