हमारे डियर गौतम चटर्जी के साथ लेकिन ऐसे ही है

gautam chaterji

गौतम चटर्जी मेरा पुराना मित्र है। बहुमुखी प्रतिभा का धनी। धुन का पक्का। वह लेखक भी है, पत्रकार भी, रंगकर्मी और फ़िल्मकार भी, फोटोग्राफर भी। और जाने क्या-क्या। मैथमैटिक्स में पीएचडी है बीएचयू से। लेकिन बीएचयू में ही पत्रकारिता पढ़ाता है। इस के पहले काशी विद्यापीठ में थिएटर पढ़ाता था। नाटक तो गौतम ने कई सारे लिखे ही हैं अब  घूम-घूम कर नाटक करता भी हैं, फिल्म बनाता और दिखाता है। संगीत पर लिखना उस का प्रिय शगल है। भाषा जैसे उस की गुलाम है। उस की भाषा की लय, गति और मिठास महसूस कर कई बार मैं उस से कह चुका हूं कि, ‘डियर तुम्हारे जैसी भाषा और सूचना जो मेरे पास होती तो मैं निर्मल वर्मा से बड़ा कथाकार होता!’ वह यह सुन कर मुस्कुरा भर देता है। तो इतनी समृद्ध भाषा और सूचना से भरपूर गौतम चटर्जी को भाषाएं भी बहुतेरी आती हैं। हिंदी, अंगरेजी, संस्कृत, बांग्ला, मराठी आदि जाने कौन- कौन सी भाषा। और यह भाषाएं उसे न सिर्फ़ आती हैं बल्कि इन सभी भाषाओं पर उस का पूरा अधिकार भी है। गौतम न सिर्फ़ भला आदमी है, मुहब्बत से लबरेज, ऊर्जा से भरपूर यारबास आदमी है।

घुमक्कड़ी में उस्ताद गौतम कब किस पर फ़िदा हो जाए, कब किस पर न्यौछावर हो जाए, वह खुद भी नहीं जानता। लेकिन वह कब किसी से अचानक किस बात पर कतरा जाए, यह भी उस के वश में नहीं होता लगभग। यायावरी जीवन का  कायल गौतम चटर्जी बाहर से बहुत बिखरा-बिखरा दीखता ज़रूर हैं पर भीतर से वह बहुत ही व्यवस्थित, बहुत ही अध्ययनशील और बहुत ही भावुक व्यक्ति है। अमूमन रातें उस की जगी और सुबह सोई होती हैं। इस तरह सुबहे-बनारस को धता बताते हुए वह बनारस में ही रहता है। बनारसी फक्क्ड़ई उस की सांस-सांस में समाई दिखती है, जैसे उस की धमनियों में बहती रहती है यह बनारसी फक्क्ड़ई! गौतम के पास बनारस में शिष्यों और विद्यार्थियों की एक लंबी फौज है। वह कब और कहां अपनी क्लास शुरू कर दे और बच्चे पढ़ने लगें यह कोई नहीं जानता।  

अच्छा संगीत सुनने, अच्छा कुरता पहनने, अच्छी और बढ़ी दाढ़ी का शौक फ़रमाने वाला गौतम कुछ समय शामे-अवध यानी लखनऊ में भी नौकरी करते हुए गुज़ार चुका है। लेकिन लखनऊ कभी उस पर तारी नहीं हो पाया तो सिर्फ़ इस लिए कि वह ज़िंदगी अपने ढंग से जीता है, अपनी शर्तों पर जीता है। हानि-लाभ से दूर गौतम अपने ही मन मर्जी का मालिक है, अपना ही गुलाम है, किसी व्यक्ति, किसी नौकरी, किसी विधा से वह बंध कर रहने वाला जीव नहीं है। रमता जोगी, बहता पानी वाला संत सरीखा गौतम लेकिन काशी नहीं छोड़ता, न कभी छोड़ेगा।

