बलिया के एक छोटे दुकानदार के लिए GST वाकई ‘गब्बर सिंह टैक्स’ बन गया.. सुनिए ये धमकी

प्रिय यशवंत भाई,

सप्रेम नमस्कार ,

मैं सिंहासन चौहान जिला-बलिया का निवासी हूँ. अपने इस मेल द्वारा मैं आपका ध्यान इस और दिलाना चाहता हूँ कि मैं समय पास करने के लिए एक छोटी सी दुकान चलाता हूँ. इसमें इन्टरनेट से सम्बंधित काम करता हूँ,. CSC (COMMON SERVICE CENTRE), और वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर का काम करता हूँ. जब GST शुरू हुआ तो GOVT ने ये ऐलान किया कि जिसका टर्नओवर 20 लाख से कम है,  उसको GST रजिस्ट्रेशन की जरुरत नहीं है. मगर रोज CSC का मेल आता था और वेस्टर्न यूनियन वाले भी GST NO. के लिए रोज़ मेल भेजते थे.

मैंने सिर्फ चेक करने के लिए कि GST का रजिस्ट्रेशन कैसे होता है, 2-3 दिन तक लगातार साईट पर लगा रहा. कचरा साईट. काम ही नहीं करती थी. मगर जैसे तैसे 3-4 दिन में मैंने उस पर अपनी दुकान का रजिस्ट्रेशन करा लिया. इतना कचरा सिस्टम था रजिस्ट्रेशन का कि आम आदमी नहीं कर पायेगा. मेरा GST से कोई लेना देना नहीं है. CSC की कोई सर्विस GST के दायरे में नहीं आती है. अब उन्होंने मेल भी भेजना शुरू का दिया है कि GST का रजिस्ट्रेशन ना करें. पहले रोज़ ही मेल भेजते थे रजिस्ट्रेशन कराने के लिए.
मेरा ऐसा कोई बिल नहीं है जिसमें मैंने GST काटा हो. ऐसे में GST भरने का सवाल ही नहीं पैदा होता.

मैंने कई बार आनलाइन NIL RETURN भरने की कोशिश की मगर नहीं भर पाया. बीच में बार बार GST वालों का फोन आता था.  वो बोलते कि GST RETURN भरिये. मैंने बोला भाई मुझे भरना नहीं आ रहा है. तब वो लोग ये बोलते थे कि किसी वकील से मिलो. सवाल है कि वकील से किसलिए मिलें. 2 दिन पहले फिर फोन आया और उसकी बात सुनकर मैं हैरान रह गया. सोचने लगा सरकार टैक्स चोरों का कुछ कर नहीं पा रही है और गरीब आम आदमी को परेशान कर रही है. लोग सरकार और बैंकों का अरबों रूपये लेकर विदेश भाग जाते हैं, उनका सरकार कुछ नहीं कर पा रही है. हमारे जैसे आम आदमी पर धौंस जमाते हैं कि सरकार कुड़की और नीलामी करवा कर पैसे वसूल लेगी. सरकार कुर्की ही करवा ले… आप भी ऑडियो सुनिए… धमकी देने वाले का मोबाइल नंबर 7235003497 है.

धन्यवाद,

भवदीय,

सिंहासन चौहान

क्रिएटिव मल्टीमीडिया ,
भीमपुरा NO . 1
बलिया -221716
GSTIN- 09AQBPC47E1ZE
MOB: 9839932064 

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जीएसटी के खिलाफ लगातार लिखने वाले पत्रकार संजय कुमार सिंह की फर्म का चालू खाता बैंक ने ब्लॉक किया

जीएसटी की प्रयोगशाला की अपनी अंतिम किस्त लिख चुका हैं. यह 100 वीं किस्त है. इसी दरम्यान पता चला कि एचडीएफसी बैंक ने केवाईसी के चक्कर में (मतलब, जीएसटी जैसा कोई पंजीकरण हो) मेरी फर्म का चालू खाता ब्लॉक कर दिया है जबकि नियमतः मुझे किसी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। लेकिन अब आयकर रिटर्न व टीडीएस चालू खाता चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। फिर भी हमें डिजिटल लेन-देन करना है। अभी उससे निपटना है।

जीएसटी पर लिखना मैंने 50 किस्त के बाद ही बंद करना सोचा था पर इतना मसाला था कि 100 किस्तें हो गईं। कुछ और व्यस्तताओं के कारण मैंने जीएसटी की प्रयोगशाला बंद कर दी पर जीएसटी की ही सख्ती में मेरा अकाउंट ब्लॉक हो गया है। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि जीएसटी में छूट का अपेक्षित लाभ नहीं मिलेगा उल्टे इसका दुरुपयोग हो सकता है और छूट देने के अधिकारों का चुनावी लाभ के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। असल में अंतिम लाभार्थी तक कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है।

जीएसटी से मेरी शिकायत यही है कि पहले 10 और अब 20 लाख रुपए प्रतिवर्ष तक के कारोबार को जब जीएसटी से मुक्त रखा गया है तो कंप्यूटर पर काम करने के कारण या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) दिल्ली के गाजियाबाद में रह कर दिल्ली और गुड़गांव के काम कंप्यूटर से करके ई-मेल से भेजने के कारण मुझपर जीएसटी की बाध्यता क्यों हो। यह तकनीक का उपयोग नहीं करने देना है। तकनीकी रूप से इसका कोई मतलब नहीं है। व्यावहारिक तौर पर यह संभव ही नहीं है और पहले भी ऐसी कई कोशिशें नाकाम होती रही हैं पर अभी उस विस्तार में नहीं जाउंगा। फिलहाल राहत की बात यही है कि सरकार ने इन पर छूट दे दी है और अब मेरे जैसे मामलों में जीएसटी पंजीकरण की कोई तकनीकी बाध्यता नहीं है। लेकिन बैंक वालों को यह कौन समझाएगा? लकीर के फकीरों ने मेरा (असल में मेरी पत्नी की फर्म का) खाता ब्लॉक कर दिया है।

कारण यह है कि हमलोग घर से काम करते हैं और घर हमारा अपना है। अगर किराए का होता तो हम मकान मालिक से किराए का करार अपनी फर्म के नाम से करते और बैंक उस करार के आधार पर मान लेता कि मैं अपने किराए के घर से ही अपना कारोबार करता हूं। पर चूंकि घर मेरा अपना है इसलिए ऐसा कोई करार नहीं कर सकता और जरूरत नहीं है तो किराए पर ऑफिस के लिए जगह क्यों लूं? इसी तरह, अगर मैं घर से दुकान चला रहा होता (जो गलत है पर देश भर में खुलेआम चल ही रहे हैं) तो नगर निगम से दुकान और प्रतिष्ठान प्रमाणपत्र या व्यापार लाइसेंस ले लेता – अभी भी ले सकता हूं पर नहीं है इसलिए खाता ब्लॉक है क्योंकि उस पर पैसे (रिश्वत कहिए) खर्च नहीं किए हैं।

