अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

एनडीटीवी और एबीपी न्यूज के अलावा बाकी सभी अखबार-चैनल करवा चौथ व्रत पर हैं!

Sheetal P Singh : सिर्फ एनडीटीवी और एबीपी न्यूज़ ही यह सूचना लोगों तकपहुंचा रहे हैं कि जय शाह की संपत्ति 16000 गुना बढ़ी| जबकि यह खुद जय शाह ने अपने रिटर्न में दाखिल किया है| बाकी सारे चैनल/ अखबारों के वेबपेज आज करवा चौथ के व्रत पर हैं!

Avinish Mishra : भक्तों की गुप्त डायरी से… मोटा भाई ने कोई घोटाला नहीं किया है.. मोटा भाई का संपत्ति तीन सौ गुणा नहीं बढ़ा है.. मोटा भाई के बेटे का बिजनेस 16000 गुणा नहीं बढ़ा है.. ये सब कोरी अफवाह है.. पार्टी को बदनाम करने कि साजिश है.. वामपंथी साजिश एक बार फिर नाकाम होंगे.. सुधर जाओ वामपंथियों.. दूध जैसे मोटा भाई पर दाग लगा रहे हो?? आई लव मोटा भाई.. आई लव जै भाई.. आई लव मोदी.. धन्यवाद!!

Dilip Khan : दो ही बातें हो सकती हैं। या तो जय शाह ने ईमानदारी से पैसे कमाए या फिर बेइमानी से। अगर ईमानदारी से कमाए तो जय शाह उद्यमियों का नायक हो सकता है। लेकिन सारे भक्त जिस तरह इस स्टोरी पर रिएक्ट कर रहे हैं, उससे ईमानदारी वाली बात ख़ुद ही ख़ारिज हो जा रही है। भक्त ख़ुद ही मिट्टी पलीद कर देते हैं वरना मैं तो शुरू से कह रहा कि जय शाह ने “दीन दयाल उपाध्याय पुत्रोन्नति योजना” के तहत पैसे कमाए। जय शाह जब उद्यमी बना तो कुछेक हज़ार रुपए से शुरुआत की। जय शाह को 2013-14 में 1,724 रुपए का घाटा हुआ। फिर जय शाह के पापा जिस पार्टी के अध्यक्ष थे, वो सत्ता में आ गई। जय शाह की कंपनी अगले ही साल साढ़े 80 करोड़ रुपए का व्यापार करने लग गई। ये देखकर पूरे देश में खुशहाली छा गई। अभूतपूर्व विकास देखकर लोगों ने रोटी की जगह केक खाना शुरू कर दिया। यूनेस्को ने इसे सर्वश्रेष्ठ विकास घोषित कर दिया। [आप चाहें तो जय शाह को विकास शब्द से रिप्लेस करके भी पढ़ सकते हैं]

वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह, अविनीश मिश्रा और दिलीप खान की एफबी वॉल से.

इन्हें भी पढ़ें…

xxx

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

संपादक कुछ समझ पाता, उसके पहले ही मालिक के केबिन से बुलावा आ गया…

Abhishek Srivastava : पत्रकारिता की आधुनिक कथा। संपादक ने मीटिंग ली। सबसे कहा आइडिया दो। आजकल आइडिया पर काम होता है, घटना पर नहीं। सबने आइडिया दिया। कोई बोला, सर महंगाई… मने टमाटर ईटीसी। धत्। पागल हो? नेक्‍स्‍ट। सर, इस बार छंटनी पर कर लेते हैं। आइटी कंपनियों में भयंकर संकट है। संपादक अस मुस्‍कराया जस बुद्ध क्‍या मुस्‍कराते। बोले- बच्‍चा, पूरा करियर विशेषांक बंगलोर पर टिका है, आइटी को तो छूना भी मत। राजनीतिक संपादक अब तक चुप थे। जब सारे लौंडों ने आइडिया दे दिया तो उन्‍होंने सिर उठाया- मेरी समझ से हमें आज़ादी के सत्‍तर साल पर एक विशेषांक की तैयारी करनी चाहिए। ओके… संपादक ने कहा… आगे बढि़ए। राजनीतिक संपादक बोलते गए, ”…कि हम क्‍या थे और क्‍या हो गए… जैसा माननीय ने कहा था अभी… कि चीन याद रखे भारत 1962 वाला भारत नहीं है। तो आ‍इडिया ऑफ इंडिया… इस पर कुछ कर लेते हैं।”