लिखने-पढ़ने की दुनिया में ऐसा बैरागी, ऐसा जानकार और ऐसा बेपरवाह आदमी मैं ने अभी तक नहीं देखा। हम या हमारे जैसे लोग जानते हैं कि गौतम चटर्जी अनमोल आदमी है लेकिन खुद गौतम को लगता है कि वह दो कौड़ी का आदमी है। बिहार के एक गांव से बनारस आ कर बस जाने वाले गौतम ने एक नहीं, अनेक बेमिसाल काम किए हैं। उस की थिएटर और संगीत पर लिखी मानीखेज टिप्पणियां तो अपनी जगह हैं ही, पेंग्विन से आई किताब शिखर से संवाद तो अब खासी चर्चा में है। जिसमें सत्यजीत राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, जयदेव सिंह, उत्प्पल दत्त, बादल सरकार, बव कारंत, बिस्मिल्ला खान से लगायत कुंवर नारायन आदि के दिलचस्प इंटरव्यू भी उस की शान में चार चांद लगाते हैं।

मशहूर नाटकार बादल चटर्जी की आत्मकथा का बंगला से हिंदी में अनुवाद तो किया ही है हमारे गौतम ने, मशहूर तबलावादक किशन महराज की जीवनी भी लिखी है। गौतम के लिखे नाटकों में मृत्यु जिस तरह मछली की तरह छटपटाती हुई रह-रह कर उपस्थित होती है वह कई बार डराती सी चलती है। लगता है कि जैसे गौतम हम से बिछड़ता जा रहा है। लेकिन जब पलट कर उस से मिलता हूं तो वह तो उतनी ही मज़बूती से अपनी ज़िंदगी के दरवाज़े पर खड़ा दोनों हाथ फैलाए मिलने के लिए बेताब दीखता है। गंगा किनारे के इस बेताब बैरागी के अंदाज़ जुदा-जुदा है।

तो आप क्या समझते हैं कि यह सब अनायास ही है? हमारे गौतम के पुरखों ने भी गौतम को रचा है। प्रसिद्ध समाज सुधारक और क्रांतिकारी ईश्वरचंद्र विद्यासागर की नातिन मीरा बनर्जी का बेटा है गौतम चटर्जी। गौतम के दादा सुनीति कुमार चटर्जी भी गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के साथी थे, संस्कृत के विद्वान थे, गुरुदेव के साथ विदेश यात्राओं पर जाते थे। तो इन पुरखों का खून का भी गौतम की परवरिश और माहौल में बहुत योगदान है।

यह भी अनायास नहीं है कि गौतम को इतनी कम उम्र में बड़े-बड़े सम्मान भी मिल गए हैं। फ्रांस का विजडम आफ इंडिया और ड्रामा का सर्वोच्च सम्मान भारत सम्मान भी हमारे डियर गौतम को मिल चुका है।सच यह है कि गौतम को जितने सम्मान मिले कम हैं। क्यों कि यह दुर्भाग्य ही है हमारा कि गौतम की प्रतिभा जिस सम्मान और यश की हकदार है वह उसे अभी तक नहीं मिला है। समय और समाज ने अभी उसे वह मुकाम नहीं दिया है जिस का वह सही अर्थों में हक़दार है ।

एक बार बनारस गया था। गौतम चटर्जी ने बीएचयू के पत्रकारिता के छात्रों की कापियां जांचने को बुलाया था। एक शाम अस्सी घाट पर बैठे-बैठे मैंने अपनी पहली बनारस यात्रा का ज़िक्र किया और हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिलने का विस्तार से वर्णन किया। तो गौतम उछल गया। और मुझ से पूछा कि, ‘अभी तक सब कुछ याद है? ‘मैंने बताया कि, ‘हां, मुझे तो उन का मकान नंबर ए-१५ रविंद्रपुरी तक याद है।’

‘अच्छा?’ उस ने पूछा, ‘उन का मकान आज भी पहचान सकते हो?’ ‘हां, बिलकुल!’

‘अच्छा!’ कह कर वह उठ कर खड़ा हो गया। बोला, ‘आओ तुम्हें एक अच्छी जगह ले चलते हैं।’ फिर वह घाट-घाट की सीढियां चढ़ते-उतरते अचानक ऊपर की तरफ आ गया। बात करते-करते, गली-गली घूमते-घुमाते अचानक एक सड़क पार कर के एक जगह खड़े हो कर बिलकुल किसी फ़िल्म निर्देशक के शाट लेने की तरह इधर-उधर हाथ से ही एंगिल लेते हुए बोला, ‘यह एक, दो, तीन, चार!’ और मेरी तरफ़ देख कर बोला, ‘बताओ इस में से हजारी प्रसाद द्विवेदी का मकान कौन सा है?’