बैंक ने ऐसे तमाम दस्तावेजों की सूची दी है जो तीन समूहों में है और मौखिक रूप से कहा गया है कि हरेक समूह का एक दस्तावेज चाहिए। समस्या हमारी इकाई की पहचान और पते को लेकर है क्योंकि हमारे मामले में ऐसे किसी दस्तावेज (दरअसल पंजीकरण) की आवश्यकता नहीं है और हम पर दबाव डाला जा रहा है कि हम कोई पंजीकरण कराएं और उसके नियमों में बंधें। लालफीताशाही के नियंत्रण में आएं। ऊपर मैंने कुछ उदाहरण दिए हैं और जो बाकी विकल्प हैं उनकी चर्चा करें तो आप पाएंगे कि देश में (दरअसल बैंक में) छोटा-मोटा प्रोपराइटरशिप कंसर्न चलाने से आसान है एचयूएफ चलाना। एचयूएफ यानी हिन्दू अविभाजित परिवार। कुछ लोग कहते हैं कि यह सुविधा हिन्दुओं के तुष्टिकरण के लिए है। यहां मैं उस विस्तार में नहीं जाउंगा पर इसकी तुलना प्रोपराइटरशिप कंसर्न से करके बताउंगा कि बाप-दादा के धन पर ऐश करना तो वैसे ही आसान है एचयूएफ की सुविधाएं उसे भोगने की पूरी व्यवस्था करता है और बैंकों ने प्रोपराइटरशिप कंसर्न को उसी के मुकाबले रखकर काम करके पैसा कमाना मुश्किल बना दिया है या बना रहे हैं।

एंटाइटी यानी इकाई के सबूत के रूप में सोल प्रोपराइटरशिप कंसर्न या एचयूएफ से एक ही दस्तावेज मांगे जाते हैं जैसे बिजली, पानी, लैंडलाइन फोन का बिल जो इकाई के नाम पर हो। एचयूएफ के मामले में यह कर्ता यानी परिवार के मुखिया के नाम पर ही होगा और यही पर्याप्त है पर प्रोपराइटरशिप कंसर्न के मामले में यह कंसर्न के नाम से चाहिए। कंसर्न के मुखिया के नाम से नहीं चलेगा। इसी तरह जो भी दस्तावेज बताए गए हैं वे मेरे मामले में आवश्यक नहीं हैं इसलिए नहीं हैं और खाता ब्लॉक है (हालांकि उसमें बहुत पैसा नहीं है)। खास बात यह है कि बैंक इस बात की जांच खुद नहीं करेगा और उसकी चिट्ठियां इस पते पर डिलीवर हो रही हैं पर वह पर्याप्त नहीं है। बैंक वाले आकर भी जांच नहीं करेंगे और ना यह कहने या लिखकर देने से मानेगें कि हम जहां रहेते हैं वहीं से अपना काम भी कर लेते हैं। इसलिए जय जय।

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क व विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते हुए संजय काफी समय से सोशल मीडिया पर ज्वलंत मुद्दों को लेकर बेबाक लेखन भी करते हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए किया जा सकता है.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

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लेखक, पत्रकार, चित्रकार, फ्रीलांसर… सब जीएसटी के दायरे में!

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

वैसे तो मीडिया संस्थान, अस्पताल और शिक्षा संस्थान अपने मूल कार्यों के लिए जीएसटी से मुक्त हैं पर ज्यादातर मामलों में अन्य संबंधित सेवाएं देने या प्राप्त करने के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है। बहुत सारे लेखक पत्रकार अभी तक यह माने बैठे हैं कि जीएसटी उनके लिए नहीं है। पर है और बहुत स्पष्ट रूप से है। असल में आरएनआई से पंजीकृत मीडिया संस्थान जीएसटी में नहीं हैं और अखबार या पत्रिकाओं (उत्पाद) पर जीएसटी नहीं है इसलिए जीएसटी की आंच फ्रीलांसर्स तक पहुंचने में अभी समय लगेगा। मेरे ज्यादातर ग्राहक कॉरपोरेट और पीआर एजेंसी हैं इसलिए मुझे सबसे पहले काम मिलना बंद हो गया। जुलाई में जो काम हुआ उसका पर्चेज ऑर्डर अब आना शुरू हुआ है। और काम नहीं आ रहा है सो अलग। संक्षेप में यही समझिए कि गाड़ी पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है।

अखबारों और मीडिया संस्थाओं के लिए काम करना जीएसटी मुक्त नहीं है। सिर्फ खबर भेजना अपवाद है और इसके लिए जीएसटी पंजीकरण जरूरी नहीं है। आप सोच सकते हैं कि कुछ ना कुछ रास्ता निकल जाएगा नहीं तो मीडिया संस्थान नकद तो दे ही सकता है। पर ऐसा कुछ भी संभव नहीं है। एक तो अब नकद देना-लेना मुश्किल होता जा रहा है या कहिए बैंक के जरिए पैसे लेना-देना अपेक्षाकृत आसान है। दूसरे, कोई भी संस्थान या व्यक्ति आयकर के लिए अपने खर्चों का हिसाब रखता है। इसलिए नकद देकर भी काम कराएगा तो खर्चा दिखाना ही पड़ेगा और वह जीएसटी के नियमों का उल्लंघन होगा। इसे ऐसे समझिए कि कोई भी संस्थान या व्यक्ति अपना खर्च ना दिखाए तो आयकर में फंसे और दिखाए तो जीएसटी में फंसे। सबको चोर मानने वाली सरकार ने कोई रास्ता नहीं छोड़ा है। इसे आप सरकार की प्रशंसा मान सकते हैं।

वैसे भी, ज्यादातर लेखक, पत्रकार, फ्रीलांसर किसी एक अखबार में तो लिखते नहीं हैं और ना ही एक राज्य की पत्रिकाओं में। और नियम है कि दूसरे राज्य के अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा न ली जाए। इसलिए, नियमों में छूट को एक अप्रैल से आगे बढ़ाया नहीं गया तो देर-सबेर जीएसटी पंजीकरण जरूरी हो जाएगा। ऐसी हालत में मीडिया संस्थानों की मजबूरी है कि वे फ्रीलांसर्स से जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए कहें और पंजीकरण न होने पर देर सबेर आपको छापना बंद कर दें। क्योंकि रिकार्ड में कोई कब तक गलती या गैर कानूनी काम करता रहेगा। जहां तक जीएसटी पंजीकरण के झंझट और खर्चों का सवाल है फ्रीलांसिंग की कमाई से उसका खर्चा उठाना संभव नहीं है। दूसरी ओऱ, मीडिया वाले क्यों लेख और विचार छाप कर झंझट में पड़ेंगे। वे भी सिर्फ खबरें छापने लगेंगे।

इससे राहत तभी मिलेगी जब नियम बदले जाएं। याद रखें, छह अक्तूबर को घोषित छूट अस्थायी हैं। अगर आप एनसीआर से कोई छोटी बड़ी पत्रिका निकालते हैं और गाजियाबाद, दिल्ली और गुड़गांव के फ्रीलांसर, चित्रकार, कलाकार, प्रूफ रीडर की सेवाएं लेते हैं तो नियमतः सबका जीएसटी पंजीकृत होना जरूरी है। इस संबंध में Pankaj Chaturvedi जी ने फेस बुक पर लिखा है, “जीएसटी में बदलाव नहीं हुए तो प्रकाशन उद्योग से जुड़े लोग भूखे मरेंगे। विडंबना है कि कोई भी प्रक्षक संघ इस पर आवाज़ नहीं उठा रहा हैं। जीएसटी में मुद्रित पुस्तक को तो मुक्त रखा गया है लेकिन कागज़ तो ठीक ही है, प्रूफ रीडिंग, सम्पादन, चित्रांकन जैसे कार्यों के भुगतान पर जीएसटी अनिवार्य कर दिया गया है। पिछले दिनों 16 साल से मेरे साथ काम कर रहे एक प्रूफ रीडर मेरे पास आये, उनसे मैंने भुगतान के लिए जीएसटी में पंजीयन के लिए कहा, उन्होंने कहा- यह काम मेरा मुफ्त में मान लेना, मैं इस झंझट में नहीं पड़ सकता।

