
संजय कुमार सिंह
बिहार में चुनाव होने हैं, मतदाता सूची का विशेष सघन पुनरीक्षण इसीलिये हो रहा है और जब मामला व्यवस्था के खिलाफ हो तो दिल्ली में खबर नहीं छपती है। सत्ता की सेवा का मौका हो तो जरूर छपती है। यही चल रहा है। आज खबर छपी है तो देखिये कि कैसे सत्ता की सेवा की गई है और किन लोगों में इसमें भी अपनी पत्रकारिता की है, उसकी लाज बचाई है। इस संबंध में आज अमर उजाला की सबसे बड़ी खबर यही है कि बिहार में बांग्लादेश, म्यांमार और नेपाल के घुसपैठिये भी वोटर और इनके नाम हटाये जायेंगे। लेकिन तेजस्वी यादव समेत इंडिया गठंधन ने डाटा पर सवाल उठाया है और आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग फर्जी डाटा अपलोड कर रहा है। यह द हिन्दू की खबर में है। ऐसे में हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बताया, एसआईआर में बड़ी संख्या में नेपाली, बांग्लादेशी मिले। हिन्दी के मेरे तीसरे अखबार, देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, अब देशभर में मतदाता सूची संशोधन की तैयारी। अमर उजाला की खबर का उपशीर्षक है, चुनाव आयोग ने कहा – इनके पास वोटर, आधार राशन कार्ड जैसे पहचान दस्तावेज, 30 सितंबर को जारी अंतिम मतदाता सूची में नाम शामिल नहीं होंगे।
इससे पहले खबर थी कि बिहार के सीमांत क्षेत्रों में नेपाल के बहुत सारे लोग बसे हुए हैं। इंडियन एक्सप्रेस की एक पुरानी खबर के अनुसार, नेपाल-बिहार सीमा पर एक गांव की मुखिया को भी डर है कि वह इस बार वोट नहीं दे पायेगी। इसका कारण यह है कि वह मूल रूप से नेपाल की है। हालांकि, बिहार के आठ सीमाई जिले के लोगों के वैवाहिक संबंध नेपाल के लोगों से हैं। ऐसे सैकड़ों अन्य लोग यहां हैं। खबर के अनुसार ये लोग पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। तब मैंने लिखा था, कानूनन माता पिता में से कोई एक पाकिस्तान का नागरिक हो तो भारत की नागरिकता या भारतीय मूल का नागरिक नहीं मानने का नियम है लेकिन नेपाल के लोगों के साथ ऐसा नहीं है। वे यहां रहते, नौकरी करते हैं और आम नागरिक के सभी अधिकार उन्हें मिले हुए हैं। आधार और मतदाता परिचय पत्र भी बने हुए हैं। भारत के लोग भी नेपाल में बिना पासपोर्ट आते जाते हैं। नेपाल में रहने वालों को मैं नहीं जानता लेकिन नेपाल के लोग तो भारत में रहते ही हैं। वैसे भी नियम यही है कि किसी चुनाव क्षेत्र में सामान्य तौर पर रहने वाला वोट दे सकता है, मुखिया है ही तो इस बार क्यों नहीं? अगर नियम कुछ और बनेगा या है तो उसे लागू करने का काम चुनाव आयोग का नहीं है और यह सिर्फ मतदान के मामले में नहीं हो सकता है। अगर ऐसा है भी तो स्पष्ट घोषणा होनी चाहिये। यही नहीं, नेपाल के लोग जब पासपोर्ट के बिना रह सकते हैं, उनके आधार कार्ड है तो वोटर भी हैं और नहीं हैं तो उन्हें तमाम सरकारी सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिये और अगर मिल रही हैं तो वे इन सुविधाओं को देने वालों का चुनाव क्यों नहीं कर सकते हैं और नहीं कर सकते हैं तो इनलोगों को सुविधायें क्यों मिलती रहीं, चिह्नित क्यों नहीं किया गया, पिछले चुनावों में वोट क्यों देने दिया गया और अगर यह सब तब गलत नहीं था तो अब कैसे है और अगर तब भी गलत था तो गलती करने वाले को क्या सजा दी गई, कौन दोषी है, किसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये कौन करेगा।
