आर. अनुराधा को याद करते हुए डा. जुल्का बोले- कैंसर जागरूकता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करना ज़रूरी

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नई दिल्ली। कैंसर के चोटी के विशेषज्ञ देश के तमाम स्कूली पाठ्यक्रमों में कैंसर जागरूकता को शामिल करने के हक में हैं। उनका मानना है कि लड़कियों के शरीर और खासकर स्तन में होने वाले बदलावों को भी सिलेबस में शमिल किया जाना चाहिए। ऐसा करके लाखों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं क्योंकि अगर अगर इन बदलावों को समय पर पहचान कर कैंसर के मामलों का इलाज किया जाए तो स्तन कैंसर पूरी तरह ठीक हो सकता है।

दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स ) में, पिछले दिनों, कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने में भूमिका अदा करने वालीं आर. अनुराधा को याद करते हुए संस्थान के डीन तथा कार्यवाहक निदेशक डॉ. पी.के. जुल्का ने यह बात कही। भारतीय सूचना सेवा की अधिकारी आर अनुराधा ने कैंसर से 17 साल के संघर्ष के बाद पिछले महीने एम्स में अंतिम सांस ली थी। कैंसर पेशेंट्स एड एसोसिएशन के सहयोग से एम्स के सर्जरी विभाग ने उनकी याद में ‘ब्रेस्ट हेल्थ डे’ मनाया था।

कैंसर विशेषज्ञ डॉ. जुल्का ने इस मौके पर यह भी कहा कि कैंसर के 40 फीसदी मामले तंबाकू जनित हैं और सरकार तथा समाज के हस्तक्षेप से उन्हें रोका जा सकता है। बाकी मामलों में भी अगर कैंसर का समय पर पता चल जाए तो न सिर्फ इलाज के सफल होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है, बल्कि खर्च और तकलीफ भी कम हो जाती है। उन्होंने स्वस्थ जीवन शैली अपनाने पर भी जोर दिया।

कैंसर के खिलाफ आर अनुराधा के अभियानों को याद करते हुए एम्स के सर्जरी विभाग के प्रोफेसर और हेड डॉ. अनुराग श्रीवास्तव ने कहा कि महिलाओं और इससे भी ज्यादा पूरे समाज में कैंसर के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करना जरूरी है। इसमें सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि कैंसर का मतलब जल्द ही मौत हो जाना है। जबकि यह सही नही है। समय रहते पहचान और आधुनिक इलाज के कारण अब कैंसर के कई मरीज लंबी जिंदगी जीने लगे हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि 30 साल से ज्यादा उम्र की देश की तमाम महिलाओं की स्तन कैंसर के लिए स्क्रीनिंग हो सके, ऐसा कार्यक्रम सरकार को बनाना चाहिए और स्कूल में ही इस बार में बताया जाना चाहिए। डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि कैंसर के इलाज की विशेषज्ञता न रखने वाले डॉक्टर और होम्योपैथी जैसी प्रणाली के चिकित्सक कैंसर का इलाज न करें, इसके लिए सरकार को दिशा निर्देश देना चाहिए क्योंकि उनके धोखे में आकर लोग अक्सर काफी देर से अस्पताल आते हैं, जब इलाज नामुमकिन हो चुका होता है।

आर. अनुराधा के इलाज के आखिरी दौर में सक्रिय उनके साथ कई कैंसर जागरूकता कार्यक्रम में सहयोगी रहे एम्स के डॉ. अभिषेक शंकर ने कहा कि मरीज के लिए जरूरी है कैंसर के बारे में अपनी जानकारी और नजरिये का इस्तेमाल अपने इलाज में भी करे। अनुराधा की जिंदगी का यह एक बहुत बड़ा सबक क्योंकि वह स्तन कैंसर की शिकार होने के बावजूद एक बेहद सक्रिय और कर्मठ जिंदगी जी कर गईं। कैंसर के साथ भी जीवन है, यह अनुराधा के जीवन का मूल मंत्र था। इस मौके पर आर. अनुराधा की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘भोर’ भी दिखाई गई। इस फिल्म को जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों ने बनाया है।

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