इतने लंबे वाक्‍य में संपादक को केवल ‘च’ राशि सुनाई दी। उछलते हुए बोले, ”यार, ये चीन युद्ध को कितना बरस हुआ?” पचपन साल सर- एक रंगरूट उछला। अच्‍छा? पचास होता तो मज़ा आ जाता। तब तक सेना के जवान की तरह बहुजेबी जाकेट पहनने वाला ठिगना संवाददाता उछला- सर, पचास हो सकता है। 1967 में एक झड़प हुई रही सिक्किम बॉर्डर पर… उसे तान देते हैं, पचास का पचास और माहौल भी टाइट है ही! ”उम्‍मम… दैट्स वाइ आइ लव यू डूड…!” फिर संपादक ने राजनीतिक संपादक को देखा और सुझाव की मुद्रा में आदेश दिया, ”आपका आइडिया सही था मिश्राजी, बस सत्‍तर को पचास कर दो। डोकलाम में मामला मस्‍त चल रहा है। लगे हाथ एक जंग हो जाए। क्‍यों?” कमरा यस सर के समवेत् स्‍वर से गूंज उठा।

तैयारी पूरी थी जंग करवाने की तभी बिहार में तख्‍ता पलट कर सलट गया। ”आइडिया शेल्‍व्‍ड… बिहार निकलो”, संपादक का फ़रमान आया। ”लेकिन सर जंग?” संपादक ने उसे डांटा, ”जंग गई भाड़ में, पटना जाइए।” रातोरात हड़बड़-तड़बड़ में युद्ध टल गया और बिहार ने उसकी जगह ले ली। किसी तरह दो दिन बाद बिहार का मामला संभला तो संपादक ने कहा, ”इस बार चाइना ले लो।” स्‍टोरी अपडेट होने लगी। तैयारियां पूरी थीं। डोकलाम अब भी टाइट था। कोई पीछे नहीं हट रहा था। स्‍टोरी का रेलेवेंस बना हुआ था कि अचानक पाकिस्‍तान में नवाज़ की कुर्सी चली गई। ”शिट्ट यार… ये क्‍या हो रहा है। कोई नहीं… इस्‍लामाबाद से कॉलम मंगाओ… क्विक।” न्‍यूज़रूम की सारी मिसाइलों का मुंह शेंजांग से रावलपिंडी की ओर मुड़ गया। दफ्तर में डेस्‍क वाले कराची यात्रा के संस्‍मरण सुनने-सुनाने लगे। मामला बिहार से कम घरेलू नहीं था। कुछ शौकीनों ने तो झोंक में प्रेस क्‍लब में बिरयानी महोत्‍सव ही रखवा दिया। बस संपादक थोड़ा तनाव में था।

दरअसल, डोवाल साहब चाइना जा चुके थे और इधर स्‍टोरी अटकी पड़ी थी। वह किसी तरह नवाज़ की कुर्सी को ‘वन बेल्‍ट वन रोड’ प्रोजेक्‍ट से जोड़ने की जुगत भिड़ा रहा था ताकि चीन की कहानी भी इसी में अटैच हो कर निपट जाए। तभी मोबाइल घनघनाया। ”जी सर प्रणाम!” नॉर्थ ब्‍लॉक से ठाकुर सा‍ब का फोन था। ”क्‍या पंडिज्‍जी! हमारे जवान माइनस दस डिग्री में खर्च हो रहे हैं और आप दो हफ्ते से गोला दिए पड़े हैं। कब छपेगी?” संपादक घिघियाया, ”सर, वो बीच में बिहार हो गया फिर पाकिस्‍तान हो गया… कोशिश कर रहा हूं।” उधर से कड़ी आवाज़ आई, ”मैं आपकी कड़ी निंदा करता हूं। बिहार को लोग प्री-स्क्रिप्‍टेड बताके गरिया रहे हैं। पाकिस्‍तान के बहाने फिर पनामा का धुआं उठ रहा है। कुछ समझ में आता है आपको कि मैंने चीन से जंग की स्‍टोरी चलाने को क्‍यों कहा था? कल डोवाल साब लौट आएंगे और सारा खेल खत्‍म!” कह कर उन्‍होंने फोन रख दिया। संपादक कुछ समझ पाता, उसके पहले ही मालिक के केबिन से बुलावा आ गया।

इसके बाद की कहानी इतिहास है। अगले दिन पांच सौ लोगों की भीड़ प्रेस क्‍लब में संपादक के समर्थन में जुटी। अभिव्‍यक्ति की आज़ादी के नारे लगाए गए। संपादक की बरखास्‍तगी के खिलाफ़ जुलूस निकला। नया संपादक भी आ गया। अब तक किसी ने नहीं पूछा है कि आखिर संपादक ऐसा क्‍या अभिव्‍यक्‍त करना चाह रहा था कि उसे नौकरी से निकाला गया।

xxx

जब चौंकाने लायक ख़बरें हमें चौंकाना बंद कर चुकी हों और हर ख़बर में पठनीयता के दबाव से चौंक की छौंक लगायी जा रही हो, वैसे में परसों रात से लेकर कल तक का राजनीतिक घटनाक्रम किसी भी न्‍यूज़रूम के लिए एक विशिष्‍ट स्‍थान रखता है। आम तौर से हर आलसी पत्रकार ऐसे ही कुदरती मौकों के इंतज़ार में होता है कि सेब टपके और वह उसे लपक ले। ये बात अलग है कि मौके पर कलाकारी सब नहीं दिखा पाते। आज के अख़बार देखिए। ‘दि टेलिग्राफ’ के अलावा किसी ने भी ख़बर पर मेहनत नहीं की है। ‘दि इंडियन एक्‍सप्रेस’ ने हेडिंग में ऐसी महीन बुद्धि लगाई है कि दूसरी बार में उसका व्‍यंग्‍य पकड़ में आता है। ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ बिहार को पचा गया है। न लीड है न सेकंड लीड। नीचे कहीं छोटी-सी ख़बर है और भीतर के पन्‍ने पर बाकी कवरेज।

इस सप्‍ताहांत जो पत्रिकाएं बाज़ार में आएंगी, बहुत संभव है कि उनके कवर पर बिहार हो लेकिन कंटेंट किसी के पास नहीं होगा। सब बैंकग्राउंडर के सहारे ख़बर का चुइंग गम बनाएंगी। ऐसे ही कल टीवी चैनलों का आलम अजब था। मैंने महीनों बाद पांच घंटा टीवी देखा। अव्‍वल तो दिल्‍ली से लेकर पटना तक तमाम पत्रकाराएं तीज के प्रभाव में बेमन से ख़बर कवर कर रही थीं। एक ने तो बाकायदे ऐसे हाथ नचाकर ख़बर पढ़ी कि हाथ में रचाई मेंहदी स्‍क्रीन पर छा गई। एक पत्रकार अली अनवर के पास माइक लेकर पहुंचा। पहला ही सवाल इतना क्‍लोज़ एंडेड था कि जवाब देकर दूसरे पर उन्‍होंने हाथ जोड़ लिया। माइकवीर मजबूरी में सोलो गाने लगा।

मैंने कई बार कहा है कि पुण्‍य प्रसून बाजपेयी टीवी के मिथुन चक्रवर्ती हैं। कल दिन में अगर किसी ने बीजेपी के शाहनवाज़ हुसैन से उनकी बातचीत देखी हो तो समझ में आएगा कि ऐसे मौकों पर कैसे सवाल पूछे जाने चाहिए। कल तो आलोक मेहता तक उनके सवालों पर मुंह खोलकर ठीकठाक बोल रहे थे। उनके अलावा न्‍यूज़ नेशन पर अजय कुमार का स्‍वर सधा हुआ था और उनकी बातों में ख़बर से जुड़ाव दिख रहा था। चित्रा त्रिपाठी और संगीता तिवारी ने एबीपी को टेप रिकॉर्डर बना रखा था। फील्‍ड में श्‍वेता सिंह परेशान दिख रही थीं। प्रसून की पोल्‍का डॉट वाली टाइ कल कहर ढा रही थी। मुझे आश्‍चर्य है कि अजय कुमार से अब तक किसी ने क्‍यों नहीं कहा कि पीले रंग की टाइ मत पहना करो।

मीडिया विश्लेषक अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

”बकवास 7×24” चैनल, चीखू ऐंकर और एक गधे का लाइव इंटरव्यू

विनय श्रीकर

देश के सबसे लोकप्रिय खबरिया चैनल ”बकवास 7×24” का चीखू ऐंकर पर्दे पर आता है और इस खास कार्यक्रम के बारे में बताता है। ऐंकर– आज हम अपने दर्शकों को दिखाने जा रहे हैं एक ऐसा लाइव इंटरव्यू, जिसको देख कर वे हमारे चैनल के बारे में बरबस कह उठेंगे कि ऐसा कार्यक्रम तैयार करने का बूता किसी और चैनल में नहीं है। स्टूडियो में गधे का प्रवेश। माइक लेकर चैनल का पत्रकार गधे से मुखातिब होता है। इंटरव्यू शुरू होता है–

पत्रकार– क्या आप विश्वास के साथ कहेंगे कि कि आप गधे ही हैं।
गधा— उतने ही विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मैं पक्का गधा हूं, जितने विश्वास के साथ तुम अपने को टीवी पत्रकार कहते नहीं अघाते।

पत्रकार— जब आपको कोई गधा कह कर पुकारता है तो कैसा अहसास करते हैं ?
गधा— हमें इसका कोई गुरेज नहीं। तुम भी धड़ल्ले से मुझे गधा कह कर पुकारो। कतई बुरा नहीं मानेंगे, क्योंकि नाम से पुकारने की कुप्रथा इंसानों में है। दुर्भाग्य से पालतू कुत्ते भी इस कुप्रथा का शिकार हैं। हम गधों ने इस कुप्रथा से अपने को दूर रखा है। पूरी दुनिया की गधा बिरादरी में जाति, रंग, नस्ल या पंथ-धर्म जैसी वाहियात बातों के लिए भी कोई जगह नहीं है।

पत्रकार— क्या आपके मम्मी-पापा भी गधे थे ?
गधा— तो क्या तुम जैसे इंसानों के मां-बाप गधे होंगे ? क्या गधेपन का सवाल किया है यार ! किस गधे ने तुमको टीवी पत्रकार बना दिया है ?

