सत्येंद्र पीएस-
भोले बाबा के चरण छूने के चक्कर में हाथरस में 125 से ज्यादा लोग मर गए। भोले बाबा कोई ब्राह्मण जाति के नहीं हैं, दलित हैं। स्वाभाविक है कि उनके ज्यादातर चेले भी दलित हैं।

उत्तर प्रदेश में पढ़े लिखे दलित लोग जय भीम वाले हैं, हिन्दू धर्म में उनकी कोई आस्था नहीं रही है। तार्किक तरीके से सोचते हैं। ऐसे में मौजूदा सरकार के लिए यह बाबा पूरी तरह मुफीद हैं कि दलितों को भोले बाबा बनकर अपने पीछे पीछे घुमाएं। सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों करेगी?
इत्तफाक से आजकल आपको जितने भी लंपट टाइप बाबा मिलेंगे, वह गैर ब्राह्मण हैं। और अगर ब्राह्मण भी हैं तो किसी स्थापित धार्मिक परंपरा या मठ या विचारधारा या स्कूल ऑफ थॉट से नहीं जुड़े हुए हैं। लम्पट टाइप लोग चमत्कार दिखाते हैं, पर्चे निकलवाते हैं, अपनी जादुई ताकत से लोगों की समस्याएं हल करने का दावा करते हैं। और यह भी इत्तेफाक ही है कि जितने भी लंपट बाबा हैं, वह भाजपा के प्रचारक हैं।
अगर आप भीड़ में मरने वालों के प्रति संवेदना जताएंगे तो सोशल। मीडिया पर मौजूद बीमार, विकृत भक्तों की फौज आपके ऊपर टूट पड़ेगी। वह कहेगी कि मक्का में जब मरे तब क्यों नहीं बोला? कांग्रेस के टाइम लोग मरे तब क्यों नहीं बोला? तुम लोग हिन्दू धर्म के दुश्मन हो! यह स्थिति 10 साल से बनी है।उसके पहले इस तरह की बेहूदगी नहीं होती थी कि कोई आपको हिंदू द्रोही, देश द्रोही घोषित कर दे।
जब लोग तबाह होते हैं, बेरोजगार होते हैं तो इस तरह के चमत्कारियों की दुकानदारी तेजी से बढ़ती है। इन लम्पटों के फलने फूलने के लिए अभी उचित वातावरण है। देश 30 साल पीछे जा चुका है।
बकिया विद्वान लोग यह गिनाने के लिए बैठे ही हैं कि सरदार पटेल के टाइम बड़ा दंगा हुआ, भागलपुर में बड़ा दंगा हुआ। वो यह नहीं बताते हैं कि उस समय भी उन्हीं लोगों के चाचा, ताऊ, बाबा ने नरसंहार व दंगे किए थे जो अभी सत्ता में हैं.खैर.. मौसम का आनन्द लीजिए। चाय पकौड़े चापिये। हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ!
शंभुनाथ शुक्ला-
हाथरस के हादसे के बाद बाबाओं पर हमला शुरू हो गया। कुछ लोगों ने बाबाओं को फ्रॉड बताया, मज़मेबाज़ कहा। लेकिन तब तो हर तरह का मज़मेबाज़ एक बाबा ही हुआ। चाहे वह कपिल शर्मा हो या कोई राजनेता। भोले बाबा चूँकि जाटव बिरादरी से हैं इसलिए ब्राह्मण, ठाकुर, यादव पिल पड़े कि एक दलित बाबा कैसे बन गया। यदि बाबाओं की निंदा करनी है तो बागेश्वर से शुरू करो। ख़ैर बाबाओं की सभा में जुटती भीड़ पर सबसे अच्छा लिखा लक्ष्मी शर्मा ने। आप भी पढ़ें-
“आसाराम हो, रामपाल या हाथरस का बाबा, इन की सबसे ज्यादा भक्त स्त्रियां ही होती हैं.
इसके पीछे हमारे सामाजिक बन्धनों में जकड़ी स्त्रियों का मनोविज्ञान सबसे ज्यादा काम करता है.
घर में नौकरों की तरह काम, दोयम क्या अंतिम दर्जे का स्थान, वजह-बेवजह अपमान और सौ-सौ बंदिशों में घुट रही स्त्री के लिए बाबा की संगति वो स्पेस है जहाँ वे मुक्त और स्वायत्त अनुभव करती हैं. एक मर्द जिसके साथ मुक्त भाव से हँस-गा लेती हैं, लोक-लाज के डर से बरी उन्मुक्त भाव से नाच लेती हैं. इस भय से भी मुक्त कि कोई उन्हें फ्लर्ट करता है और वे भी खुले-खिले दिल से किसी को चार्म करती हैं, बिना परिजनों के डर के.
कि बाबा ही सही एक मर्द है जो उन्हें सुंदर कहता है, अच्छी कहता है, उनकी बात सखा भाव से सुनता है. उन्हें रिजेक्ट करने या झिड़कने की बजाय प्रेम से अपनाता है. उन्हें प्रेम के बन्धन में बंधने की जगह प्रेम में मुक्ति की राह दिखाता है.
दुनिया भर के बाबाओं की फेन फॉलोइंग का ये एक कड़वा लेकिन बहुत बड़ा सच है. हमारी सामाजिक जकड़नों से उपजी विसंगतियों का सच.”



