गिरीश मालवीय-
मार्केट कैप के लिहाज से रिलायंस इंडस्ट्रीज के बाद देश की दूसरी बड़ी कंपनी एचडीएफसी बैंक के अंश कालिक चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने कल इस्तीफा दे दिया. इस इस्तीफे के बाद एचडीएफसी बैंक के शेयरों में लगभग 9% की भारी गिरावट आई, जो 2020 के बाद सबसे अधिक थी.
आश्चर्य की बात है कि देश के मीडिया ने इस बात की बिल्कुल भी सुध बुध नहीं ली कि आखिर ऐसा क्या हो गया जो इतने सीनियर डायरेक्टर को इस्तीफा देना पड़ा.
दरअसल HDFC Bank के बोर्ड की बैठक 17-18 मार्च को थी। यह रूटीन बैठक थी। इस बैठक में कुछ ऐसा हुआ जिसकी पहले से उम्मीद नहीं थी। बोर्ड की बैठक में अतनु चक्रवर्ती और एग्जिक्यूटिव मेंबर्स के बीच कुछ मसले को लेकर बहस हुई। इसके बाद अचानक अतनु ने इस्तीफा दे दिया.
बैंक के अंशकालिक अध्यक्ष अतानु चक्रवर्ती, जो 2021 से इस पद पर थे, उन्होंने इस्तीफा देते हुए जो लिखा वो बहुत महत्वपूर्ण है “ पिछले दो वर्षों में मैंने बैंक के भीतर कुछ ऐसी घटनाएं और प्रथाएं देखी हैं जो मेरे व्यक्तिगत मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं हैं।”
यह अकेला वाक्य बताता है कि ऊपरखाने में बहुत ही गलत किस्म की गतिविधियां चल रही थी अब सवाल उठता है कि ये गलत गतिविधि क्या थी.
दरअसल मुम्बई के मशहूर हस्पताल लीलावती अस्पताल ओर HDFC बैंक बीच वर्तमान में एक गंभीर कानूनी और वित्तीय विवाद चल रहा है। लीलावती ट्रस्ट ने HDFC बैंक के CEO शशिधर जगदीशन पर ₹2 करोड़ से अधिक की घूस लेने और अस्पताल के पूर्व ट्रस्टियों की मदद करने का आरोप लगाया है.
चक्रवर्ती के इस्तीफे में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उन्होंने जिन घटनाओं और प्रथाओं को देखा, वे “पिछले दो वर्षों” की थीं। मार्च 2026 से दो वर्ष पीछे की ओर गिनने पर लगभग मार्च 2024 आता है। लीलावती ट्रस्ट विवाद की समयरेखा, जिसमें एचडीएफसी बैंक के वर्तमान प्रबंध निदेशक और सीईओ शशिधर जगदीशन का आचरण सीधे तौर पर शामिल है, ठीक उसी दो साल की अवधि के भीतर आती है।
लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट (LKMM Trust) ने एचडीएफसी बैंक सीईओ शशिधर जगदीशन समेत कई अधिकारियों पर पैसों के गबन का आरोप लगाया ओर एचडीएफसी बैंक के बोर्ड, आरबीआई, सेबी और वित्त मंत्रालय से जगदीशन को तत्काल प्रभाव से सभी कार्यकारी और बोर्ड भूमिकाओं से सस्पेंड करने की गुहार लगाई थी.
ट्रस्ट ने आरोप लगाया था, ”जब्त की गई नकदी डायरी से पता चला कि ट्रस्टियों ने 14.42 करोड़ रुपये की हेराफेरी की है, जिसमें से 2.05 करोड़ रुपये जगदीशन को मिले, जिससे उनकी डायरेक्ट संलिप्तता साबित हुई. इसके बाद बंबई की एक अदालत के आदेश पर प्राथमिकी दर्ज की गई.
शिकायत में आरोप लगाया गया था कि यह भुगतान संयोगवश या अनजाने में नहीं हुआ था। ट्रस्ट के आरोपों के अनुसार, जगदीशसन ने कथित तौर पर चेतन मेहता समूह को ट्रस्ट के संचालन पर अवैध और अनुचित नियंत्रण बनाए रखने में मदद करने के लिए वित्तीय सलाह देने के बदले में 2.05 करोड़ रुपये स्वीकार किए थे।
यह मात्र दो करोड़ रु का केस नहीं था यह तब पता चला जब जगदीशन ने एफआईआर रद्द करने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर की, तो मामला पहले जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस राजेश पाटिल की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हुआ – और जस्टिस पाटिल ने स्वयं को इस मामले से अलग कर लिया। उसी दिन बाद में, मामला जस्टिस सारंग कोटवाल की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष आया, जिन्होंने भी स्वयं को इस मामले से अलग कर लिया।
अगले कुछ दिनों में, न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे, जी.एस. कुलकर्णी, आरिफ डॉक्टर, बी.पी. कोलाबावाला, एम.एम. सथाये, आर.आई. छागला और शर्मिला देशमुख सभी ने इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया।
यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने 4 जुलाई, 2025 को जगदीश की एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि यह मामला पहले से ही बॉम्बे हाई कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है और वे इस मामले पर सुनवाई करने के इच्छुक नहीं हैं।
यानी भारत के सबसे महत्वपूर्ण उच्च न्यायालयों में से एक बॉम्बे हाईकोर्ट के दस न्यायाधीश एक प्रमुख निजी बैंक के सीईओ से जुड़े एक ही मामले से खुद को अलग कर लेते हैं, सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले को हाथ में लेने से घबरा रहा है और अब एक इतने सीनियर डायरेक्टर इस्तीफा दे रहे है ओर देश का मीडिया आपको इतने महत्वपूर्ण घटनाक्रम के बारे में कुछ भी नहीं बता रहा है
है न कमाल!
HDFC बैंक से खबरें खत्म नहीं हो रही है. बैंक ने तीन बड़े अधिकारियों को निकाल दिया है. दुबई और बहरीन ब्रांच में NRI ग्राहकों को AT1 बॉन्ड को FD की तरह सेफ बताकर बेचा गया था. Credit Suisse बैंक का दीवाला निकलने से इनकी वैल्यू जीरो हो गई. जाँच पहले से चल रही थी, अब एक्शन हुआ है. पार्ट टाइम चेयरमैन ने बैंक के कामकाज पर सवाल उठा कर इस्तीफ़ा दिया था.
-मिलिंद खांडेकर


