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सुख-दुख

गँड़ासा गुरू की शपथ- कुंदन यादव सरापा कथाकार हैं!

पंकज पराशर-

मैंने किताब के माध्यम से जितना गँड़ासा गुरू को जाना, उससे कहीं अधिक शायद डॉ कुंदन यादव को जानता हूँ. लंगोटिया तो नहीं, जेएनयू के शोधार्थी जीवन के दौर से हम राज़दार, हमनिवाला, हमनवां और हमनफ़स रहे. बनारस उनके भीतर इस तरह बसता है, जैसे शरीर के भीतर प्राण!

सो, मित्रों को भी कड़वी से कड़वी बात कहने में संकोच नामक भाव उनके भीतर नहीं व्यापता….और अगले ही पल मित्रवत्सलता उनके भीतर गंगा की लहरों की तरह हिलोरें लेने लगती है.

मित्र होने का मतलब उनके लिए ये नहीं कि वह संकोच करते रहें और आपकी कमियों पर चुप्पी साध जाएँ, लेकिन उनके सामने अगर कोई और आपकी बुराई करे, तो यारों के यार ऐसे कि गदा और गोजी उठाने से भी उन्हें कोई गुरेज़ नहीं.

तो, जेएनयू जाते ही अपनी जम गई. वे ठहरे एमए में जेएनयू के टॉपर और मैं था पटना विश्वविद्यालय का टॉपर. वे अपने कमरे में चाय बनाते तो साफ कह देते कि बैठना है तो बैठिये, पर मैं आपको चाय नहीं दे पाऊँगा. अकेले अकेले वे मज़े से चाय पी लेते थे. खाना बनाने में इतने माहिर कि हॉस्टल में भी अहीर भैरव महाराज दूध जुगाड़ लाते और खूब गाजर का हलवा खिलाते!

उनके संघर्ष से लेकर प्रेम और युद्ध तक के हम सहभागी रहे. हम दोनों का शौक, मानस सब आज भी समान है, सो मैं उनके लिए तब भी हमेशा हाज़िर था और आज भी हूँ. इन्हीं औघरदानी महाशय की जब राजकमल प्रकाशन से किताब ‘गँड़ासा गुरू की शपथ’ छपकर आयी, तो ख़ाकसार को कितनी खुशी हुई, यह शब्दों में बयान कर पाना कठिन है.

‘गँड़ासा गुरू की शपथ’ कुन्दन यादव की कहानियों में वह बनारस बोलता है, जिस बनारस को मैंने भी कुछ साल रहकर जाना. कुंदन यादव की ये कहानियाँ लिखी ही इसलिए और इस तरह गई हैं कि आप इन्हें पढ़ते हुए बनारस की धड़कनों की महसूस कर सकें. कथाकार को बनारस की ज़िन्दगी के कुछ पहलुओं की, वहाँ के कुछ लोगों की दास्तान भर ही नहीं कहनी है, उसे जीवन-रस के आस्वाद को पाठकों तक पहुंचाना है.

ठेठ बनारसी ठाठ के हँसमुख अन्दाज़ में लिखी गई कुंदन की कहानियाँ ‘सीने में जलन आँखों में तूफान सा क्यों है’ के दौर से उलट जो बनारसी जीवन है, उसके भीतर लेकर जाती हैं. उनकी कहानियों में आप बनारस को तो ‘सुनेंगे’ ही, मानव स्वभाव और सम्बन्धों के उन पहलुओं को ‘देख’ भी सकेंगे, जो रोज़मर्रा के जीवन में सामने आते हैं, लेकिन हमारी निगाह उन पर नहीं पड़ती.

जिन लोगों को ये कहानियाँ आपके सामने लाती हैं, उनमें बेगुनाह लोगों की ‘प्रापर फ़िज़ियोथेरैपी’ करनेवाले पुलिसवाले हैं, तो हर हाल में जुआ खेलाने की सौगन्ध निभानेवाले गँड़ासा गुरु भी. लेकिन इस दास्तान में और लोग भी हैं—बड़ी-बड़ी बातें किए बिना ही, बच्चों को संवेदनशील संस्कार देनेवाले डॉक्टर साहब.

धंधे में नुक़सान उठाकर भी पड़ोसी धर्म निभानेवाले टेलर मास्टर, सारे मोहल्ले को घर माननेवाले लोग और ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ पर असली ज़िन्दगी में अमल करनेवाले चौधरी साहब. ऐसे चरित्रों के ज़रिए, ये कहानियाँ साधारण व्यक्तित्वों की असाधारण क्षमता और मानवीय सम्बन्धों की मार्मिकता के साथ-साथ ताक़त के गुमान और दैनिक जीवन के पाखंडों को भी बहुत ही रोचक अन्दाज़ में रेखांकित करती हैं.

(इस संग्रह पर जल्दी ही बहुत विस्तृत आलेख आप पढ़ पाएँगे

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