“असल में नियम है कि दो-पांच हज़ार का कार्य करने वाले ऐसे लोग भी अपने बिल में अठारह प्रतिशत जीएसटी क्लेम करें, फिर वे इस राशि को खुद जमा करवाएं, फिर उसका रिटर्न फाइल करते रहें। जाहिर है कि चित्रकार या प्रूफ का कार्य करने वाले के पास ना तो इतना समय है, न कमाई और ना ही अनिवार्य जीएसटी का तकनीकी ज्ञान। नतीजतन इस तरह के काम करने वाले कुछ और करने लगेंगे और येन केन प्रकारेन पुस्तकों को तैयार करने में बड़ा नुकसान होगा। हिंदी के प्रकाशक वैसे ही आर्थिक दवाब में हैं। पुस्तक मेले आदि में सहभागिता के लिए भी जीएसटी लगने से स्टाल का किराया बढ़ गया हैं। मेरी जानकारी में कई ऐसे प्रकाशन गृह है जो बंद होने जा रहे हैं। उनमें कुछ हिंदी-अंग्रेजी की पाठ्य पुस्तकें छापने वाले भी हैं। ऐसे में प्रूफ, चित्र, अनुवाद जैसे अस्थायी कार्य करने वालों का विमुख होना खतरे की घंटी है।”

लेखक संजय कुमार सिंह ने जनसत्ता अखबार की नौकरी के बाद 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की. बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय एक जुलाई 2017 से जीएसटी लागू होने के बाद परेशान हो गए. वह जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 75 से ज्यादा किस्त लिख चुके हैं. संजय से संपर्क sanjaya_singh@hotmail.com के जरिए कर सकते हैं.

जीएसटी पर संजय का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं :

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जीएसटी का सच (पार्ट 25 से 36 तक) : छोटे अखबारों पर डीएवीपी के जरिए जीएसटी की मार

जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (25) सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी से छोटे अखबार भी परेशान हैं। सरकारी विज्ञापनों पर आश्रित इन अखबारों को डीएवीपी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) के जरिए विज्ञापन दिए जाते हैं। केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार बनने के बाद डीएवीपी ने विज्ञापन जारी करने के नियमों में सख्ती लाई है और इससे कई प्रकाशन पहले से मुश्किल में हैं। अब उनपर जीएसटी का डंडा भी चल रहा है। खास बात यह है कि डीएवीपी 20 लाख से कम टर्नओवर वाले प्रकाशकों पर भी जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए दबाव डाल रहा है। डीएवीपी का कहना है कि बिना जीएसटी में पंजीकृत हुए सरकारी विज्ञापन उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है। दूसरी ओर, एक छोटी पत्रिका के संपादक के मुताबिक जनवरी 2017 से अब तक मात्र 250 सेंटीमीटर विज्ञापन दिया गया है, जिसकी कीमत सर्कुलेशन के आधार पर 1500 सौ से 5000 रुपये है। ऐसे में डीएवीपी जीएसटी को लेकर छोटे अखबारों से क्यों जबरदस्ती कर रहा है यह प्रकाशकों की समझ से बाहर है। वो भी तब जब उनका टर्नओवर ही ढाई-तीन लाख से दस-बारह लाख तक ही है, और इसकी सीए ऑडिट, वार्षिक विवरणी हर साल ऑनलाइन और फिजिकली डीएवीपी को भेजी जाती है।

जानकारों का कहना है कि सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं। छोटे अखबार मालिकों के मुताबिक यह समय छोटे और मध्यम अखबारों के लिए अब तक का सबसे कठिन समय है। समाचार पत्र उद्योग दूसरे उद्योगों की तरह सरकार से संरक्षण की उम्मीद करता है पर हालात उल्टे हैं। डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति को दमनकारी बताने वाले छोटे अखबार मालिकों का कहना है जीएसटी ने प्रिन्ट मीडिया की जान लेना शुरू कर दिया है। प्रिन्ट मीडिया के लिए राज्य एवं केन्द्र सरकार ने हमेशा सर्कुलेशन स्लैब के आधार पर विज्ञापन दरें तय करने का प्रावधान रखा है। इसका नतीजा यह है कि अखबारों की सीनियारिटी पर कभी गौर नहीं किया गया। मजबूरन कुछेक अखबार मालिक विज्ञापन दर हासिल करने के फेर मे सर्कुलेशन बढा कर बताते हैं। यदि सीनियारिटी के आधार पर रेट तय होता तो अखबार वालों को यह सब करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

डीएवीपी की संशोधित विज्ञापन नीति से सैकड़ों अखबार पहले ही बाहर हो चुके हैं। 1 जून 17 से नई विज्ञापन नीति लागू कर डीएवीपी ने कइयों का गला घोंट दिया। अब तक डीएवीपी के सदमे से छोटे अखबार बाहर आये ही नही कि जीएसटी जैसे कानून ने इन अखबारों की जान खतरे मे डाल दी। न्यूज पेपर छापने वाली प्रिन्टिंग मशीन पर 5 प्रतिशत, विज्ञापनों पर 5 प्रतिशत और न्यूज प्रिन्ट पेपर खरीदने पर 5 प्रतिशत जीएसटी का प्रावधान हैं। हकीकत यह हैं कि राज्य एवं केन्द्र सरकार से कुल मिला कर छोटे अखबारों को सालाना एक से डेढ लाख का औसत विज्ञापन भी नहीं मिलता हैं। उसपर जीएसटी पंजीकरण की बाध्यता इन अखबारों को मार डालेगी।

प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्‍पेस (स्‍थान या जगह) की बिक्री पर लागू वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दर पर भी विवाद रहा। इस बारे में उठे सवाल पर सरकार ने एक विज्ञप्ति में कहा है कि प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के लिए स्थान की  बिक्री पर जीएसटी 5 प्रतिशत है। यदि विज्ञापन एजेंसी ‘प्रिंसिपल से प्रिंसिपल’ के आधार पर काम करती है, अर्थात वह किसी समाचार-पत्र संस्‍थान से स्‍पेस खरीदती है और इस स्‍पेस को विज्ञापन के लिए ग्राहकों को अपने खाते के अंतर्गत ही यानी एक प्रिंसिपल के रूप में बेचती है, तो वह ग्राहक से विज्ञापन एजेंसी द्वारा वसूली गई पूरी राशि पर 5 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगा। वहीं, दूसरी ओर यदि कोई विज्ञापन एजेंसी किसी समाचार-पत्र संस्‍थान के एक एजेंट के रूप में कमीशन के आधार पर विज्ञापन के लिए किसी स्‍पेस को बेचती है, तो वह समाचार पत्र संस्‍थान से प्राप्त बिक्री कमीशन पर 18 प्रतिशत की दर से जीएसटी का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होगी। इस तरह के बिक्री कमीशन पर अदा किए गए जीएसटी के आईटीसी का भुगतान समाचार पत्र संस्‍थान के लिए उपलब्ध होगा। स्पष्ट है कि जीएसटी के नियमों में कोई ढील छोटे अखबारों के लिए भी नहीं है और जीएसटी के दबाव में छोटे अखबार बंद होते हैं या नहीं निकल पाते हैं तो किसी को कोई परवाह नहीं है। अखबार मालिक अपना देखें।

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जीएसटी ने बाजार का चाल चेहरा चरित्र सब बिगाड़ दिया, व्यापारी परेशान

