
शीतल पी सिंह-
अपने सौवें साल के बीतने के बाद RSS ने अब खुलकर कहा है कि गांधी जी की हत्या करने के लिए हत्यारे नाथूराम गोडसे ने जो कारण बताए थे वे सही थे!
RSS के अधेड़ विचारक राम माधव ने Indian Express में एक लेख लिखकर इसे सही ठहराने का बौद्धिक किया है!
RSS ने आलोचना से बचने के लिए कभी सीधे स्वीकार नहीं किया कि दरअसल गांधी जी की हत्या उसी के विचारक्रम की परिणति थी जिसे उसके रहस्यमयी अनुत्तरदायी ढाँचे की वजह से सिद्ध किया जाना संभव न हुआ ।
लेकिन अब आज़ादी के आठवें दशक में ऐसी पीढ़ी उपलब्ध है जो हमारी आज़ादी की लड़ाई की नींव के पत्थरों पर पांव रखते समय किसी भी संयोजित झूठ पर विश्वास कर सकती है।
पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़ें…
सुदीप ठाकुर-
इंडियन एक्सप्रेस को मैं कभी जनसंघ के पूर्व सांसद रामनाथ गोयनका से अलग कर के नहीं देख सका। राम माधव को मंच इंडियन एक्सप्रेस ने उपलब्ध कराया है। Rajkamal Jha जी को बताना चाहिए कि नौकरी की ऐसी भी क्या मजबूरी… उनसे तो बड़ी उम्मीद रही है।
अभय सिंह-
भैया आप ने जो ये लाइन लिखी है कि पहले की पीढ़ी ये सुनने को तैयार नहीं थी लेकिन आज की पीढ़ी इनकी बात सुन रही है इस लिए इनको 75 साल लग गए ये बात कहने में की rss के विचार ने ही बापू की हत्या की थी ,,,,मुझे भरोसा है ऐसे ही देस चलता रहा तो आने वाले समय में ये Rss वाले ये भी कहेंगे कि गोडसे Rss का सक्रिय सदस्य था और साथ में सबूत भी देंगे।
रजीत राम-
दरअसल शायद हमारे देश को विदेशी शासक ही पसंद आते हैं इसीलिए ये यहूदी जो यहां पर चितपावन ब्राह्मण बन कर रह रहे हैं, अपनी रणनीति में कामयाब होकर भारत पर शासन कर रहे हैं। मा. न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह (सेवानिवृत्त) अपनी पुस्तक New Criminal Law (BNS) Progressive or Regressive में स्पष्ट लिखा है कि ये यहूदी लोग हैं जिनकी विचारधारा इस समय भारत पर शासन कर रही है।
एक तरफ हमारे देश के लोग, शंकराचार्य तक गोवध का विरोध कर रहे हैं तो दूसरी तरफ आरएसएस के लोग गोमांस खाने का समर्थन करते हैं और इस वक्त तो हमारा देश गोमांस निर्यात में विश्व का प्रथम देश बन गया है। अब जब यहूदियों का शासन है तो यहूदियों की विचारधारा ही काम करेगी क्योंकि इतिहास बताता है कि इस देश पर जिस तरह के व्यक्तियों ने शासन किया यहां के लोग अपने को उसी के अनुरूप ढाल कर रहने लगे।
नैमान एस खान-
गांधी की हत्या के बारे में देश में यह बात बहुत योजनाबद्ध तरीके से लगातार फैलाई जाती रही है कि उनकी हत्या इसलिए की गई कि विभाजन के समय उन्होंने मुसलमानों का समर्थन किया और पाकिस्तान के हिस्से का बकाया 55 करोड़ रुपए उसे दे देने के लिए भारत सरकार पर दबाव बनाया।
यदि यह सही है, तो फिर ये दोनों बातें तो विभाजन के समय की है। लेकिन गांधी की हत्या के तो पांच प्रयास उससे पहले हो चुके थे और हर प्रयास में वही लोग शामिल थे जिन्होंने अंततः 30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या कर ही दी। यदि 55 करोड़ कोई कारण होता तो हत्या के वे सब पहले के प्रयास क्यों किए गए थे? 1944 में न तो देश-विभाजन की बात थी और न 55 करोड़ की, फिर उस वर्ष उसी नाथूराम गोडसे ने अपने उन्हीं साथियों के साथ गांधी पर छुरे से हमला का प्रयास क्यों किया था? इस सवाल का जवाब सावरकर के अनुयायी नहीं देते।