पत्रकार— अपनी जबान पर काबू रखिये, गधा साहब ! हमारे चैनल के संपादक ने हमें रखा है। उन्हें आप गधा नहीं बोल सकते। वह अव्वल दर्जे के बुद्धिमान और विद्वान व्यक्ति हैं।
गधा— खैर चलो, तुमको मेरी खरी बात नहीं सुहाई तो अपने शब्द वापस लेता हूं। आगे जो पूछना हो पूछो।

पत्रकार— आप कहां के रहने वाले हैं और आपका पालन-पोषण कहां हुआ है ?
गधा– मेरा जन्म एवं पालन-पोषण एक भारतीय धोबी के घर में हुआ है। और, मैं भारत का एक पशु-नागरिक हूं।

पत्रकार— गधा साहब, आपका जनधन खाता किस बैंक में खोला गया है ? आपका आधार कार्ड बना है या नहीं ? अगर नहीं बना है तो क्यों नहीं ?
गधा— बरखुरदार, पक्के गंवार लगते हो। तुमको यह भी नहीं आता कि किससे क्या सवाल करना चाहिए। मेरी राय है कि तुम पत्रकारिता का पेशा छोड़ दो और चाट का ठेला लगाया करो। रहे तुम्हारे सवाल तो अव्वल ये सवाल तुमको इस देश के वजीरे-आजम से पूछने चाहिए। दूसरी बात, यदि हमारा खाता खुलेगा तो उसका नाम जनधन खाता नहीं पशुधन खाता होगा। जहां तक आधार कार्ड की बात है, तो उसके लिए दोनों हाथों की अंगुलियों के छाप की जरूरत होगी। यार, तुम तो निरे अज्ञानी लगते हो। हमारी बिरादरी का संबोधन पाने लायक भी नहीं हो।

(झुंझलाया हुआ गधा सिपों-सिपों करता इंटरव्यू बीच में छोड़ कर स्टूडियो से निकल भागता है।)

लेखक विनय श्रीकर वरिष्ठ पत्रकार हैं और ढेर सारे बड़े हिंदी अखबारों में उच्च पदों पर कार्य कर चुके हैं. उनसे संपर्क shrikar.vinay@gmail.com या 9792571313 के जरिए किया जा सकता है.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी राज में अखबार सरकारी तोता बन गए और न्यूज चैनल चमचा!

Priyabhanshu Ranjan : अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में अभी से जुटे अमित शाह 95 दिन का देशव्यापी दौरा कर रहे हैं। भाजपा नेतृत्व अगले 100 दिनों का एक्शन प्लान तैयार कर चुका है और सख्ती से उस पर अमल भी कर रहा है। केंद्रीय मंत्री मीडिया को लगातार इंटरव्यू देकर मोदी सरकार के तीन साल की अपनी झूठी-सच्ची “उपलब्धियां” गिना रहे हैं । देश का एक बड़ा तबका उनकी बातें सुन भी रहा है। लेकिन विपक्ष, मीडिया और सोशल मीडिया क्या कर रहा?

विपक्ष सो रहा है। राहुल गांधी को करीब एक हफ्ते बाद झारखंड की घटना पर ट्वीट करने का आइडिया आया। न्यूज चैनल कभी “पंचायत…”, कभी “एजेंडा…” और कभी “…एडिटर्स राउंड टेबल” आयोजित कर किसी तरह 24 घंटे का चैनल चला रहे हैं। इंडियन एक्सप्रेस को छोड़कर बाकी सारे अखबार सरकारी तोता बन बैठे हैं। न्यूज पोर्टलों में दि वायर को छोड़ दें तो बाकी को सेक्स और मोदी की तारीफ भरी खबरों से ही फुरसत नहीं है। सोशल मीडिया पर हम जैसे लोग यज्ञ-हवन और परेश रावल के ट्वीट में उलझे हुए हैं! ऐसा विपक्ष, ऐसी मीडिया और ऐसी खाई-अघाई जनता हो तो मोदी सरकार को और क्या चाहिए?