-निरंजन परिहार-
बाजार की हालत ठीक नहीं है। व्यापारी परेशान हैं। उनमें भी ज्वेलर सबसे ज्यादा परेशानी झेल रहे हैं। गोल्ड की खरीद पर पैन कार्ड़ पहले से ही परेशानी का कारण था। अब जीएसटी झंड बनकर छाती पर खड़ी हो गई है। नए झंझट पैदा हो रहे हैं। जीएसटी में कागजी कारवाई इतनी ज्यादा है कि ज्वेलर धंधा करे कि कागजात संभाले। सीए लूट रहे हैं। और छोटे व्यापारी मर रहे हैं। जीएसटी को जी का जंजाल कहा जा रहा है। इधर, गोल्ड के भाव बढ़ रहे हैं,  लेकिन ग्राहक नजर नहीं आ रहे। बाजार की चाल चेहरा और चरित्र सब बिगड़े हुए हैं। ज्वेलर की हालत खराब है। कमाई ठप है और लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। देसी बाजार में कहीं कही, अगर डिमांड है भी, तो कारीगर नहीं मिल रहे हैं।

बीते करीब डेढ़ साल भर से यही हाल है। वजह सिर्फ एक ही है कि पहले से ही डिमांड की कमी से जुझ रही ज्वेलरी इंडस्ट्री को ग्लोबल इकॉनोमी के लो ट्रेंड और सरकारी पाबंदियों की वजह से नई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। आलम यह है कि अगर कुछ दिन यही हाल और जारी रहा, तो लेने के देने पड़ जाएंगे। ऊपर से ज्वेलरी इंडस्ट्री पर शिकंजा कसने की कोशिश में सरकारी फैसलों ने बाजार को परेशान कर रखा है। पहले इंपोर्ट ड्यूटी, फिर बजट, बाद में नोट बंदी और अब जीएसटी। लगने लगा है कि जैसे सारे ईमानदार तो जैसे, सरकारों में ही बैठे होते हैं और चोर तो सिर्फ व्यापारी ही हैं।

वैसे देखा जाए तो, परेशानी जरूर है, लेकिन धंधा बंद नहीं होगा। उम्मीद सिर्फ एक ही है कि भगवान राम, भगवान आदिनाथ और भगवान महावीर के जमाने से गोल्ड हर किसी लुभाता रहा है। आज भी इसकी चमक के प्रति लोगों का आकर्षण जारी है और भविष्य में भी यह चमकता रहेगा। सो, धंधा तो बंद नहीं होगा। हां, मुश्किलें जरूर बढ़ रही हैं। क्या करें, धंधा मुश्किलों के साथ करना होगा। व्यापारी मुश्किलें झेलने को तैयार है। हालांकि सरकारें आम जनता के रास्ते आसान करने के लिए बनती है। लोग उनको चुनते भी इसीलिए हैं। लेकिन वर्तमान सरकार से व्यापारी खुश नहीं है।

कहते हैं कि कांग्रेस के राज में कमाई का मजा ही कुछ और था। वैसे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी ईमानदारी के बारे में किसी को भी कोई शक नहीं है, लेकिन परेशानी यह है कि उनके राज में व्यापार करने की मुश्किलें बढ़ती जा रही है। जीएसटी ने बहुत बड़ा बंबू फंसा रखा है। अभी तो तीन महीने ही बीते हैं, आगे क्या होगा, राम जाने। सरकारी लफड़े लगातार विकसित होते जा रहे है। कागजी कारवाई परेशानी का सबब है। लेकिन व्यापारी करें, तो क्या करे। मजबूरी है। धंधा है, तो करना ही है। इधर गोल्ड के रेट्स में कुछ दिन से हाई ट्रेड दिख रहा है, मौका कमाई का है। जिन्होंने लो रेट्स में गोल्ड खरीदकर ज्वेलरी बनाई थी, उनके लिए बिक्री करके कमाई का अवसर है। बाजार से ग्राहक गायब हैं लेकिन यह ट्रेंड कितने दिन जारी रहेगा, कहा नहीं जा सकता।

हमारे हिंदुस्तान में रंगबिरंगे रत्नों से जड़ी ज्वेलरी पहनने से भले किसी की हैसियत में चार चांद लग जाते हों, लेकिन इनको बनाने वालों का इससे मोह भंग होने लगा है। मुंबई में भी हालात कोई खास ठीक नहीं है। डेढ़ साल में कोई दो हजार से भी ज्यादा कारीगर मुंबई छोड़कर फिर से गांव चले गए हैं। यहां ज्यादातर कारीगर बंगाली हैं। मुंबई की ज्वेलरी इंडस्ट्री में स्किल्ड मैनपावर सबसे बड़ी जरूरत है। उधर, ज्वेलरी में कलर स्टोन व टेक्नोलॉजी का भी खूब इस्तेमाल हो रहा है। हाथों की जगह मशीनों ने ले ली है। डिमांड में कमी से जूझ रहे ज्वेलरी और कलर स्टोन के धंधे को अब स्कील्ड मेनपावर की किल्लत का भी सामना करना पड़ रहा है। लोग नहीं मिल रहे हैं। देश में ज्वेलरी और कलर स्टोन के सबसे बड़े बाजार जयपुर में भी ट्रेंड कारीगरों की भारी कमी देखी जा रही है। जितनी मांग है उसके मुकाबले करीब आधे कारीगर मिल पा रहे हैं। जयपुर की ज्वेलरी का दुनिया भर मे नाम है, वहां की ज्वेलरी की खूबसूरती लुभाती है। लेकिन कारीगरों की कमी से ज्वेलरी इंडस्ट्री काफी दिक्कत में हैं।

उधर, ज्वेलरी का इंपोर्ट लगातार घट रहा है। इंपोर्टर्स परेशान है कि करें, तो क्या करें। रास्ता कोई सूझ नहीं रहा है। और सरकार है कि उसके रवैये से साफ लग रहा है जैसे, उसे व्यापारियों की कोई चिंता ही नहीं है। कुछ लोगों को जरूर लगता है कि अगले कुछ महीनों में भारत सरकार जैसे ही अपना बजट तैयार करने बैठेगी, हमारी अर्थ व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश बढ़ेगी। लेकिन वर्तमान माहौल में क्या खाक गुंजाइश बढ़ेगी, सरकार ने हालत तो खराब करके रखी है।

लेखक निरंजन परिहार राजनीतिक विश्लेषक हैं.

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जीएसटी का सच (पार्ट 13 से 23 तक) : जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी

जीएसटी का सच (13) : गाजियाबाद से एनसीआर में काम के लिए जीएसटी जरूरी

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

सरकारी स्तर पर जब यह तय हो गया कि जीएसटी लागू होगा ही तो मेरे दिमाग में इस बारे में तीन बातें थी – 1) कारोबार की राशि के लिहाज से मैं इससे मुक्त रहूंगा 2) नया है इसलिए अनुपालन आसान होगा, मामूली औपचारिकताएं मैं खुद कर लूंगा और 3) कोई विकल्प नहीं हुआ तो मित्र सीए हैं ही। पर जब लागू हुआ तो तीनों बातें हवा हो गईं। राशि तो पहले के 10 लाख रुपए प्रति वर्ष की तुलना में 20 लाख कर दी गई पर अंतर राज्यीय कारोबार (एक देश एक टैक्स के नारों के बीच) करने के कारण फंस जाउंगा यह तो सोचा ही नहीं था। इसका आसान उपाय था दिल्ली शिफ्ट कर जाना। ज्यादातर ग्राहक या उनका मुख्यालय दिल्ली में है। इसलिए सिर्फ दिल्ली के ग्राहकों से मेरा काम चल जाता। लेकिन कंप्यूटर और ई मेल के काम करने वाले निश्चित रूप से जीएसटी के दायरे में आएंगे – यह भी मेरी कल्पना में नहीं था। तीसरा विकल्प तो है ही। महंगा है पर मित्रों के भरोसे चल जाएगा। उसमें कोई समस्या नहीं है।