यह सुनते ही मैं अचकचा गया। मैं ने कहा कि, ‘उन के घर के सामने एक बडा सा पार्क था।’

‘तो यह है न वह पार्क। यह पीछे।’ उस ने पीछे मुड़ कर दिखाया। सचमुच हम उस पार्क के सामने ही खड़े थे। जो हड़बड़ाहट में मैं देख नहीं पाया। लेकिन मैं हजारी प्रसाद द्विवेदी का वह 1976 में देखा गया घर पहचान नहीं पाया। तब उन के घर में बाहर बड़ा सा लान था। आम के पेड़ थे। ऐसा कुछ भी किसी भी मकान में नहीं था। तो भी मैंने अनुमान के आधार पर एक मकान को चिन्हित कर दिया और कहा कि, ‘यह मकान है।’

‘बिलकुल नहीं।’ गौतम किसी विजेता की तरह एक मकान दिखाते हुए बोला, ‘यह नहीं बल्कि यह मकान है।’

‘पर इस में तो लान भी नहीं है, आम का पेड़ भी नहीं है और कि मकान भी छोटा है।’ मैं भकुआ कर बोला।

‘मकान वही है। छोटा इस लिए हो गया है कि मकान का बंटवारा हो गया है, उन के बेटों में। और उन्हों ने आगे लॉन के हिस्से में भी निर्माण करवा लिया है सो न पेड़ है आम का, न लॉन है।’ कहते हुए उस ने जैसे पैक-अप कर दिया। बोला, ‘अभी भी कुछ विवाद चल रहा है सो बंद है मकान।’ और हाथ से इशारा किया कि अब चला जाए। हम लोग चलने लगे। मैं उदास हो गया था। एक तनाव सा मन में भर गया। ऐसे जैसे कोई तनाव टंग गया मन में। लगा कि जैसे चलते-चलते गिर पडूंगा। सोचने लगा कि कहां तो हजारी प्रसाद द्विवेदी के इस घर को, इस घर की याद को साझी धरोहर मान कर संजोना चाहिए था, और कहां उस का मूल स्वरुप ही नष्ट नहीं था, विवाद के भी भंवर में लिपट गया था। दिल बैठने सा लगा। पर इस सब से बेखबर गौतम अचानक रुका और पीछे मुडते हुए बोला, ‘ऐसा ही बल्कि इसी कालोनी में मैं भी एक छोटा सा मकान बनाना चाहता हूं। ताकि जहां शांति से रह और पढ-लिख सकूं।’ गौतम के इस कहे ने मुझे जैसे संभाल सा लिया। मैं थोड़ा सहज हुआ। हम लोग अब वापस बीएचयू की ओर पैदल ही बतियाते हुए लौट रहे थे।

ऐसे ही एक बार फिर अस्सी घाट पर हम लोग बैठे थे। वहीं संस्कृत नाटक हो रहा था पास के एक पांडाल में। हम लोग सीढ़ियों पर बैठे थे। रात हो गई थी। उधर नाटक संस्कृत में हो चल रहा था। माइक से संस्कृत में संवाद सुनाई दे रहे थे। इधर गौतम उस को हिंदी में समझाता-बताता जा रहा था। अचानक उठ कर वह खड़ा हो गया। बोला, ‘अब नाटक देखने लायक हो गया है! चल कर देखा जाए!’ हम लोग पांडाल में पहुंच गए। अदभुत नाटक था। संस्कृत में इतनी तैयारी और इतनी नई तकनीक के साथ देखना एक नया अनुभव था। नाटक कर्ण और परशुराम प्रसंग पर था। तमिलनाडु से आया नाट्य दल उसे प्रस्तुत कर रहा था। इससे पहले यह नाटक बनारस में खेला नहीं गया था। फिर भी गौतम को सारे नाटक की जानकारी थी तो सिर्फ इसलिए की उसने संस्कृत में वह नाटक पढ़ा हुआ था।

यही क्या गौतम कब और किस भाषा की कौन सी रचना नहीं पढ़े होता। हां, पर वह लंबे समय तक अख़बार में काम करने के बावजूद अख़बार नहीं पढ़ता। एक बार क्या हुआ कि  बनारस में आतंकवादी घटना हुई। घाट पर भी हुई थी। गौतम अक्सर घाट-घाट घूमता रहता है। तो मुझे खबर सुन कर चिंता हुई। फ़ोन किया तो पता चला कि उसे तो घटना के बारे में पता ही नहीं था। मैंने बताया कि अखबारों में खबर है। पर वह बेफिक्र बोला, ‘चलो मैं सुरक्षित हूं! अब खुश!’ अखबारों के बारे में उसकी राय वैसे भी कभी अच्छी नहीं रही। न ही तमाम लोगों के बारे में।

अमूमन लोग व्यवस्थित ज़िंदगी जीना चाहते हैं। कि एक अच्छी सी नौकरी हो, बीवी बच्चे हों, सुविधाएं आदि हों। हेन-तेन हो। पर गौतम यहां भी बादशाह है अपनी मर्जी का। वह किसी से बंध कर नहीं रह सकता। अपनी किसी माशूका से भी। आप यह सब जान कर अफना जा रहे हों तो अफना जाइए।

हमारे डियर गौतम चटर्जी के साथ लेकिन ऐसे ही है।

कई बार उसके मेसेज भी संगीतमय होते हैं। वह किसी शाम बारिश में भीगते हुए लिख सकता है कि फलां घाट से भीगते हुए। या फलां रास्ते में ट्रेन से। चांदनी रात में तुम्हें सोचते हुए। निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए। रविशंकर का संगीत सुनते हुए भोर में। सुबह सोने जाते हुए शुभ असवारी प्रभात भी वह लिख सकता है। ऐसा या वैसा वह कुछ भी लिख सकता है। गोया मैं उस का दोस्त नहीं महबूबा होऊं! अब अलग बात है कि मैं खुद उस का आशिक हूं।

एक बार वह एक नाटक ले कर लखनऊ आया। आता ही रहता है। राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में नाटक किया। एक तो नाटक अलग हट कर था ही। दूसरे बीच नाटक में शास्त्रीय संगीत शुरू हो जाता। लोग उठ -उठ कर जाने लगे। बाद में मैंने उसे इस बात पर टोका। तो वह बोला, ‘जिस को नाटक देखना हो देखे, न देखना हो तो न देखे। लेकिन मैं तो नाटक ऐसे ही करूंगा। क्यों कि नाटक ऐसे ही होता है। और नाटक ही क्यों गौतम तो ज़िंदगी भी इसी तेवर और ज़िद के साथ जीने का आदी है। अपनी ही शर्तों पर ज़िंदगी जीना आसान नहीं होता। लेकिन गौतम ने यह संभव कर दिखाया है। साला पता नहीं किस चक्की का आटा खाता है। हां, यह ज़रूर है कि गौतम बनारस का जैसे आशिक है। बनारस उस में बोलता है। कि बनारस में गौतम बोलता है?

पता नहीं ।
 
पर यह ज़रूर पता है कि गौतम मुझ में बोलता है। तो क्या मैं भी गौतम में बोलता हूं?

क्या पता?

हां, यह ज़रूर पता है कि  आज हमारे इसी डियर गौतम चटर्जी का जन्म-दिन है। वह गौतम चटर्जी जो आजकल फेसबुक पर गौतम फकीर के नाम से उपस्थित है। तो शायद इस लिए भी की उस के मूड की तरह उस के शेड्स भी बहुत हैं। बहुत बधाई डियर! तुम्हारे फकीर को भी। इसलिए भी कि भोगी ही जोगी बन सकता है। मेरे जोगी, मेरे प्रिय, मेरे बाबू मोशाय, माई डियर गौतम तुम ऐसे ही मस्त और प्रसन्न रह कर सर्वदा अनूठा ही रचते रहो। ईश्वर ने तुम्हें इसीलिए रचा है।

 

लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं. उनसे संपर्क 09415130127, 09335233424 और dayanand.pandey@yahoo.com के जरिए किया जा सकता है। यह लेख उनके ब्‍लॉग सरोकारनामा से साभार लिया गया है।



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