Arun Maheshwari : इससे अधिक चापलूसी क्या हो सकती है! प्रधानमंत्री ने पिछले तीन साल में दुनिया के कई देशों की यात्राएँ की, नेताओं से दोस्ती से लेकर विभिन्न समुदायों के लोगों से दोस्ती के कई नाटक खेलें। अभी टीवी के चैनलों पर विदेश नीति के कुछ ‘विशेषज्ञ’ प्रधानमंत्री की इन शैलानियों की तरह की यात्राओं को ही उनकी विदेश नीति की बड़ी सफलता बता रहे थे। एक चैनल पर सुन रहा था कि भारत के किसी प्रधानमंत्री ने नेपाल की यात्रा नहीं की, जो नरेन्द्र मोदी ने की। नरेन्द्र मोदी पाकिस्तान में नवाज़ शरीफ़ के घर पर शादी में पहुंच गये, जो किसी ने नहीं किया। और, श्रीलंका में बौद्धों के सम्मेलन में जाकर उन्होंने श्रीलंका के सिंहली लोगों के दिल को जीत लिया।

कोई यह सवाल नहीं कर रहा था कि इन महान यात्राओं के बाद ही ऐसा क्या हुआ कि नेपाल से और पाकिस्तान से रिश्तों में भारी गिरावट आ गई? इसी प्रकार चीन की पहल पर वन बेल्ट वन रोड के शिखर सम्मेलन में बिना किसी वाजिब वजह के भारत के न जाने पर भी कोई सवाल नहीं कर रहा था, जबकि उसमें दुनिया के ढेर सारे देशों के राष्ट्राध्यक्ष तक शामिल हुए थे। विदेश नीति के मसले पर मोदी सरकार की प्रशंसा से बड़ी चापलूसी भी क्या मुमकिन है? एंकर महरूफ रजा थे, अन्यों में शेषाद्रि चारी थे।

पत्रकार द्वय प्रियभांशु रंजन और अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पहले एक दूरदर्शन था, अब सारे ही चैनल सरकारी हो गए लगते हैं : प्रभात डबराल

Prabhat Dabral : कपिल मिश्रा अरविन्द केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं और पत्रकार बंधु फ़ौरन बी जे पी के नेताओं के पास उनकी प्रतिक्रिया लेने पहुँच जाते हैं. ठीक बात है, यही होना भी चाहिए. बी जे पी प्रवक्ता भी एक स्वर में कह देते हैं कि इन आरोपों के बाद केजरीवाल को नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि निष्पक्ष जांच हो सके. बी जे पी नेताओं की ये बात भी तर्कसंगत है. पत्रकार बंधु ये बाईट लेकर आते हैं और चैनल पर चला देते हैं. बी जे पी भी खुश पत्रकार भी खुश.तीन दिन से यही चल रहा है.

लेकिन मैंने नहीं देखा कि किसी पत्रकार बंधु ने केजरीवाल को गरिया रहे किसी बी जे पी प्रवक्ता से पलटकर ये पूछा हो कि आदित्य बिरला और सहारा से करोड़ों रुपये लेने के आरोप तो मोदी जी पर भी लगे हैं, उसका क्या होना चाहिए. आज के माहौल में इससे ज़्यादा उपयुक्त, स्वाभाविक और ज़रूरी सवाल और कोई हो ही नहीं सकता. लेकिन ये पूछा नहीं जा रहा. चैनलों पर बहस के दौरान आप पार्टी के नेता ये सवाल ज़रूर उठा रहे हैं लेकिन सवाल पूछना तो पत्रकारों का काम हुआ करता था. वो पूछते भी थे.

अब तो अजीब सिलसिला चल निकला है – पत्रकार बंधु अपनी साऱी क़ाबलियत विपक्षी नेताओं की ऐसी तैसी करने में लगा दे रहे हैं…लगता है उन्हे बी जे पी नेताओं से पलटकर सवाल करने से मना किया गया है. बी जे पी के प्रवक्ता चैनलों पर जिस तेवर में बात करते हैं उससे भी ऐसा ही आभास मिल रहा है कि सारे ही न्यूज़ चैनल भारी दबाब में हैं. बी जे पी वाले जो चाहे करवा दे रहे हैं… पहले एक दूरदर्शन था अब सारे ही चैनल सरकारी हो गए लगते हैं.

कई न्यूज चैनलों के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

ये न्यूज़ चैनलों का आपातकाल है… खोजी पत्रकारिता वेंटिलेटर पर है… : रजत अमरनाथ

Rajat Amarnath

खोजी पत्रकारिता यानि INVESTIGATIVE JOURNALISM आज वेंटिलेटर पर है… अंतिम सांसें ले रहा है… कभी कभी उभारा लेता भी है तो सिर्फ INDIAN EXPRESS और THE HINDU जैसे अख़बारों की वजह से… टीवी के खोजी पत्रकारों और संपादकों की नज़र में खोजी पत्रकारिता का मतलब सिर्फ और सिर्फ स्टिंग है… आखिर ऐसा हो भी क्यों न जब मालिकान और संपादक ही अपना हित साधने के लिए सत्ता के चरणों में दंडवत हैं… मालिकों को राज्यसभा की सीट चाहिए तो संपादक को TRP के जरिए कमाई ताकि उसकी मठाधीशी कायम रह सके….

