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सुख-दुख

जेब में ट्रांजिस्टर लेकर जेल जाने वाले नावड जी से तर्क करने पर एक ही डायलाग होता- संपादक से बहस!

विभूति नारायण चतुर्वेदी-

क थे नावड़ जी। पूरा नाम चक्रवर्ती गणपति नावड। 28-29 साल पहले उनके साथ काम किया। नावड जी की शख्सियत असामान्य। एक पांव खराब लेकिन आवाज कड़क। टाइम के बेहद पंक्चुअल। ड्यूटी पर न तो लेट और न कभी जल्द घर जाने की हड़बड़ी।

जब हम सहयोगी थे, वो जनरल डेस्क के सेकंड मैन थे। मेरी और साथी शिवजी की पत्रकारिता की कायदे से शुरुआत इसी डेस्क से हुई। जब हमने काम शुरू किया तो डेस्क पर पहले से कई लोग कार्यरत थे। कुमार दिनेश जी बॉस थे।

नावड़ जी पुरानी पीढ़ी के धुरंधर थे लिहाजा शुरू में हमसे काफी रिजर्व रहते थे, लेकिन हम दोनों नये सहयोगियो की कार्यकुशलता ने धीरे-धीरे असर डाला। नावड़ जी के साथ संवाद सहज हुआ। नावड़ जी हमेशा चौड़े मुंह वाला पायजामा पहनते थे और जेब में छोटा सा ट्रांजिस्टर रखते थे।

खबरों से खुद को अपडेट रखने के लिए इस माध्यम पर सबसे ज्यादा भरोसा करते थे। उन्होंने मुझे बताया था कि जब अयोध्या आंदोलन के दौरान जब वो जेल भेजे गये थे तब जेब में छिपाकर ट्रांजिस्टर भीतर लेते गये थे और उसी से खबरें चोरी-छिपे सुना करते थे।

डेस्क पर हम लोग प्राइम टाइम पर टेलीविजन न्यूज़ को मॉनिटर करते थे और जब समाचारों की सूची नावड़ जी को देते तो वो झटपट बनाई जाने वाली खबर टिक कर सूची लौटा देते थे। वजह ये कि वह रेडियो पर पहले ही समाचार सुन और मन ही मन मूल्यांकन कर चुके होते थे।

किसी खबर पर अगर आप तर्क रखते या उनकी कही किसी बात को काटते तो वह अपना एक लाइन का डायलॉग बोलते- संपादक से बहस! उनका यह संवाद हम लोगों में लोकप्रिय था। उनकी एक और खासियत यह कि वह अपने साथ काम करने वाले सहयोगी को न तो मित्र बनाते थे, न ही शत्रु।

अपने कामभर से मतलब रखने वाले नावड़ जी के निधन की दुखद सूचना ने यादों को कुरेद दिया। भैया एक बार बहस करके जाते। ऐसे नावड़ जी को नमन।

मूल खबर…

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