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साहित्य

ज्ञानरंजन का इंटरव्यू लेने वाले अंजुम शर्मा से वीरेंद्र यादव के 10 सवाल?

वीरेंद्र यादव-

‘संगत’ में ज्ञानरंजन जी को इस रुप में देखना मन को कहीं गहरे संतप्त कर गया. शमशेर जी की एक काव्य पंक्ति बरबस ही कौंध गई कि ‘ऐसे ऐसे लोग कैसे कैसे हो गए!’ ज्ञान जी से पहली भेंट 1980 में प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सम्मेलन में जबलपुर में हुई थी। इसके बाद प्रगतिशील लेखक संघ और ‘पहल’ के चलते उनके साथ निकटता और आत्मीयता बढ़ी। जब कभी लखनऊ आते तो वे और उनकी पत्नी सुनयना जी अक्सर अखिलेश के घर पर ठहरते, पास ही मेरे घर भी आते.

अखिलेश से उनका विशेष स्नेह था. मुझे यह भी याद आ रहा है कि इंदौर के एक आयोजन में शामिल होने के बाद जब अखिलेश और मैं वाया भोपाल वापसी की यात्रा पर थे तब ज्ञानरंजन जी भोपाल स्टेशन पर स्नेहवश पानी की बोतल और मिष्ठान का डिब्बा लेकर आये थे। लखनऊ में जब कामतानाथ को पहल सम्मान देने के लिए समारोह आयोजित किया गया तो उसके संयोजन का दायित्व उन्होंने मुझे ही दिया था. उसका प्रशस्ति पत्र भी मुझसे लिखवाया था।

ज्ञानरंजन जी को यह श्रेय भी है कि शाहजहाँपुर के ‘पहल’ के हृदयेश सम्मान के अवसर पर मेरे द्वारा उपन्यासों पर दिये गए वक्तव्य को सुनने के बाद उन्होंने मुझ पर दबाव डालकर तीस उपन्यास भेजकर व एक वर्ष का समय देकर नवें दशक के उपन्यासों पर लम्बा विनिबंध लिखवाया और वर्ष 1998 में उसे पहली ‘पहल’ पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया. सच कहें तो वहीं से मेरे उपन्यास आलोचना संबंधी लेखन की गंभीर शुरूआत भी हुई.

इस बीच यह याद आ रहा है कि जब 1987 में अमरकांत जी की प्रेरणा से मैंने राकेश के साथ मिलकर ‘प्रयोजन’ पत्रिका निकाली तो पत्रिका प्राप्त होने पर ज्ञानरंजन जी ने प्रसन्न होकर लौटती डाक से एक लिफाफे में 100 रु का नोट रखकर आह्लाद्पूर्वक लिखा कि ‘अंक बहुत अच्छा है और यह राशि तुम लोगों के बीयर पीने के लिए है.’ और जाने कितने अवसरों पर वे हम लोगों को स्नेहसिक्त करते रहे थे. उनके लगभग पचास से अधिक पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं। और अब जब ‘संगत’ के साक्षात्कार में उनको यह कहते सुना कि ‘मैनें तो वीरेंद्र यादव, अखिलेश और ‘तद्भव’ का बहिष्कार कर रखा है’ तो संतप्त होना स्वाभाविक ही था. विशेषकर तब जबकि वे स्वयं ‘तद्भव’ के शुरुवाती किसी अंक के लेखक रह चुके थे. ज्ञान जी द्वारा ‘तद्भव’ के इस कथित बहिष्कार को किस तरह समझा जाय?

इस बीच यह हुआ कि ज्ञानरंजन जी ने प्रगतिशील लेखक संघ छोड़ दिया .अपने उस दौर के साथियों और ‘पहल’के शुरुआती दौर के सहयोगियों से किनाराकशी कर ली। हम लोगों से भी उनकी वह गर्मजोशी न रही। दिल्ली पुस्तक मेला में मेरा उनसे आमना सामना भी हुआ तो उनकी तरफ से एक ठंडापन ही रहा था । मेरा भी काफी कुछ लेखन इस बीच ‘तद्भव’ में ही आता रहा है. अब उनका हम लोगों और ‘तद्भव’ के बहिष्कार संबंधी यह कथन!