एक खबर के बदले Deepak Sharma जैसे लाजवाब खोजी पत्रकार निकाल दिए जाते हैं और तो दूसरी तरफ अंडरवर्ल्ड में भी अपनी खोजी खबरों के जरिए पैठ बनाने वाली Sheela Raval को भी टीवी पर एंटरटेनमेंट की खबर करते देखा जा सकता है… वैसे टीवी पर कई बार “छोटा शकील” को शीला जी को “दीदी” कहते सुना है… आखिर किसी भी चैनल का मालिक या संपादक कागजों में लिपटे भ्रष्टाचार को उजागर क्यूँ नहीं करना चाहते? अपने ही अच्छे और सोर्सफुल रिपोर्टर का इस्तेमाल सही तरीके से क्यूँ नहीं करते?

पांच राज्यों मे सत्ता परिवर्तन हुआ है… पांचों ही राज्यों में भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार थी… सत्ता परिवर्तन भी इसी वजह से हुआ है… इस समय पांचों राज्य खबरों से लबरेज हैं… लेकिन सारे चैनल “योगी मय” “मोदी मय” हैं… कोई भी चैनल चाहे तो पिछली सरकारों का कच्चा चिठ्ठा खोल कर रख दे… और जनता को बता दे कि बादल ने कितना लूटा? हरीश रावत ने कितना सरकारी पैसा सत्ता पाने के लिए लुटाया? उत्तर प्रदेश में चाचा से भतीजे की लड़ाई की असली वजह क्या थी? खनन की बंदरबांट क्या थी? बुआ भतीजा अब क्यों एक हो रहे हैं? रातोंरात जो अधिकारी हटाए जा रहे है उसके पीछे की वजह क्या है? गोआ में कौन कौन बिका, कितने में बिका? मणिपुर की सरकार बनने के क्या मायने हैं? लेकिन ये सब खबरें करेगा कौन?

ये न्यूज़ चैनलों का आपातकाल है… जहां अब ज़रूरत उदय शंकर जी, राजू संथानम जी, शाज़ी ज़माँ जी, अरूप घोष जी, प्रभात डबराल जी, विनोद दुआ जी, शीला रावल जी जैसों की जरूरत नहीं है जो रिपोर्टर के पीछे खड़े हो कर कहें कि “तुम ठोको नेता मंत्री अधिकारी को, मैं निपट लूंगा… बस सबसे बढ़िया ख़बर लाओ…”

जिसका भी नाम लिखा है उनके साथ काम करने और उन्हें करीब से जानने का मौका भी मिला था…

वरिष्ठ टीवी पत्रकार रजत अमरनाथ की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

टीवी की बेमतलब की बहस से दूर रहें… जानिए क्यों…

एक आम आदमी सुबह जागने के बाद सबसे पहले टॉयलेट जाता है. बाहर आ कर साबुन से हाथ धोता है. दाँत ब्रश करता है. नहाता है. कपड़े पहनकर तैयार होता है. अखबार पढता है. नाश्ता करता है. घर से काम के लिए निकल जाता है. बाहर निकल कर रिक्शा करता है. फिर लोकल बस या ट्रेन में या अपनी सवारी से ऑफिस पहुँचता है. वहाँ पूरा दिन काम करता है. साथियों के साथ चाय पीता है.

शाम को वापस घर के लिए निकलता है. घर के रास्ते में बच्चों के लिए टॉफी, बीवी के लिए मिठाई वगैरह लेता है. मोबाइल में रिचार्ज करवाता है, और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है. अब आप बताइये कि उसे दिन भर में कहीं कोई हिन्दू या मुसलमान मिला? क्या उसने दिन भर में किसी हिन्दू या मुसलमान पर कोई अत्याचार किया? उसको जो दिन भर में मिले वो थे.. अख़बार वाले भैया, दूध वाले भैया, रिक्शा वाले भैया, बस कंडक्टर, ऑफिस के मित्र, आंगतुक, पान वाले भैया, चाय वाले भैया, टॉफी की दुकान वाले भैया, मिठाई की दूकान वाले भैया..

जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो इनमें हिन्दू या मुसलमान कहाँ है? क्या दिन भर में उसने किसी से पूछा कि भाई, तू हिन्दू है या मुसलमान? क्या किसी ने कहा- अगर तू हिन्दू या मुसलमान है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा? तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा? तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा? क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, मिठाई खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले हिन्दू हैं या मुसलमान?

जब हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मिलने वाले लोग हिन्दू या मुसलमान नहीं होते तो फिर क्या वजह है कि चुनाव आते ही हम हिन्दू या मुसलमान हो जाते हैं?

समाज के तीन जहर हैं, इनसे बचिए…

-टीवी की बेमतलब की बहस

-राजनेताओ के जहरीले बोल

-कुछ कम्बख्तों के सोशल मीडिया के भड़काऊ मैसेज

इनसे दूर रहे तो शायद बहुत हद तक समस्या तो हल हो ही जायेगी. इस बात को शेयर करें और छलावों से बचें….