सिर्फ कंप्यूटर से अपना कारोबार कर लेना बहुत मामूली निवेश से गुजारा कर लेना है। इसे छूट मिलनी चाहिए थी तो इसपर टैक्स भरने की औपचारिकता जबरदस्ती लादी गई है। मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया के जमाने में जब रोजगार के नए मौके बन ही नहीं रहे हैं। सीए और सीए के सहायकों के काम की जो संभावना बन रही है वह बहुत सारे काम बंद कराने की कीमत पर होगा। 

अब मैं देख रहा हूं कि बहुत सारे लोगों ने पंजीकरण करा लिया है या पंजीकरण से संबंधित शिक्षण सत्रों आदि में हिस्सा लिया है। पर अनुपालन या झंझटों के संबंध में उनकी जानकारी नहीं है. यहां तक कि रिटर्न फाइल करने की तारीख निकल गई और उन्हें कुछ पता नहीं है। इससे मेरी इस धारणा की पुष्टि होती है कि पंजीकरण तो मजबूरी में हर कोई करा लेगा पर अनुपालन (बिक्री कम होने के कारण) नहीं होगा और लोग यह मानकर चलेंगे कि उनके जैसे छोटे कारोबारियों को कौन पूछेगा। यह एक हद तक सही भी है पर चुन कर परेशान किए जाने के साथ रिश्वतखोरी का रास्ता तो खोलता ही है। मेरा एतराज या मेरी परेशानी यही है।

अभी तक जिन जानकारों से मेरी बात हुई है। सब ने मुझे कंपोजिट स्कीम में पंजीकरण कराने की सलाह दी है। हालांकि, मेरे सवालों का जवाब कोई नहीं दे पाया और स्पष्ट हो गया कि उनकी जानकारी बहुत ही सतही है। इसलिए, सबके कहने के बावजूद मैंने अभी तक पंजीकरण नहीं कराया है। कंपोजिट स्कीम को अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के सरकारी जवाब (जिसका कानूनी महत्व नहीं है) में संरचना योजना कहा गया है। जो गलत है। कंपोजिट का मतलब संयुक्त या मिश्रित होना चाहिए पर वह अलग विषय है। यह छोटे करदाताओं (जिनका वित्तीय वर्ष का कारोबार 50 लाख रुपए है) के लिए है। इस योजना के अंतर्गत करदाता बिना इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) लाभ प्राप्त किए एक राज्य में एक वर्ष के दौरान अपने कुल कारोबार के प्रतिशत के रूप में कर का भुगतान करेंगे। सीजीएसटी और एसजीएसटी / यूटीजीएसटी के लिए कर की न्यूनतम दर (उत्पादकों के लिए एक प्रतिशत, अन्य मामलों में आधा प्रतिशत और अनुसूची जो के पैरा छह (बी) में उल्लिखित विशिष्ट सेवाओं अर्थात भोजन परोसने की सेवाएं अथवा मानव उपयोग के लिए अन्य वस्तु के लिए 2.5 प्रतिशत) से कम नहीं होगा। नारा एक देश एक जीएसटी और दर अलग-अलग।

कंपोजिट स्कीम का विकल्प चुनने वाला करदाता अपने ग्राहकों से कोई कर नहीं लेगा। लेकिन जमा कराएगा। यह रोजगार करने का टैक्स है? मोटा-मोटी इसका मतलब यही हुआ कि कारोबार का 2.5 प्रतिशत देकर जीएसटी से पीछा छुड़ाइए। पर यह जैसा मुझे समझ में आ रहा है, 20 लाख से ऊपर 50 लाख से नीचे के कारोबार वालों के लिए है जो अपना कारोबार कम समझते हैं पर सरकार जिन्हें बख्शना नहीं चाहती है। यह मेरे लिए नहीं हो सकता है। और जवाब में यह बात स्पष्ट लिखी है। 

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जीएसटी से बेरोजगारी की कगार पर खड़े एक पत्रकार की डायरी : जीएसटी का सच (पार्ट 1 से 12 तक)

जीएसटी का सच (पार्ट 1) : जीएसटी यानि छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन

संजय कुमार सिंह
sanjaya_singh@hotmail.com

जीएसटी के बारे में बातें तो बड़ी-बड़ी की गईं पर यह छोटे और नए कारोबारों का दुश्मन है। मेरे कुछ ग्राहकों ने कहा कि अंतरराज्यीय “कारोबार” करने वालों के लिए जीएसटी पंजीकरण आवश्यक है और कायदे से वे काम कराना तो दूर जो काम करा चुके उसका भुगतान भी नहीं कर सकते। शुरू में तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ पर अब लगता है कि वे सही ही कर रहे हैं। वैसे भी नौकरी करने वाले क्यों जोखिम उठाएं। वे काम नहीं कराएंगे, गलत हो तो क्यों करें। तनख्वाह तो मिलनी ही है। पर यह सब कितने दिन कैसे चलेगा भविष्य बताएगा।

आज मैं पंजीकरण कराने के नियम देखते हुए गलती से सिंगापुर जीएसटी की साइट पर चला गया पर उसकी भाषाशैली से ही समझ में आ गया कि मैं कहीं और हूं। भारत में जीएसटी कौंसिल की साइट (http://www.gstcouncil.gov.in) अभी आधी अधूरी है और सिर्फ अंग्रेजी में है। जीएसटी हेल्प पर क्लिक कीजिए तो हेल्प डेस्क खुलता है और वहां एक फोन नंबर तथा ई-मेल के अलावा कुछ नहीं है। सर्च में रजिस्ट्रेशन (अंग्रेजी में) डालने पर ऐसा कोई पेज नहीं खुलता जहां आप सीधे पंजीकरण के लिए आवेदन कर सकें।  ढूंढ़ते हुए http://www.gstindia.com पर (यह सरकारी नहीं है) अंग्रेजी में सीए आकाश फोफलिया का एक आलेख मिला उसका यह अंश उल्लेखनीय है। जीएसटी के तहत किन लोगों के लिए पंजीकरण आवश्यक है।

3. Persons requiring registration

Following are the persons required to take registration under this act –

(a) Persons making inter-state supply, irrespective of any threshold limit
(b) Casual taxable persons, irrespective of the threshold specified
(c) Persons who are required to pay tax under reverse charge
(d) Non resident taxable persons
(e) Persons who are required to deduct tax under section 37 (TDS)
(f) Agents
(g) Input service distributor
(h) Supply of goods or services through electronic commerce operator, other than branded services
(i) Every electronic commerce operator
(j) Aggregator who supplies service under his brand name or his trade name
(k) Other notified persons

आपने पढ़ा होगा कि 20 लाख रुपए प्रति वर्ष का कारोबार करने वालों को जीएसटी में पंजीकरण कराने की आवश्यकता नहीं है। इस तरह, दावा किया गया है कि छोटे कारोबारों को जीएसटी से कोई परेशानी नहीं होगी। यहां बताया गया है कि जीएसटी किन लोगों के लिए जरूरी है और इसमें पहला बिन्दु है, जो लोग अंतरराज्यीय आपूर्ति करते हैं। आपने यह भी सुना होगा – एक देश एक जीएसटी। अब आप जानते हैं कि जीएसटी की कई दरें हैं पर कहा यही जा रहा है कि एक देश और एक जीएसटी। दूसरे अगर आप अंतरराज्यीय कारोबार करते हैं (उससे चाहे किसी तरह गुजर करते हों) तो  जीएसटी पंजीकरण आवश्यक हैं। फिर एक देश एक जीएसटी का क्या मतलब। मेरे साथ यही समस्या है – मैं गाजियाबाद में रहता हूं और मेरे ज्यादातर ग्राहक दिल्ली या गुड़गांव के हैं। इसलिए वे जीएसटी पंजीकरण के बिना मुझे काम देंगे ही नहीं। इसमें एक और बिन्दु “एच” दिलचस्प है। इसके मुताबिक, अगर आप अपनी सेवा या सामान इलेक्ट्रॉनिक कामर्स ऑपरेटर के जरिए सप्लाई करते हैं तब भी जीएसटी के तहत पंजीकरण आवश्यक है। लेन-देन डिजटल कीजिए और पूरा धंधा ही इलेक्ट्रॉनिक हो तो टैक्स के जाल में फंसना जरूरी है। यह विकास है। 