दूसरे देशों के नागरिकों के मामले में, जहां पासपोर्ट जरूरी है, उनका सामान्य तौर पर रहना ही गलत है और इसके लिए जिम्मेदार दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करके इन्हें बाकायदा मतदाता सूची से निकाला जाना चाहिये पर मतदाता सूची में होने की शर्त तो वे पूरी करते हैं। इसके अलावा, डोमिसाइल सर्टिफिकेट वालों को वोट देने का अधिकार होता है। कैम्ब्रिज इंटरनेशनल डिक्सनरी ऑफ इंग्लीश के अनुसार डोमिसाइल का औपचारिक या कानूनी मतलब है, स्थान जहां व्यक्ति रहता है। उदाहरण है, डोमिसाइल में किसी परिवर्तन की सूचना संबंधित अधिकारियों को दी जानी चाहिये। मैकमिलन इंग्लीश डिक्सनरी के अनुसार, किसी व्यक्ति का घर। जाहिर है कोई किसी स्थान का डोमिसाइल है – का मतलब हुआ उसका वहां घर है और घर है तो सामान्य तौर पर रहता है। सामान्य तौर पर रहने वाला ही वोटर होता है। वह विदेशी है या भारतीय नहीं है – इसकी पहचान करना या साबित करना चुनाव आयोग का काम नहीं हो सकता है। इसके अलावा, इंडियन एक्सप्रेस रोज बिहार के गांवों और जिलों से खबरें छाप रहा है। हाल की एक खबर में बताया गया था कि राज्य में इन दिनों डोमिसाइल सर्टिफिकेट की मांग सबसे ज्यादा है और लांखों मांग लंबित हैं। इसका कारण यह बताया गया था कि डोमिसाइल सर्टिफिकेट के लिए सिर्फ आधार कार्ड की जरूरत है और दिलचस्प यह है कि आधार कार्ड चुनाव आयोग द्वारा मांगे गये 10 दस्तावेजों में नहीं है। मैंने लिखा था कि मीडिया का काम ऐसी ही विसंगतियों, विडंबनाओं और मनमानियों को सामने लाना है। पर इन दिनों दिल्ली के अखबारों में यह काम सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस कर रहा है। बाकी ने भले सुप्रीम कोर्ट में याचिका स्वीकार होने जैसी दिल्ली को खबर को पहले पन्ने पर रखा है लेकिन दो अखबार ऐसे भी हैं जिनने इस महत्वपूर्ण खबर को सिंगल कॉलम में निपटा दिया है।
उस दिन नवोदय टाइम्स में यह खबर सुप्रीम कोर्ट की आधे कॉलम की फोटो के साथ दो कॉलम में छोटी सी थी पर अमर उजाला के दोनों पहले या आधे पन्नों में बिहार की एक भी खबर नहीं थी। मुझे लगता है कि किसी डोमिसाइल को वोटर नहीं मानना बड़ी खबर है लेकिन बड़ी खबर छपेगी ही नहीं तो बड़ी कैसे होगी। इसलिये खबरों के चयन पर ध्यान रखने की जरूरत है। बार-बार सभी अखबार अगर खबरों के चयन का तरीका बदल दें तो खबर की परिभाषा भी बदल जायेगी और उसकी भी कोशिश चल ही रही है। अमर उजाला में आज एक खबर है, 28 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद पूरे देश में पुनरीक्षण कार्यक्रम संभव। मैंने कल (रविवार, 13 जुलाई 2025) को यहां लिखा था, …. इसमें इंडियन एक्सप्रेस की खबर दब गई है जो आज सभी अखबारों में प्रमुखता से होनी चाहिये थी। आप जानते हैं कि बिहार की मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण का काम चल रहा है। उससे संबंधित विवाद हैं और चुनाव आयोग के अधिकार भी चर्चा में हैं। इन सबके साथ यह आशंका तो है ही चुनाव आयोग यह सब भारतीय जनता पार्टी के फायदे के लिए कर रहा है जो इस समय केंद्र के साथ कई राज्यों में सत्तारूढ़ है। ऐसे में आज खबर है कि चुनाव आयोग ने सभी राज्यों से सघन पुनरीक्षण की तैयारी करने के लिए कहा है। इसका मकसद चाहे जो हो, जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है तो चुनाव आयोग को आगे की कार्रवाई शुरू करने से पहले फैसले का इंतजार करना चाहिये था। लेकिन यह तो तब होता जब मुख्य चुनाव आयुक्त की नियु्क्ति पर फैसला आया होता। हालांकि वह अलग मुद्दा है।
आज इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, देश भर में मतदाता सूची को संशोधित करने के चुनाव आयोग के कदम पर विपक्ष ने कहा, जल्दबाजी क्यों, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कीजिये। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, बिहार में अभियान को चुनौती दिये जाने के एक दिन बाद राज्यों के सीईओ को चुनाव आयोग का पत्र। यह चुनाव आयोग के पत्र के संदर्भ में है जो इंडियन एक्सप्रेस में कल छपी थी। इस खबर का उपशीर्षक है, विपक्षी नेताओं ने कहा, कार्य पूरा होने से पहले भिन्न दलों से कोई कंसलटेशन नहीं। एक तरफ अगर बिहार चुनाव को लेकर चुनाव आयोग जल्दी में है तो दूसरी तरफ नीतिश कुमार अपना नया-अनूठा प्रयास कर रहे हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स का आज का शीर्षक है, चुनाव से दो महीने पहले नीतिश कुमार ने 10 मिलियन यानी एक करोड़ नौकरियों का आश्वासन। मतदाताओं को बेवकूफ बनाने या समझने की यह पराकाष्ठा हो सकती है पर अभी यह मुद्दा नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया और द टेलीग्राफ में आज पहले पन्ने पर बिहार चुनाव पर कुछ खास नहीं है। यहां लीड हवाई दुर्घटना से संबंधित कल की रिपोर्ट और उसपर प्रतिक्रिया है जो अलग गंभीर मामला है लेकिन गुजरात में हुई दुर्घटना, जमीन पर हुए नकसान को भूलकर इधर-उधर की बातों की अलग राजनीतिक शक्ति है जो संबंद्ध लोगों को दी जा रही होगी।
दि एशियन एज की लीड का शीर्षक चुनाव आयोग के हवाले से है, कई नेपाली और बांग्लादेशी बिहार में वोटर हैं। इसके साथ चुनाव आयोग के मन की बात दो बुलेट प्वाइंट के रूप में है फ्लैग शीर्षक है। इनमें पहला है, अवैध प्रवासी अंतिम वोटर लिस्ट में नहीं रहेंगे। दूसरा है, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद चुनाव आयोग देश भर में एसआईआर की योजना बना रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस खबर के साथ यह बताया जाना चाहिये था कि ये वोटर कब से हैं, लोकसभा चुनाव के समय थे या नहीं और थे तो लोकसभा चुनाव गलत हुए या नहीं और नहीं हैं तो बिहार चुनाव में मतदाता क्यों नहीं रहेंगे। और सबसे बड़ा सवाल रहने किसने दिया, उसके खिलाफ कार्रवाई कौन करेगा या क्यों नहीं हुई। नरेन्द्र मोदी यह आरोप लगाते रहे हैं कि राजनीतिक दल घुसपैठियों को रहने देकर उनके वोट लेते हैं। इस बार तो सत्ता भाजपा की थी, लोकसभा चुनाव में वोट मिल भी गये तो अब दिक्कत क्यों हो रही है। यहां यह दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश के खरगोन में एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा था कि उसकी मंशा बहुत खतरनाक है और वह मोदी के खिलाफ ‘वोट जिहाद’ का आह्वान करती है। उन्होंने कहा, ‘भारत इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है; आपको यह तय करना होगा कि देश वोट जिहाद से चलेगा या राम राज्य से।’
विश्व वोक्कालिगा महासमस्तन मठ के महंत कुमार चंद्रशेखरनाथ स्वामीजी ने कहा है कि ऐसा कानून लाया जाना चाहिए जिसमें मुस्लिम समुदाय के पास वोट देने का अधिकार न हो। उन्होंने कहा, …. ‘इसी तरह, भारत में भी, अगर हम यह सुनिश्चित करते हैं कि उन्हें (मुसलमानों को) वोट देने का अधिकार नहीं है, तो वे अपने आप में (सीमित) रहेंगे और हर कोई शांति से रह सकता है।’ यही नहीं, 12 अप्रैल 2015 की एक खबर के अनुसार, शिवसेना के नेता और सांसद संजय राउत ने कहा था कि मुसलमानों को पांच साल के लिए वोट देने का अधिकार छोड़ देना चाहिए। पार्टी के मुखपत्र सामना में लिखे लेख में उन्होंने देश के मुसलमानों के पिछड़ेपने के लिए उनके वोट बैंक की राजनीति को वजह बताया, जिससे निपटने के लिए ‘कुछ कठोर निर्णय’ लेने की ज़रूरत है। अजमेर दरगाह प्रमुख के उत्तराधिकारी और ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल के चेयरमैन सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने भी कहा है कि पिछली सरकारों में मुसलमान एक वोट बैंक थे। उनके उत्थान को लेकर बड़ी-बड़ी बातें होती थीं, लेकिन कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोट बैंक की राजनीति का खात्मा किया। यहां यह बताना जरूरी है कि नेपाली होने के कारण अगर ऐसे वोटर हटाये गये जो डोमिसाइल भी हैं, तो वो हिन्दू ही होंगे। द हिन्दू की लीड है, बिहार की मतदाता सूची में विदेशी पाये गये हैं; इंडिया (समूह) ने डाटा पर सवाल उठाये हैं। खबर के अनुसार, इस तरह की खामियां जनता का विश्वास कम करती हैं और चुनाव आयोग के वेबसाइट पर फर्जी डाटा अपलोड किये जा रहे हैं। तेजस्वी यादव ने आयोग के इस दावे को खारिज कर दिया है।
राज्यसभा के लिए नामांकन
आज की दूसरी बड़ी खबर राज्यसभा के लिए नामांकन है। इनमें सबसे चौंकाने वाला नाम अजमल कसाब के खिलाफ वकील रहे उज्ज्वल निकम। वे सरकारी वकील थे और अपने काम के लिए उन्हें वेतन भत्ते मिले हैं। सुनवाई के दौरान उन्होंने कसाब को बिरयानी खिलाने की कहानी गढ़कर उसका प्रचार किया था। इसका राजनीतिक मकसद तब साफ हो गया जब भाजपा ने उज्जवल निकम को चुनाव लड़ने का टिकट दिया। हालांकि वे चुनाव हार गये। अब उन्हें राज्य सभा में मनोनीत किया जाना टिकट रूपी ईनाम का लाभ नहीं होने के कारण है। ईनाम देने की जिद्द राज्यसभा की सदस्यता के रूप में सामने आई है। भले इसके लिए जो कारण बताया गया है वह चुनाव का टिकट मिलने और हार जाने के बाद भी ईनाम मिलने से साबित करता है कि जो किया गया वह भाजपा से लाभ या भाजपा के लाभ के लिए उसके अघोषित या अस्पष्ट सहयोग से किया गया हो सकता है। ऐसे में कसाब को फांसी के लिए ईनाम अगर दिया ही जाना था तो उसे दिया जाना चाहिये था जो उसे जिन्दा पकड़े या पकड़ पाये या गोली मारकर जान नहीं ली। क्योंकि यह सब इसी कारण हो पाया। और बहादुरी अगर थी तो वही थी। कल्पना कीजिये कि कसाब को मार दिया गया होता, अदालत से बरी हो जाता या ऐसा ही कुछ और…. तब यह ईनाम दिया ही नहीं जा सकता था। उचित प्रक्रिया के तहत फांसी हुई तो ईनाम फांसी दिलाने वाले को क्यों? फांसी की सजा देने वाले को क्यों नहीं, जिन्दा पकड़ने वाले को क्यों नहीं या फांसी लगाने वाले को ही क्यों नहीं? ईनाम तब जायज होता जब सरकारी वकील चुनाव नहीं लड़े होते, हारते नहीं। हारने के बाद ईनाम से मामला बिल्कुल अलग हो जाता है।
दूसरी ओर, पुलवामा के आतंकी नहीं, पहलगाम वाले नहीं पकड़े, समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट में सजा नहीं हुई, मालेगांव विस्फोट की कहानी सबको पता है फिर भी फांसी दिलाने वाले सरकारी वकील को वेतन-भत्तों के बाद ईनाम। आज छपी ‘ईनाम’ की यह खबर देश की न्याय व्यवस्था पर गंभीर टिप्पणी है। बुलडोजर न्याय और मुठभेड़ में न्याय करने वालों को उसकी जरूरत ही नहीं लगी। लेकिन नौकरी करने, वेतन-भत्ता लेने वाले प्रचारक को कहानी गढ़ने का ईनाम – भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं है? समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट, मालेगांव विस्फोट में सजा हुई? क्यों नहीं हुई और आरोपी कौन हैं, मुकदमे की क्या स्थिति है – पूरी कहानी साफ हो जायेगी। पर गोदी वालों हिम्मत है। पूरी कहानी बताने की या जरूरत ही नहीं है? नौकरी करने, वेतन-भत्ता लेने वाले प्रचारक को उस समय की सरकार या व्यवस्था के खिलाफ कहानी गढ़ने का यह ईनाम – भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार को बढ़ावा नहीं है? कैसे तय होगा?