(उपरोक्त मैसेज इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर ह्वाट्सअप पर बड़े पैमाने पर शेयर और प्रसारित किया जा रहा है)

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

पंडितों की फतवानुमा बातों पर चैनल वाले हांय हांय क्यों नहीं करते?

Mrinal Vallari : गाजियाबाद के जिस इलाके में मैं रहती हूं वहां बहुत से मंदिर हैं और बहुत से पंडी जी भी हैं। कभी-कभी इन पंडी जी की बातों को सुनने का मौका भी मिलता है। अगर लड़कियों और औरतों के बारे में इनकी बातों पर ध्यान देने लगें तब तो हो गया। जींस पहनीं मम्मियां भी मंदिर आती हैं पंडी जी की बात सुनती हैं, और जो मानना होता है उतना ही मानती हैं।

पंडी जी बता रहे होते हैं कि स्त्री का सिर ढका क्यों होना चाहिए तो पंडी जी की बेटी जींस पहन कर शॉपिंग मॉल जा रही होती है। सांस्कृतिक रूप से मंदिर जाना अलग बात है और पंडी जी की बातों पर अमल करना दूसरी बात है। अच्छा है इन पंडी जी की बातों को फतवानुमा मानने की आदत नहीं है, नहीं तो दिन भर न्यूज चैनलों वालों को हांय-हांय करने का मौका मिल जाता।

पंडितों और मौलवियों की बातों को मंदिर और मस्जिद से बाहर मत आने दीजिए। बाजार का खेल समझिए कि वो मौलवियों को क्यों बीच बहस में ला देता है। अगर वो मौलवी कहेगा कि मुसलिम इलाके में एटीएम मशीनों की इतनी कमी क्यों है, निगम प्रशासन उपेक्षित क्यों रखता है, मदर डेयरी के बूथ हमारे तरफ कम क्यों लगते हैं तो एंकर महोदय को तो ये बातें वामपंथी लगने लगेंगी। कहां, किसका और कैसे करार हो रहा है यह समझना इतना आसान नहीं है भाई। भजन गाती मीरा से लेकर गीत गाती जोहरा तक को कौन रोक सका है।

मृणाल वल्लरी प्रतिभाशाली पत्रकार हैं और जनसत्ता अखबार में कार्यरत हैं.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

मोदी का रोड शो और प्रसारण के अड्डों पर कब्जा

Uday Prakash : अभी सारे चैनलों में बनारस के रोड शो की कवरेज़ देख रहा था. जैसा इतालो काल्विनो ने कहा था कि सत्ताधारी हमेशा इस भ्रम में रहते हैं कि अगर उन्होंने सूचना-संचार माध्यमों के ‘प्रसारण के अड्डे’ (ट्रांसमिटिंग पॉइंट) पर कब्ज़ा जमा लिया है और अपने मन मुताबिक़ समाचार या सूचनाएं अपने जरखरीद मीडिया कर्मचारियों से प्रसारित-प्रचारित करवा रहे हैं, तो इससे ‘प्रसारण के लक्ष्य समूहों (यानी दर्शक, श्रोता) के दिमाग को प्रभावित और नियंत्रित कर रहे हैं।

यानी सारा भरोसा मीडिया और प्रचार तंत्र पर. जब कि बार-बार प्रमाणित होता आया है कि यह ‘भरोसा’ कुछ अरसे तक भले कामयाब लगे, और यह अरसा बहुत सीमित और अनिश्चित होता है, पर बहुत जल्द ऐसी कोशिश उलटा काम करने लगती है. (काउंटरप्रोडकटिव) होती है. इसकी वजह यह कि दर्शक-श्रोता-पाठक या ‘जनता’ का दिमाग़ कोई कूड़ेदान नहीं होता। जनता सूचना का ग्राहक और उपभोक्ता होती है और जल्द ही वह सूचनाओं की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को अपने विवेक की चलनी में छानना शुरू कर देती है.

और ऐसे फैसले ज़ाहिर करती है जिसका अंदेशा सत्ताधारी हुक्मरानों और उनके द्वारा नियंत्रित मीडिया के ‘प्रसारण अड्डों’ को नहीं हो पाता। आज जब मैं कई चैनलों में बनारस में (पूर्वी उत्तरप्रदेश) की चुनावी रैलियों या रोड शो की रिपोर्टिंग देख रहा था, रिमोट से एक से दूसरे और तीसरे-चौथे चैनलों पर आते-जाते हुए तो कुछ बातें लगीं, जो मैं आप दोस्तों से कहना चाहता हूँ :

पहला यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रोड शो सिर्फ टीवी के लिए आयोजित ‘स्क्रीन शो’ था. शायद इसके लिए पहले से कोई कानूनी अनुमति नहीं ली गयी थी. यह चुनाव आयोग की नियम-संहिताओं का उल्लंघन था. यह गैर कानूनी था.