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जानिए, जीएसटी ने किस तरह एक वरिष्ठ पत्रकार को बेरोजगारी की कगार पर ला खड़ा किया

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

जनसत्ता की नौकरी के साथ शौकिया अनुवाद करने वाले संजय कुमार सिंह ने 1995 में अनुवाद कम्युनिकेशन AnuvaadCommunication.com की स्थापना की थी और 2002 में नौकरी छोड़कर पूर्णकालिक अनुवाद करते रहे। उदारीकरण के बाद देश में आने वाले बहुराष्ट्रीय निगमों और देसी कॉरपोरेट्स के साथ देश भर की तमाम जनसंपर्क और विज्ञापन एजेंसियों के लिए काम करते रहे संजय का मानना है कि एक समय आएगा जब कंप्यूटर से कायदे का अनुवाद संभव हो जाएगा। इसलिए वे इसमें भविष्य नहीं देखते और अनुवाद सिखाने में यकीन नहीं रखते। अकेले ही जितना काम कर सकते हैं, करते रहे।

सब ठीक-ठाक चल रहा था कि एक जुलाई से जीएसटी लागू हो गया और अचानक सब कुछ बदल गया। जीएसटी से संजय बेरोजगार होने की कगार पर हैं और मानते हैं कि अपनी पसंद का पेशा अपनाने की आजादी अब नहीं रही। नौकरी के साथ छोटा-मोटा काम करके आप अतिरिक्त कमाई नहीं कर सकते हैं। ना ही मामूली निवेश से छोटा-मोटा काम करके जीवन यापन कर सकते हैं। जीएसटी को जानने-समझने की अपनी कोशिश और अनुभव को वे रोज फेसबुक पर लिखते हैं और अभी तक 24 किस्त लिख चुके हैं।

संजय भड़ास4मीडिया से बातचीत में कहते हैं : ”’मुझे जीएसटी ने मारा.. ये सच है.. जीएसटी के कारण इन दिनों मेरे पास कोई काम-धंधा नहीं है… इस बारे में बताने वाला कोई (मुफ्त का भरोसेमंद जानकार) नहीं मिल रहा है.. मैं पूरे लगन से इस बारे में जानने समझने की कोशिश कर रहा हूं… तय करना है कि जीएसटी पंजीकरण कराना वाकई जरूरी है कि नहीं और है तो यह कितना मुसीबत है और कोई लाभ होगा कि ऐवें ही… कुछेक क्लाइंट्स ने पैसे नहीं दिए, उनका क्या करना है…. यही कारण है कि रोज का अनुभव फेसबुक पर डाल रहा हूं… कोई कुछ मुझे बताना समझाना चाहे तो sanjaya_singh@hotmail.com पर भेज सकते हैं.”

आइए, अब संजय का लिखा 24वां पार्ट पढ़ते हैं…

जीएसटी का सच (24) जीएसटी में पंजीकरण यानि ओखली में सिर डालना है

जीएसटी मेरे लिए मुद्दा तब बना जब दिल्ली और गुड़गांव के मेरे ग्राहकों ने कह दिया कि जीएसटी पंजीकरण के बगैर वे मुझे काम नहीं दे सकते। मैं जीएसटी के बारे में जितना जानता था उस हिसाब से पंजीकरण कराना मुझे भारी झंझट का काम लग रहा था क्योंकि रिटर्न दाखिल करना, टैक्स वसूल कर जमा करना और फिर जहां संभव हो वापस लेना – मेरे लिए असंभव नहीं तो भारी मुसीबत जरूर है और इसके लिए एक अकाउंटैंट जरूरी लग रहा था। मेरे कुछ सवाल थे जिनका जवाब नहीं था और बगैर ठीक से समझे मुझे जीएसटी पंजीकरण कराना ओखली में सिर डालने जैसा लगा। जब काम आना बंद ही हो गया तो जल्दबाजी में पंजीकरण कराने से जरूरी मुझे समझना (और समझाना) लगा क्योंकि इस बारे में कोई ठीक से नहीं जानता था।

इस क्रम में अभी तक यही समझ में आया है कि पंजीकरण जरूरी है और ग्राहक ठीक कह रहे हैं। इसमें सेवा लेने वाले के लिए यह विकल्प नहीं रह गया है कि छोटा कारोबारी जीएसटी पंजीकृत नहीं होगा तो टैक्स नहीं लेगा और सेवा सस्ती मिल जाएगी ना इस बात का कोई मतलब है कि छोटा कारोबारी अच्छी सेवा देता है। नियम ऐसे हैं कि दूसरे राज्य के (मैं गाजियाबाद में हूं, गुड़गांव हरियाणा में और दिल्ली अलग राज्य है) अपंजीकृत सेवा प्रदाताओं से सेवा ली ही नहीं जा सकती है। पंजीकृत सेवा प्रदाता न हो और आप अपंजीकृत सेवा प्रदाता से सेवा लेते हैं तो टैक्स की रकम आपको अपने पास से जमा कराना है। रीवर्स चार्ज व्यवस्था के तहत इसकी वापसी संभव हुई तो वापस भी मिलेगी पर जमा कराने से कोई छूट नहीं है।

इस तरह, यह स्पष्ट है कि कागजी खाना पूर्ति का काम काफी बढ़ जाएगा। हद तो यह है कि पंजीकरण के बाद बिक्री ना हो शून्य रिटर्न भी समय पर दाखिल करना है और न करने पर भारी जुर्माने का प्रावधान है। यह अलग बात है कि पहला ही रिटर्न सिर्फ 64 प्रतिशत कारोबारियों ने जमा कराया और बाकी के जुर्माने की रकम माफ करने और नहीं करने के संबंध में परस्पर विरोधी खबरें भी आईं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सरकार ने आधी-अधूरी तैयारी से जीएसटी लागू कर दिया है और इस बारे में जानकारी देने की कोई अधिकृत व्यवस्था नहीं है और जीएसटी कौंसिल के वेबसाइट ऐसा है कि गूगल सर्च करो तो तमाम सॉफ्टवेयर विक्रेताओं से लेकर सीए और ब्लॉग लिखने वालों के आर्टिकल मिल जाएंगे (जिन्हें अधिकृत नहीं माना जा सकता) पर जीएसटी कौंसिल की अधिकृत सूचना नेट पर नहीं मिलेगी। आप पूछ सकते हैं कि सरकारी संस्थान से ऐसी अपेक्षा क्यों? इसलिए कि जीएसटी का सारा काम कंप्यूटर और इंटरनेट से ही होना है। 20 लाख रुपए प्रति वर्ष से कम का कारोबार होने के बावजूद मुझे पंजीकरण इसीलिए कराना है कि मैं कंप्यूटर से काम करता हूं और घर बैठे अपनी सेवा दिल्ली व गुड़गांव (या कहीं के भी) ग्राहकों को भेज देता हूं और उनसे पैसे ले लेता हूं। 