यह लिखना इसलिए पड़ा कि इस साक्षात्कार को सुनने के बाद कई लोग हम लोगों के बारे में ज्ञान जी के इस कथन को डिकोड करना चाहते हैं. ज्ञान जी को इस रुप में देखना सचमुच स्तब्द्धकारी है.

ज्ञान जी ने इस साक्षात्कार में अपने मित्रों व अनन्य निकटस्थ लोगों और संगठन के प्रतिबद्ध साथियों के संबंध में जो बातें कही हैं उम्र के इस पड़ाव पर यह उनका अपना मत है, उस पर क्या टिप्पणी करना! काश वे इससे अपने को बचा सके होते! इस सबके बावजूद उनके बेहतर स्वास्थ और सक्रिय रचनात्मक जीवन के लिए हमारी शुभकामनाएं.

अब साक्षात्कारकर्ता अंजुम शर्मा से कुछ सवाल:

  • ज्ञानरंजन जी के इस कथन पर कि उन्होंने ‘इमरजेंसी के बाद ‘पहल’ में कोई विज्ञापन नहीं छापा‘ ,अंजुम ने यह प्रतिप्रश्न क्यों नहीं किया कि विज्ञापन तो लगातार ‘पहल’ में छपते रहे थे फिर वे कैसे यह कह सकते हैं? और यदि उन्हें इतनी भी जानकारी नहीं थी तो उनकी बहुत कमजोर तैय्यारी थी. संयोग से मेरे सामने ‘पहल’ का 88वां अंक है जिसमें सरकारी व गैर सरकारी दस विज्ञापन प्रकाशित हैं. ‘पहल’86 भी सामने है उसमें भी कुल ग्यारह पृष्ठों के विज्ञापन प्रकाशित हैं.
  • ज्ञानरंजन जी ने साक्षात्कार में यह जानकारी दी कि नामवर जी ने उन्हें गुणवत्ता के आधार पर सोवियत लैंड नेहरु अवार्ड दिया था. क्या यह प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए था कि यह संयोग कैसे घटित हुआ कि इसके बाद ‘पहल’ ने नामवर जी पर केन्द्रित एक समूचा अंक प्रकाशित किया. इस अंक के लिए नामवर जी के कुछ पत्रों को जुटाने का दायित्व ज्ञान जी ने मुझे भी सौंपा था. यह भी कि इसी दौर में कहानी पर केन्द्रित नामवर जी से सुरेश पांडे द्वारा लिए गए साक्षात्कार की पुस्तिका ‘पहल’ द्वारा प्रकाशित हुई थी। यह सब ज्ञान जी को इसलिए याद दिलाना चाहिए था क्योंकि इस साक्षात्कार में उनकी यह घोषणा है कि नामवर जी उनके सबसे बड़े शत्रु थे और ज्ञान जी उनको दंडित किये जाने के पक्ष में थे।
  • ज्ञानरंजन जी ने जब चुनौती भरे अंदाज़ में इस सवाल को कई बार दुहराया कि नामवर जी के एक पुस्तक के अलावा दूसरी पुस्तकों के नाम बताइए तो उनकी ‘दूसरी परम्परा की खोज’, ‘छायावाद’, ‘इतिहास और आलोचना’ व ‘कविता के नये प्रतिमान’ सरीखी पुस्तकों के नाम अंजुम शर्मा ने क्यों नहीं बताए? क्या उन्हें नामवर जी की पुस्तकों की जानकारी नहीं थी? क्या नामवर जी को ज्ञान जी द्वारा महज वाचिक परंपरा तक सीमित रखकर खारिज करना उचित था? क्या इसे प्रश्नांकित नहीं किया जाना चाहिए था? और यदि नामवर जी इतने ही गैर गुजरे आलोचक थे तो ‘पहल’ ने उन पर समूचा अंक क्यों केंद्रित किया था?
  • राजेन्द्र यादव के आरोप के हवाले से पहल सम्मान की सफाई देते हुए जब ज्ञान जी ने कहा कि स्वयंप्रकाश के अलावा किसी अन्य कायस्थ को यह सम्मान नहीं दिया गया तो उनकी इस गलतबयानी पर अंजुम शर्मा ने मौन क्यों साध लिया? क्या उन्हें नहीं पता था कि यह सम्मान कामतानाथ और नरेश सक्सेना को भी मिला है? जानकारी तो उन्हें यह भी होनी चाहिए थी कि जबलपुर के ही महेश योगी से ज्ञान जी का नाम क्यों जुड़ा था?
  • ज्ञानरंजन जी के इस दावे को भी प्रश्नांकित करना चाहिए था कि ‘पहल’ का कभी कोई पैड नहीं छपा. मेरे पास तो ‘पहल’ के मंहगें रंगीन काग़ज़ और डिज़ायनर पैड पर ज्ञान जी द्वारा लिखे पत्र मौजूद हैं. यह बहुत मामूली बात है, लेकिन जिस तरह से ज्ञान जी ने इसे सादगी के मूल्य की तरह पेश किया क्या इसका उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए था?
  • जब ज्ञानरंजन जी उदय प्रकाश और योगी आदित्य नाथ के प्रसंग की आलोचनात्मक चर्चा कर रहे थे तब अंजुम शर्मा का यह सवाल कि क्या अपने अनुकूल विचारधारा के राजनेता के साथ मंच शेयर करना ठीक है? इस पर ज्ञान जी ने जब यह कहा कि बिल्कुल नहीं, तब क्या अंजुम को यह नहीं कहना चाहिए था कि आपने तो स्वयं मुलायम सिंह के साथ मंच शेयर कर उ.प्र. हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान ग्रहण किया था? मुझे यह इसलिए भी याद है कि पुरस्कार प्राप्त करने की शाम लखनऊ के एक होटल में ज्ञान जी ने सांध्यकालीन पार्टी भी दी थी जिसमें हम सब शामिल थे.
    – ज्ञान जी को यह याद दिलाने के बजाय कि उन्होंने तो स्वयं मुलायम सिंह के हाथों पुरस्कार ग्रहण किया था, अंजुम ने अप्रासंगिक रुप से उनसे यह सवाल कर दिया कि वीरेंद्र यादव ने तो अखिलेश यादव के साथ मंच शेयर किया तो किसी ने विरोध नहीं किया, इस पर ज्ञान जी ने बड़बोलेपन के साथ यह कह दिया कि ‘मैंने विरोध किया‘ और साथ में अखिलेश और तद्भव को भी लपेट लिया और बहिष्कार तक की जानकारी दे दी. क्या इस पर अंजुम को यह सवाल नहीं करना था कि ‘तद्भव’ का बहिष्कार ज्ञान जी ने क्यों और किस तरह किया?
  • मेरा अंजुम शर्मा से यह गंभीर प्रश्न है कि ज्ञान जी से बात करते हुए मेरे द्वारा अखिलेश यादव के साथ मंच शेयर करने का जब जिक्र किया तो यह क्यों नहीं याद रखा कि उसी मंच पर प्रो. रुपरेखा वर्मा, प्रो. रमेश दीक्षित, प्रो. रीता चौधरी, वयंग्यकार प्रो. मेडूसा और अन्य कई लोग शामिल थे. एक किताब के विमोचन का वह बौद्धिक मंच था, जिसमें लखनऊ के बौद्धिक समाज के लोग उपस्थित थे?
  • क्या अंजुम शर्मा को यह जानकारी नहीं है कि लखनऊ में इफ्को सम्मान शेखर जोशी जी को अखिलेश यादव और तत्कालीन मंत्री शिवपाल यादव के हाथों ही मिला था? क्या केदारनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, मैत्रेयी पुष्पा , नसिरा शर्मा, संजीव आदि सहित बहुत से हिन्दी लेखकों ने मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के हाथों हिन्दी संस्थान के पुरस्कार नहीं ग्रहण किये? केदारनाथ सिंह जी तो मुलायम सिंह के सैफई उत्सव के मुख्य अतिथि ही रहे थे। क्यों नहीं काशीनाथ सिंह जी से अंजुम ने यह सवाल किया कि आपने अखिलेश यादव से क्यों पुरस्कार ग्रहण किया? क्या अखिलेश यादव के साथ मेरा नाम अंजुम शर्मा इसलिए जोड़ते हैं कि इससे यादव नामधारी लेखक द्वारा यादव राजनेता का नाम जुड़ने से जातिवाद का लेबल चिपकाया जा सकता है? अंजुम शर्मा क्यों यह गुंजाइश छोड़ते हैं कि लोग इसे उनके अपने सवर्ण मानस का परिणाम मानें?
  • वैसे तो इस साक्षात्कार में बेशुमार तथ्यात्मक गड़बड़ियाँ हैं, लेकिन ज्ञान जी का यह कहना कि वीरेंद्र यादव चालीस साल तक अकेले उ प्र. प्रलेस का सचिव रहे उनका स्मृति भ्रम है। 1981 में प्रलेस का पुनर्गठन हुआ था तब कामतानाथ प्रदेश के महासचिव और मैं पहली बार अजित पुष्कल के साथ सचिव बना था। हाँ, यह जरुर था कि मैं ही संगठन के मोर्चे पर अधिक सक्रिय था। और यह भी कि लगभग पिछले पंद्रह वर्षों से न मैं इसका महासचिव हूँ और न ही सचिव। खैर यह गौण बात है। लेकिन इसी झोंक में ज्ञान जी ने यह भी कह दिया कि ‘वीरेंद्र यादव ने इस दौर में समझौता करने में कोई कमी नहीं दिखाई’। क्या अंजुम शर्मा को ज्ञान जी से यह नहीं पूछना चाहिए था कि वीरेंद्र यादव ने कौन से समझौते किये? और यदि उनसे नहीं पूछा तो मेरे ऊपर मढ़े गए इस आरोप के बाबत क्या उन्हें मेरा पक्ष नहीं जानना चाहिए था? मेरा सार्वजनिक जीवन खुली किताब है, अंजुम यहाँ लखनऊ के किसी अन्य व्यक्ति से ही इस बाबत पुष्टि कर लेते। बिना किसी तथ्य और प्रमाण के इस आरोप को साक्षात्कार में जाने देना क्या मेरा व्यक्तित्व हनन नहीं है? अंजुम शर्मा इसके सहभागी क्यों बने और ‘संगत’ के प्लेटफार्म को इसका सहभागी क्यों बनाया?

इन सवालों के जवाब अंजुम शर्मा को देने ही चाहिए।

वैसे मुझे अंजुम शर्मा से कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है. उन्होंने ‘संगत’ के लिए मेरा साक्षात्कार भी किया था। लोगों का कहना है कि उन्होंने जाति केंद्रित सवालों के साथ मेरी घेराबंदी की, लेकिन मैं इसे इस रुप में नहीं लेता। मैं इसे उनके काम का हिस्सा मानता हूँ। प्रश्नों का चयन उनका विशेषाधिकार है। मैंने इस बारे में अब तक उनसे कोई आपत्ति नहीं जताई। लेकिन असुविधाजनक सवाल और घेराबंदी क्या सेलेक्टिव लोगों की ही की जानी चाहिए? जब अंजुम शर्मा ने ज्ञान जी के साक्षात्कार में तथ्यों की अनदेखी की तो जवाबदेही तो उन्हीं की बनती है। फिलहाल अभी इतना ही।

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1 Comment

1 Comment

  1. Bulaki sharma

    July 23, 2025 at 2:57 pm

    वीरेन्द्र यादव जी के सवालों के जवाब अंजुम शर्मा जी को देने चाहिए कि उन्होंने ज्ञानरंजन जी से प्रतिप्रश्न क्यों नहीं किए साक्षात्कार में?

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