गांधी की हत्या की जांच कर रहे कपूर कमीशन के समक्ष अनेक लोगों ने गवाही दी। इनमें भल्लारे गुरुजी (भीकूदाजी भल्लारे, जिनका देहावसान जुलाई 2017 में सतारा में हो गया) की गवाही बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि 22 जुलाई 1944 के दिन हुए हत्या के प्रयास के वे प्रत्यक्षदर्शी थे जब पंचगनी में नाथूराम गोडसे ने प्रार्थना सभा में छुरे से गांधी पर हमला का प्रयास किया। तब उन्होंने और मणिशंकर पुरोहित ने मिलकर गोडसे को पकड़ लिया। लेकिन गांधी ने गोडसे के साथ कोई मारपीट वगैरह नहीं होने दी। बल्कि गांधी ने गोडसे से यह कहा कि वह एक सप्ताह उनके साथ रहे। लेकिन गोडसे ने रहने से इंकार कर दिया जिसके बाद गांधी ने उसे छोड़ देने को कहा। इस तरह गोडसे वहां से चला गया।
इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं है कि गांधी की हत्या तात्कालिक कारणों से नहीं की गई थी, बल्कि वैसा प्रयास पहले से ही योजनाबद्ध तरीके से वे ताकतें कर रही थीं, जिन्हें अपने मार्ग में गांधी अवरोध नजर आते थे।
राजकुमार गुप्ता-
गांधी जी को मार डालने की कोशिश महाराष्ट्रीय चितपावन बिरादरी की उस वर्चस्ववादी सोच का परिणाम थी जिसने मराठा शासकों की मंत्री चुनने की स्वेच्छा को 18वीं शताब्दी में बदलकर अपने वंशजों के लिए पेशवाई के तौर पर आरक्षित करवा लिया था। गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने पर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में किसान, मजदूर, मुसलमान, दलित, आदिवासी, महिला, छात्र आदि समाज के सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना शुरू करने से चितपावनिया वर्चस्ववादी सोच को धक्का लगा।
इससे खुद के सपने बिखरता देखकर चितपावन बिरादरी ने कांग्रेस से अलग होकर हिटलर और मुसोलिनी की तर्ज़ पर हिंदूवादी विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए अपने संगठन खड़े कर दिये और कांग्रेस का विरोध करना शुरू कर दिया। यहां तक कि अंग्रेजों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक आधार पर देश का बंटवारा तक करा दिया लेकिन गांधी जी की हत्या और विभाजन के अपने उस पाप के कारण इनकी दशा अछूतों जैसी हो गई।
कालांतर में कांग्रेस विरोध में विवेक खो बैठे जयप्रकाश नारायण की गलती से गांधी जी के हत्यारों के गिरोह को देश की सत्ता में भागीदारी करने का अवसर मिल गया। उसी का परिणाम है कि आज देश आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अराजकता का दंश झेल रहा है। क्योंकि गोडसे-सावरकर के उपद्रवी चेलों के हाथों में शक्ति चली गई है तो वे अपने राजनीतिक डीएनए में सन्निहित दुर्गुणों के कारण देश को तबाही की ओर ही ले जा रहे हैं।
गांधी जी की हत्या करने के बावजूद भी हत्यारों के उत्तराधिकारी दुनिया भर में जहां कहीं भी चले जायें, गांधी की आड़ लेकर अपना चेहरा चमकाने की कोशिश करते हैं लेकिन ऐसा करने से उनके पाप धुलते नहीं बल्कि वे अपना दोगलापन दिखाते हैं क्योंकि पूरी दुनिया में गांधी को जानने वाले लोग उनके हत्यारों को भी पहचानते हैं।
उसने जिन्ना को क्यों नहीं मारा?
उसने सावरकर को क्यों नहीं मारा?
देश का बंटवारा ही नहीं होता.


