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”बकवास 7×24” चैनल, चीखू ऐंकर और एक गधे का लाइव इंटरव्यू

विनय श्रीकर

देश के सबसे लोकप्रिय खबरिया चैनल ”बकवास 7×24” का चीखू ऐंकर पर्दे पर आता है और इस खास कार्यक्रम के बारे में बताता है। ऐंकर– आज हम अपने दर्शकों को दिखाने जा रहे हैं एक ऐसा लाइव इंटरव्यू, जिसको देख कर वे हमारे चैनल के बारे में बरबस कह उठेंगे कि ऐसा कार्यक्रम तैयार करने का बूता किसी और चैनल में नहीं है। स्टूडियो में गधे का प्रवेश। माइक लेकर चैनल का पत्रकार गधे से मुखातिब होता है। इंटरव्यू शुरू होता है–

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पत्रकार– क्या आप विश्वास के साथ कहेंगे कि कि आप गधे ही हैं।
गधा— उतने ही विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मैं पक्का गधा हूं, जितने विश्वास के साथ तुम अपने को टीवी पत्रकार कहते नहीं अघाते।

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पत्रकार— जब आपको कोई गधा कह कर पुकारता है तो कैसा अहसास करते हैं ?
गधा— हमें इसका कोई गुरेज नहीं। तुम भी धड़ल्ले से मुझे गधा कह कर पुकारो। कतई बुरा नहीं मानेंगे, क्योंकि नाम से पुकारने की कुप्रथा इंसानों में है। दुर्भाग्य से पालतू कुत्ते भी इस कुप्रथा का शिकार हैं। हम गधों ने इस कुप्रथा से अपने को दूर रखा है। पूरी दुनिया की गधा बिरादरी में जाति, रंग, नस्ल या पंथ-धर्म जैसी वाहियात बातों के लिए भी कोई जगह नहीं है।

पत्रकार— क्या आपके मम्मी-पापा भी गधे थे ?
गधा— तो क्या तुम जैसे इंसानों के मां-बाप गधे होंगे ? क्या गधेपन का सवाल किया है यार ! किस गधे ने तुमको टीवी पत्रकार बना दिया है ?

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पत्रकार— अपनी जबान पर काबू रखिये, गधा साहब ! हमारे चैनल के संपादक ने हमें रखा है। उन्हें आप गधा नहीं बोल सकते। वह अव्वल दर्जे के बुद्धिमान और विद्वान व्यक्ति हैं।
गधा— खैर चलो, तुमको मेरी खरी बात नहीं सुहाई तो अपने शब्द वापस लेता हूं। आगे जो पूछना हो पूछो।

पत्रकार— आप कहां के रहने वाले हैं और आपका पालन-पोषण कहां हुआ है ?
गधा– मेरा जन्म एवं पालन-पोषण एक भारतीय धोबी के घर में हुआ है। और, मैं भारत का एक पशु-नागरिक हूं।

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पत्रकार— गधा साहब, आपका जनधन खाता किस बैंक में खोला गया है ? आपका आधार कार्ड बना है या नहीं ? अगर नहीं बना है तो क्यों नहीं ?
गधा— बरखुरदार, पक्के गंवार लगते हो। तुमको यह भी नहीं आता कि किससे क्या सवाल करना चाहिए। मेरी राय है कि तुम पत्रकारिता का पेशा छोड़ दो और चाट का ठेला लगाया करो। रहे तुम्हारे सवाल तो अव्वल ये सवाल तुमको इस देश के वजीरे-आजम से पूछने चाहिए। दूसरी बात, यदि हमारा खाता खुलेगा तो उसका नाम जनधन खाता नहीं पशुधन खाता होगा। जहां तक आधार कार्ड की बात है, तो उसके लिए दोनों हाथों की अंगुलियों के छाप की जरूरत होगी। यार, तुम तो निरे अज्ञानी लगते हो। हमारी बिरादरी का संबोधन पाने लायक भी नहीं हो।

(झुंझलाया हुआ गधा सिपों-सिपों करता इंटरव्यू बीच में छोड़ कर स्टूडियो से निकल भागता है।)

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लेखक विनय श्रीकर वरिष्ठ पत्रकार हैं और ढेर सारे बड़े हिंदी अखबारों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनसे संपर्क [email protected] या 9792571313 के जरिए किया जा सकता है.

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0 Comments

  1. satish

    July 12, 2017 at 6:30 am

    इंटरव्यू एक कधे की आत्मकथा से प्रेरित लगता है

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