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सियासत

भाजपा के लिए सिर्फ बारह लाइन की एफबी पोस्ट ने डॉ संग्राम पाटिल को भारत का कैदी बना दिया!

Man in a white polo sits at a table in a busy cafe, smiling at the camera.

ललित कुमार-

आज के इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख को पढ़कर यह लिखे बिना रहा नहीं गया… लोकतंत्र में असहमति की कीमत कितनी हो सकती है? डॉ. संग्राम पाटिल के लिए इसकी कीमत 50 लाख रुपये, चार महीने की मानसिक प्रताड़ना और लगभग छिन चुकी नौकरी के रूप में सामने आई। केवल बारह शब्दों की एक फेसबुक पोस्ट किसी को अपने ही देश में कैदी बना सकती है — यह बात सुनने में भयावह लगती है — लेकिन यह बात मुम्बई में हकीकत बन गई।

भारतीय मूल के ब्रिटिश नागरिक और एन.एच.एस. के कंसल्टेंट डॉ. संग्राम पाटिल जब जनवरी में भारत आए थे, तो उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यहाँ उनके ख़िलाफ़ एक लुक आउट सर्कुलर जारी हो जाएगा। वे अपने गृहनगर जलगाँव आए थे।

उनका अपराध? भाजपा के एक सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर की शिकायत पर दर्ज एक एफआईआर…

आरोप यह कि डॉ. पाटिल की एक पोस्ट से समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ सकती है। हालांकि मज़ेदार बात यह है कि उस पोस्ट में न तो किसी धर्म का जिक्र था और न किसी समुदाय का। वह तो महज़ एक राजनीतिक टिप्पणी थी — डॉ. पाटिल की एक राजनीतिक पार्टी पर निजी राय — क्या आज के दौर में राजनीति पर टिप्पणी करना भी एक अपराध बन चुका है?

मुम्बई पुलिस ने तुरंत एफ़आईआर दर्ज की — डॉ. पाटिल से घंटों पूछताछ की — और फिर महीनों तक उन्हें अधर में लटकाए रखा। डॉ. पाटिल जलगाँव से मुम्बई के चक्कर काटते रहे — वकीलों की फ़ीस भरते रहे और उधर लंदन में उनके अस्पताल से उन्हें नोटिस मिलते रहे कि आप वापस ड्यूटी पर क्यों नहीं आ रहे? ब्रिटेन में अस्पताल के लोग यह समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर एक फ़ेसबुक पोस्ट कैसे किसी को चार महीने तक रोक कर रख सकती है!

चार महीने तक डॉ. पाटिल को यह नहीं बताया गया कि आख़िर उनसे और कितनी पूछताछ बाकी है। जब मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुँचा — तब जाकर कहीं न्याय की खिड़की खुली। कोर्ट ने पुलिस को फ़टकार लगाते हुए डॉ. पाटिल को ब्रिटेन वापस जाने की इजाजत दे दी।

अभिव्यक्ति की आज़ादी का जो ढोल हम अक्सर पीटते हैं — यह घटना उसकी सच्चाई उजागर करती है। अगर एक पढ़ा-लिखा डॉक्टर, जो कभी अन्ना आंदोलन का हिस्सा रहा हो, एक वाक्य लिखने भर से देश से बाहर जाने के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है — तो एक आम आदमी की क्या बिसात? कितने लोग हैं भारत में जो 50 लाख खर्च कर सकते हैं?

50 लाख रुपये खर्च करके एक इंसान अपनी आज़ादी वापस पाता है — लेकिन उन चार महीनों के मानसिक खौफ़ का हिसाब कौन देगा? डॉ. पाटिल अब वापस ब्रिटेन जा चुके हैं लेकिन वे अपने पीछे एक बड़ा सवाल छोड़ गए हैं।

क्या अब अपनी राजनीतिक राय रखना “लुक आउट सर्कुलर” का न्योता देना है? अगर व्यवस्था इतनी संवेदनशील हो गई है कि मात्र बारह शब्दों की एक पोस्ट से हिल जाती है — तो हमें अपनी लोकतांत्रिक मज़बूती पर दोबारा विचार करने की जरूरत है।

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