अभी तक मुझे जीएसटी जितना समझ में आया है वह यही है कि आप कानून का पालन कर नहीं सकते और नहीं करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी क्योंकि अपराध तकनीकी होगा पर ज्यादा चूं-चां करेंगे तो आपके खिलाफ कार्रवाई की जा सकेगी। इसलिए आप डर कर रहिए। अपने काम से मतलब रखिए। अपना काम कीजिए। मुझे यह स्थिति मंजूर नहीं है। मैं यही बता रहा हूं कि नियम परेशान करने के लिए बनाए गए हैं या परेशान करने वाले हैं। पर दूसरी स्थिति यह है कि मैं अपना काम छोड़ दूं या कुछ और करूं। पर यह इतना आसान नहीं है। अभी तक यह रास्ता नजर आ रहा है कि जहां (जिस राज्य से भी) काम मिलने की संभावना हो वहां मैं किसी से साझेदारी करूं और उसके घर को अपनी फर्म का कार्यालय बताऊं तो स्थानीय सेवा प्रदाता होने के दावे पर बगैर पंजीकरण काम मिल सकता है पर चूंकि सेवा लेने वाले को टैक्स अपने पास से जमा कराना ही होगा इसलिए सेवा लेने वाला कोई प्राथमिकता नहीं देगा। विचित्र स्थिति है। 

पार्ट एक से बारह तक पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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पार्ट तेरह से तेइस तक पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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मोदी राज में सैनेटरी नैपकिन को लक्ज़री मानते हुए इस पर 18% टैक्स थोप दिया गया!

Deepali Tayday : जिस देश में सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं के लिए निहायती मानवीय ज़रूरत अदद टॉयलेट्स तक अवेलेबल नहीं हो पाते, जबकि हर कुछ दूरी में लड़कों के लिए ऐसी व्यवस्था है, नहीं भी है तो भी यूरिन करने के लिए पूरा जहान खुला है। महिलाएँ इसी डर में बाहर जाने पर पानी नहीं पीती और कितनी तरह की प्रॉब्लम्स झेलती हैं। हाँ, यहाँ हर गली, नुक्कड़-चौराहों पर मंदिर जरूर मिल जाएंगे। इंसानों की क़ीमत नहीं, पत्थरों की जरूर है। ऐसे देश में सैनेटरी नैपकिन को लक्ज़री मानने और 18% टैक्स लगाने पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हो रहा।

पीरिड्स, उससे जुड़ी ज़रूरतें, हाइजिन कहाँ उन्हें समस्या लगेंगी। महिलाओं का स्वास्थ्य यहाँ पर कब चिंता का विषय रहा है। पहले सिर्फ़ देह थी, बच्चा पैदा करने की मशीन थीं, हाइजीन की बात ही छोड़िये और अधिकारों का तो नाम भी मत ले लेना।ब्राह्मणवाद इतने मेन्युट लेवल पर काम करता है कि आसानी से समझ नहीं आता। तुम वहीं पहुँच रही हो जहाँ से शुरू हुआ था। मनुस्मृति के हिसाब से जो औक़ात मनु ने तय की है वहीं धकेली जाओगी। देह हो, सिर्फ़ देह में बँधी रहो। सिंदूर और श्रृंगार है तुम्हारे लिए, पूजा का सामान सस्ता कर दिया है तुम्हारे लिए……..हाँ माहवारी का नाम मत लेना, वो खून चलता नहीं है भगवान की पूजा में। तो जो पेड यूज़ कर रहीं हैं वो लक्ज़री ही है, सब महिलाएँ इतनी रईस हैं कि आसानी से ख़रीद सकती हैं। नहीं भी ख़रीद सको तो जाओ भाड़ में हमें क्या…

थोड़ा सा इमेजिन करके देखो किन हालातों में , किस तरह से और कितनी मुश्किल में कौन लोग तुम्हारी पढ़ाई, समानता और सभी अधिकारों के लिए लड़े होंगे। फुले आई-बाबा और बाबासाहेब की वजह से आज फ़ेसबुक बोल पा रही हो। खूब रंग रही हो दीवार विरोध में। तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई से लेकर ये क्रांति और फेमिनिज्म का झंडा ऊठाने में ये ज़ेहन में आए ही नहीं होंगे। यह सिर्फ टैक्स लग रहा है तो भोलापन है आपका…

फेसबुक की चर्चित लेखिका दीपाली की वॉल से.

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लैंड बिल : भाजपा की हिफाजत में कारपोरेट मीडिया का अटैक

अंबानी घराने की कारपोरेट मीडिया गतिविधियों को लेकर बेचैनी और सतर्कता का आलम अब छन-छन कर बाहर की सुर्खियां बनने लगा है। उसके नेटवर्क-18 वाले ऑन लाइन समाचार मंच ‘फर्स्‍टपोस्‍ट’ प्रबंधन में पिछले दिनों जो कुछ घटा है, अंदरखाने की बेचैनी का साफ खुलासा कर देता है। इसके पीछे असली मालिक अंबानी घराने का भाजपा-प्रेम भी एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। लैंड बिल को लेकर ‘इन डॉट कॉम’ और ‘द न्‍यूज मिनट’ के दो लेख पूरे हालात के किंचित संकेत देते हैं।  

फर्स्‍टपोस्‍ट के एडिटर इन चीफ आर. जगन्‍नाथ का (‘GST, Land Bill On Hold: Modi May Have To Rethink Jaitley As Finance Minister) का लेख पिछले महीने वेबसाइट से निरस्त कर दिया गया था। ‘द हूट’ के मुताबिक शीर्ष प्रबंधन के हस्‍तक्षेप से असंतुष्ट होकर वेबसाइट के एग्जिक्‍यूटिव एडिटर लक्ष्‍मी चौधरी ने पिछले महीने अपना इस्‍तीफा भी दे दिया था। 

लैंड बिल पर ‘इन डॉट कॉम’ पर प्रकाशित आर. जगन्‍नाथ का लेख इस प्रकार है –

GST, LAND BILL ON HOLD: MODI MAY HAVE TO RETHINK JAITLEY AS FINANCE MINISTER

In all probability, the monsoon session of parliament, beginning on Tuesday(21 July) is likely to be drowned in a cacophony of politics. The Congress party has smelt blood in the Madhya Pradesh Vyapam scam and the Lalit Modi controversy that has embroiled the Rajasthan Chief Minister and the External Affairs Minister, and is digging in its heels over the Land Acquisition Bill.The first law of politics is that parties that have the upper hand politically will not let go of the opportunity easily, never mind what damage it does to the economy. So the Congress party will not let parliament function without obtaining the heads of Shivraj Singh Chauhan and Vasundhara Raje something the BJP is not going to oblige it with. So the land bill and GST could be casualties.

The real problem for Narendra Modi is that he needs those chief ministers more for the success of his five-year tenure than some of his own cabinet ministers, since growth and jobs depend on their ability to bring in state-level supportive reforms, especially when the Congress is blocking all legislation at the centre. If, for example, the burden of legislating sensible land acquisition laws will shift to states, Modi needs Raje and Chouhan (and some of his other CMs) more than some of his under-performing cabinet ministers. The CMs to remove are not the competent ones, but the not-so-competent ones, like Devendra Fadnavis in Maharashtra.Among his cabinet ministers, Sushma Swaraj, Nitin Gadkari, Suresh Prabhu, Manohar Parrikar and Nitin Gadkari are the clear current and potential future performers. Arun Jaitley and Smriti Irani are the underperformers. The latter are the ones that Modi needs to let go of if he wants delivery. Finance and HRD are the cornerstones of his programme to take India to a new level of growth and jobs, and he cant afford to have weak performers here.When the economy is in trouble, finance is the most important portfolio. 