दूसरा, यह रोड शो बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से शुरू हो कर कुछ ही दूर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर तक और फिर भैरव मंदिर तक , शिव के पूजन-अर्चन तक जा कर समाप्त हो गया था. सूचना यह भी है कि इस रोड शो में बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के वी.सी. गिरीशचंद्र त्रिपाठी, जो संघ के कार्यकर्ता भी रहे हैं, भी एबीपी के छात्रों के साथ सम्मिलित रहे हैं. यह भी नियमों का उल्लंघन ही है. फिर जैसा उर्मिलेश उर्मिल जी ने सवाल उठाया है, यह चुनाव के दौरान धार्मिक-जातिवादी आस्थाओं के गैर-कानूनी इस्तेमाल का भी तथ्य बनता है.
इसके मुकाबले अखिलेश-राहुल के रोड शो ने 12 किलोमीटर तक की खासी लम्बी दूरी तय की और यह सच भी खुल कर सामने आया कि इस रैली में शामिल लोगों की संख्या कहीं अधिक थी.

मुझे जो एक सूचना बहुत मानीखेज लगती है वह यह है कि जहां प्रधानमंत्री मोदी जी का रोड शो बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के कहे जाने वाले संस्थापक पंडित मदनमोहन मालवीय की मूर्ती के माल्यार्पण से शुरू हुआ और मंदिरों तक जा कर ख़त्म हो गया , वहीं अखिलेश -राहुल का 12 किलोमीटर का रोड शो बाबा साहब भीमराव आंबेडकर पार्क से शुरू हो कर उसी बनारस हिन्दू वि.वि. तक आकर समाप्त हुआ, जो मोदी-रोड शो का प्रस्थान बिंदु था.

इस प्रारम्भ और अंत के बिंदु का गहरा सामाजिक अर्थ है. यही सपा और भाजपा-संघ के बीच के फर्क का भी, फिलहाल, संकेत देता है.

लेकिन, सूचना यह भी है कि एक तीसरी रैली भी इसी समय आयोजित हुई , जो मीडिया के कैमरों से तो दूर रही , लेकिन उस रैली या चुनाव सभा में पांच लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। और यह रैली , इन दोनों रोड शो से बहुत बड़ी थी. यह बसप की रैली थी. मायावती की चुनावी सभा, जिसमें बाबा साहब आंबेडकर के बैनर और पोस्टर चारों ओर छाए हुए थे.

मैं नहीं जानता, सैफोलोजिस्ट या टीवी -ज्योतिषी नहीं हूँ कि यह दावा करूं कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की ४९ सीटों पर कौन-सी पार्टी जीतेगी या बहुमत बनायेगी, लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूँ कि सवर्ण-हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक सत्ता के कमज़ोर होने की यह शुरुआत है. ‘मोदी-मोहभंग’ की पहली बड़ी सूचना.

वैसे अधिक खुश होने की जरूरत नहीं क्योंकि राजनीतिक हार-जीत से सामाजिक-सांस्कृतिक धरातल पर असली प्रभुत्वशाली ताकतें पराजित नहीं होतीं. वे और अधिक आक्रामक या चतुर हो कर अपनी पकड़ सत्ता पर मज़बूत करेंगी और देश के संविधान की मूल प्रतिज्ञाओं के अनुरूप समाज और राजनीति को बनाने का संघर्ष और कठिन होगा। चुनाव आयोग को निष्पक्ष हो कर जांच करनी चाहिए कि किसने रोड शो के मामले में कोड ऑफ़ कंडक्ट का उललंघन किया है. चाहे वह कोइ भी हो.

हाँ, इस बार भी जब मोदी जी ने शिव पूजन किया, इंडिया आस्ट्रेलिया के खिलाफ बंगलूर के टेस्ट मैच में सिर्फ १८९ रन बना सकी और शर्मनाक हार की आशंका में धकेल दी गयी. याद होगा दोस्तों, मैंने पिछली बार भी कहा था कि जिस रोज़ मोदी जी ने ईशा फाउंडेशन वाले ‘त्रिपुंड-विहीन त्रिपुरारी शिव’ का शिवरात्रि के दिन पूजन अभिषेक किया था, उस दिन भी उन्नीस बार लगातार अपराजित रहने वाली ‘इंडिया’ पुणे में आस्ट्रेलिया के हाथों बुरी तरह से हारी थी.

शिव जी बहुत प्रसन्न नहीं लग रहे.

हम तो यही चाहेंगे कि सियासी चुनाव में कोई भी जीते, इंडिया पराजित न हो।  🙂

(इस व्यक्तिगत टिप्पणी के लिए क्षमा दोस्तों )

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें: