गीता प्रेस को बड़ा झटका, एक श्लोक के दो अलग-अलग अर्थ बताने पर कोर्ट में हुई फजीहत

‘गीता प्रेस’ द्वारा प्रकाशित अपनी दो पुस्तकों में श्रीमद्भगवत गीता के एक ही श्लोक का अलग-अलग बिल्कुल विरोधाभास के साथ अर्थों को लेकर ‘यथार्थ फाउन्डेशन’ ने दिल्ली की जिला न्यायालय तीस हजारी में एक परिवाद दायर किया था जिसका २० अगस्त को फैसला आया है जिसमें सिविल जज श्री राकेश कुमार सिंह ने दोनों पक्षों की मौजूदगी में यह स्वीकारते हुये कि वाकई एक ही श्लोक का बिल्कुल विरोधाभाष के साथ अलग-अलग अर्थ है, अपने आदेश में ‘गीता प्रेस’ को यह कहा है कि वह अपनी दोनों किताबों के समान श्लोकों के अर्थ समान करे भले ही व्याख्या कुछ भी करे. आदेश की प्रतिलिपि आपके अवलोकनार्थ सलग्न है.

चूँकि ‘गीता प्रेस’ धार्मिक पुस्तक प्रकाशन क्षेत्र में एक जाना माना बड़ा नाम है इसलिए हम चाहते हैं कि आपकी वेबसाईट के माध्यम से ‘गीता प्रेस’ के पाठकों तक यह बात पहुंचे कि गीता प्रेस से प्रकाशित सभी कुछ अकाट्य और प्रामाणिक नहीं है अतएव पाठक अपने स्वविवेक का इस्तेमाल करते हुये ही कुछ भी पढ़े-समझे.  Please Find attached PRESS RELEASE enclosed with court order copy.

Siddhartha Pratap Singh
Gen.Secretary
Yathartha Foundation
Delhi-110006


प्रेस विज्ञप्ति

गीता प्रेस को गीता में बदलाव का न्यायालय का आदेश

यथार्थ फाउण्डेशन द्वारा गीता प्रेस गोरखपुर के खिलाफ दायर परिवाद नं0 407/2013 में प्रतिवादी से पूछा गया था कि श्रीगीता जी के प्रथम अध्याय के दसवें श्लोक का, उनके ही प्रकाशन से प्रकाशित दो पुस्तकों में अनुवाद में विरोधभास का कारण क्या है?

श्लोक-

अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्।।

श्रीमद्भगवद्गीता (श्लोकार्थसहित) कोड नं0 1602 के अनुसार इसका अर्थ है- ”भीष्मपितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है और भीमद्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है।”

उपरोक्त श्लोक का गीता-प्रबोधनी कोड नं0 1562 के अनुसार अर्थ ये है- ”(द्रोणाचार्य को चुप देखकर दुर्योधन के मन में विचार हुआ कि वास्तव में) हमारी वह सेना (पाण्डवों पर विजय करने में) अपर्याप्त है, असमर्थ है, क्योंकि उसके संरक्षक (उभय-पक्षपाती) भीष्म हैं। परन्तु इन पाण्डवों की यह सेना (हम पर विजय करने में) पर्याप्त है, समर्थ है, क्योंकि इसके संरक्षक (निजसेना-पक्षपाती) भीमसेन हैं।”

उपर्युक्त एक ही श्लोक के दो पुस्तकों में विरोधभास होने को मान्नीय न्यायालय ने भी स्वीकारा और दोनों पक्षों की मौजूदगी में दिल्ली की तीस हजारी जिला न्यायालय के दीवानी न्यायाधीश श्री राकेश कुमार सिंह ने अपने निर्णय में कहा कि चूंकि गीता प्रेस ने ही दोनों पुस्तकों का प्रकाशन किया है अतः दोनों पुस्तकों के एक ही श्लोक का एक ही अर्थ होना चाहिए न कि अलग-अलग। अतएव, अविलम्ब गीता प्रेस को यह आदेशित किया जाता है कि वह अपनी दोनों पुस्तकों के सभी श्लोकों के समान अर्थ करें।

कोर्ट आदेश की कापी ये है…



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