If growth is still some quarters away, it is because North Block has to been slow realise what it was up against. Arun Shourie’s veiled critique of the finance ministry is thus valid. Thanks to the finance ministry’s weak response to the emerging economic situation, the Modi premium on economic governance is gone, thanks to a weakened finance ministry.Nothing illustrates this better than what is likely to happen in parliament this week. While there is a way out on the land bill where the centre can allow states to pass their own laws – in the case of the GST the chances are we will be stuck with a bad law, thanks to Jaitleys efforts to claim credit for introducing the most important tax reform ever (GST). Jaitley probably believes that half-a-loaf on GST is better than no loaf, but his political judgment in this regard is probably wrong. In the case of GST, half a loaf may do damage to the BJP, and to the economy. Modi has nothing to thank him for if this law passes.

The three problem areas for GST are:1) the one percent additional tax that manufacturing states like Gujarat and Tamil Nadu want to levy to avoid losing revenues when GST kicks in;2) the exclusion of alcohol, tobacco and petro-products from GST, and3) the high revenue-neutral rate of GST due to these exclusions.While lingering state resistance to revenue losses may be met by Jaitley promising full compensation for five years (and not on a tapering scale where the compensation falls to 75 percent and 50 percent in the last two years), what is not being reckoned with in this push for GST in a hurry is its real cost.Any government should know that implementing GST will involve one year of teething trouble in fixing IT bugs, standardising and frequently revising rules and procedures, and ironing out the paper work. This means 2016-17 will be a washout for GST even if the law is legislated this year.Next, once implemented, if the revenue-neutral rate is anywhere above 20 percent, there will be a cost-push effect. When you are paying lower GST rates now on services, a sharp increase in GST to 20 percent plus will push up services inflation. Services are 60 percent of the economy. 

We are going to see supply-disruptions and cost-push pricing changes all through 2016-17 and 2017-18 as the ambit of GST widens. GST will settle down only in 2018-19, which means all through the run-up to the 2019 elections, we are going to hear a cacophony of angry dissent on GST.Even worse from the BJPs point of view, GST will bring large segments of the retail trade a core support base for the BJP in the past into the tax network. You are likely to hear shrill voices against GST very soon as it is about to be implemented. From traders to manufacturers, all of them will have to invest in new software and technology to comply with GST. There are only pain points in GST for the first two years.Put another way, no government will be a hero when implementing GST. So one wonders why Jaitley believes that this is a reform that needs prioritisation politically, even if the end-result is a hybrid law with many problems.Given the shortening political time-table after this year (we have major state assembly elections coming up in 2016 and 2017), it is worth going slow on GST right now and work towards a wider consensus where states are seen pushing for it rather than just the centre. 

In a federal structure, it is not good for the centre to push an idea which states believe is not that good for them.The real problem for Narendra Modi is that he has the wrong man in the finance ministry. Arun Jaitley may be an excellent lawyer and debater, but he has not shown the sharpness required to run the finance ministry when this is the most important task before the Modi government.The finance ministry has repeatedly goofed up. First, it produced a lousy 2014 budget. The second one this year was better and moderately reformist, but there is no clarity on how it will pan out. For example, five months out, we have not heard how corporate taxes are going to be cut next year and which tax exemptions will go to accommodate this cut.Next, the finance ministry has produced a dangerous black money law that is draconian. It is likely to drive more people out of the country than bring them in to invest here. Appearing hard on black money through a draconian law is the worst way to bring probity in financial transactions. 

It will only push up the cost of corruption, not eliminate it. What works politically for Modi and Jaitley will not work economically. Governments should focus on eliminating future creation on black money and not obsess about what is already lost.As Dev Kar, Chief Economist for Global Financial Integrity, wrote in The Indian Express last week: “In our experience, countries benefit more by curtailing the present rate of black-money creation than by trying to recover funds lost in the past. Numerous countries have found that getting back illicit funds and collecting unpaid taxes is an arduous, time-consuming and expensive task. In addition, the very real potential of punitive action on holders of such ill-gotten assets strongly discourages voluntary disclosure.”In short, Jaitley’s law to bring back black money is going to fail.Then we had the botched income-tax return (ITR) form that sought to obtain details about every individuals foreign trips, among other things. Jaitley had to backtrack, but making changes after the damage is done is indicative of a lack of attention to detail.Jaitley also showed no understanding of the importance of bank recapitalisation, till it became clear that public sector banks will neither lend more nor lower rates both vital for restarting the investment cycle – thanks to a high proportion of bad loans on their books. This decision, of not providing adequate capital, is now being reversed, but a sharp finance minister would not have needed public prodding to discover this.It seems that Arun Jaitley who leads Modis most important ministry is not the man for the job. It is time Narendra Modi bit the bullet and moved him even at a considerable loss of face. 

It does not benefit Modi to have Jaitley as FM when he has just three more budgets to go and lots of daily hard work to do to unclog the investment cycle before election time.Failure to revive the economy quickly is going to cost Modi dear. Atal Behari Vajpayees NDA lost in 2004 because revival came too late in the last year of its tenure. Modi cannot afford a repeat. (‘इन डॉट कॉम’ से साभार)

इस पूरे प्रकरण पर ‘द न्‍यूज मिनट’ में प्रकाशित सिद्धार्थ मिश्रा का लेख इस प्रकार है – 

The curious case of Firstpost’s missing editorial on Arun Jaitley 

On Sunday, news-website Firstpost took down an editorial published on July 20. The move was curious when we take into account the fact that the article was an opinion piece written by its Editor-in-chief R Jagannathan and questioned Finance Minister Arun Jaitley.

Media-watchdog The Hoot first took note of the article being taken down and cited it to “Not so creeping interference”. The website also hinted that things were a bit shaky on the Firstpost home-front with its executive editor, Lakshmi Chaudhry, putting in her papers and the staff not too pleased with not having the freedom to criticise certain leaders in the current government.

The article itself, titled “GST, LAND BILL ON HOLD: MODI MAY HAVE TO RETHINK JAITLEY AS FINANCE MINISTER”, was critical of Arun Jaitley as the Finance Minister. The piece (now inaccessbile), which can still be found on Firstpost’s sister publication, in.com, went as far to suggest that the Prime Minister should re-evaluate Jaitley’s position as FM.

Firstpost is part of the Network 18 stable that was taken over by Reliance Industries Limited. Rumours then started doing the rounds of whether the corporate biggie would lay down an editorial line.

This is not the first time that an editorial pertaining to Jaitley has allegedly found itself devoid of white canvas. SC lawyer Ram Jethmalani had alleged “mischief” on Jaitley’s part when his piece in a weekly was taken down but TNM’s attempts to ask the journalistic ‘why’ was met with a stone-wall on this occasion.

We tried to get in touch with Chaudhry who had put in her papers during the time the article was still up on the site. She said that she was not speaking to anyone in the media about the matter. “Still serving notice period,” was her response, in a way confirming her exit from the organisation.

Firstpost editor R Jagannathan was not forthcoming on the matter either and refused to comment.

Highly placed sources within the company’s hierarchy however confirmed to TNM that changes were being touted in the editorial policy, especially about negative reporting on some top BJP leaders, however it was unsure if any concrete policy had been formulated.

“It seems unlikely that Firstpost will follow any diktat as long as Jaggi (R Jagannathan) remains at the helm,” said a senior Editor.

Media critic and journalist Paranjoy Guha Thakurta believes that the recent move will affect the “credibility” of the organisation.

“If the owners of Firstpost believe that the credibility of websites would be enhanced if there is no criticism of those in position and power even within the government, they are mistaken,” he says while speaking to TNM.

Thakurta adds that Firstpost comes across as a website which provided more opinion than news per se, and “even if the opinion is right-of-centre, shutting it out would not bode well for their credibility.” He says that what is also significant and may miss scrutiny “more importantly, is what is not put out (on their website).” (‘द न्‍यूज मिनट’ से साभार)

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