जीएसटी का सच (पार्ट 25 से 36 तक) : छोटे अखबारों पर डीएवीपी के जरिए जीएसटी की मार

जीएसटी का सच (35) फर्नीचर पर जीएसटी 28 प्रतिशत, हीरे पर तीन

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

हस्तशिल्प पर जीएसटी के बारे में लिखते हुए पता चला कि सहारनपुर के वुड कार्विंग उद्योग पर 28 प्रतिशत जीएसटी है। यकीन नहीं हुआ पर पुष्टि करने की कोशिश की तो पता चला कि लकड़ी और लकड़ी के फर्नीचर पर जीएसटी की दर शून्य से लेकर 28 प्रतिशत तक है। मैं पहले लिख चुका हूं कि जीएसटी कौंसिल की या कोई और अधिकृत या सरकारी साइट ऐसी नहीं है जिससे आप जो सूचना चाहें गूगल करके प्राप्त कर सकें। तमाम सूचनाएं बिखरी हुई हैं और जीएसटी की साइट पर सूचनाएं पीडीएफ फॉर्मैंट में हैं जिन्हें कायदे से, श्रेणी के अनुसार टैग नहीं किया गया है। इसलिए कोई भी सूचना ढूंढ़ना और उसपर यकीन करना भारी मुसीबत है। सरकारी विज्ञप्तियां ढूंढ़ना तो गधे के सिर पर सींग ढूंढ़ने की तरह है। मैंने यह सूचना एक वेबसाइट से ली है और यह एक जुलाई 2017 को जीएसटी लागू होने से पहले की है।

इसके मुताबिक, लकड़ी के उत्पाद की किस्म के आधार पर जीएसटी की दर में भारी अंतर है और कहने की जरूरत नही है कि किस्म के लिहाज से टैक्स होने के नाते भविष्य में खरीदार और विक्रेता के बीच इस बात पर भी विवाद होगा कि फर्नीचर दरअसल किस किस्म का है और कौन सी दर लगाई जाए। जीएसटी के तहत जलाने की लकड़ी या ईंधन के रूप में उपयोग की जाने वाली लकड़ी और लकड़ी का कोयला (चारकोल समेत) टैक्स मुक्त है यानी इसपर टैक्स की दर शून्य है। इसी तरह लकड़ी के छोटे-बड़े टुकड़े, काटने, छीलने से निकलने वाले टुकड़े, खुरचन या कुन्नी (लॉग, ब्रिक्वेट, पेलेट या ऐसे ही किसी अन्य रूप में) पर पांच प्रतिशत, लकड़ी या लकड़ी के फर्नीचर पर 12 प्रतिशत, लकड़ी और लकड़ी के खास तरह के उत्पादों (इसकी पूरी सूची है, इसमें बोर्ड शामिल है) पर 18 प्रतिशत और लकड़ी के खास उत्पादों (इसकी भी सूची है और बेलना-चकला शामिल है) पर 28 प्रतिशत जीएसटी है। और यह सब तब है जब जीएसटी को “एक भारत, एक टैक्स” और “आसान” कहा जा रहा है।

जीएसटी लागू होने से पहले बिक्री कर में पंजीकृत व्यापारी अपना सामान राज्य के बाहर के ग्राहकों को नहीं बेच सकता था। बिक्री कर राज्य का मामला है और वसूला गया कर राज्य सरकार के पास जाता है। तब दूसरे राज्य में सामान बेचने/भेजने के लिए व्यापारियों को सेंट्रल सेल्स टैक्स (सीएसटी) में पंजीकरण कराना होता था और जो सीएसटी नंबर लेते थे वही दूसरे राज्य में सामान भेजते थे। ज्यादातर छोटे व्यापारी सीएसटी में पंजीकृत नहीं होते थे। सीएसटी में पंजीकृत न होने के बावजूद दूसरे राज्य में माल बेचने का तरीका व्यापारियों ने ढूंढ़ लिया था और खूब चल रहा था। अब जीएसटी में भी वही हालत है। दूसरे राज्य में बिक्री के लिए उस राज्य में पंजीकरण जरूरी है और अगर जरूरी नहीं है तो स्थानीय प्रतिनिधि रखना पर्याप्त होगा। देखिए पहले नियमों की धज्जी कैसे उड़ाई जाती थी और अब क्यों नहीं उड़ाई जाएगी। मेरे ख्याल से अब यह काम आसान हो गया है। हालांकि ट्रक से सामान भेजने के लिए ई वेबिल का नियम लागू होने वाला है और वह अलग समस्या व मुसीबत साबित होने वाला है। 

दिल्ली के कीर्ति नगर से गाजियाबाद, फरीदाबाद या गुड़गांव के लिए फर्नीचर पहले सीएसटी (सेंट्रल सेल्स टैक्स) नंबर के बिना नहीं भेजे जा सकते थे। दुकानदारों ने तरीका ने यह निकाला कि वे बाहर के किसी खरीदार को नकद लेकर माल बेच देते थे और उसे गाजियाबाद या दूसरे राज्य के पते पर यह कहकर भेजा जाता था कि दहेज का सामान है, दिल्ली से आ रहा है। अब दहेज के सामान के लिए क्या रसीद, कागज या परमिट। रसीद दिल्ली के पते की होती थी सामान गाजियाबाद या गुड़गांव पहुंच जाता था। इसके लिए बाकायदा शादी के कार्ड बनाए जाते थे और बच्चों के नाम भी पूछ लिए जाते थे। कहने की जरूरत नहीं है कि इसके लिए बॉर्डर पर पैसे लिए-दिए जाते होंगे पर दहेज जैसे जरूरी सामान को न रोकने का अलिखित नियम भी था। अब ये सामान दिल्ली स्थित गोदाम से भेजे जाएंगे। नया नियम लागू हो तो फिर देखूंगा।

दिल्ली के फर्नीचर निर्माताओं ने फर्नीचर पर 28 प्रतिशत जीएसटी का विरोध किया है और तीन दिन दुकानें बंद रखी थीं। सरकार ने फर्नीचर को लक्जरी माना है पर मेज कुर्सी के बिना कहां कौन काम कर पाएगा यह नहीं सोचा। पहले फर्नीचर पर टैक्स 12 प्रतिशत था। दिल्ली फर्नीचर फेडरेशन ने कहा है कि फर्नीचर को लक्जरी आयटम मानकर 28% टैक्स लगाया गया है जबकि हीरे पर सिर्फ 3% टैक्स है।

इसके आगे का पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *