राहुल देव-
ये घृणा के थोक अधिकृत विक्रेता हैं। पार्टी और परिवार द्वारा नियुक्त-समर्थित घृणा-प्रचारक हैं। मुख्यमंत्री-मंत्री पद से घृणा के प्रचार और हिंसा के आह्वान का जैसे संवैधानिक अधिकार और कवच मिल जाता है। न चुनाव आयोग, न सर्वोच्च न्यायालय, न प्रधानमंत्री और न आंतरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार गृहमंत्री को इनकी और इनके जैसे औरों की बातों में कोई असंवैधानिकता दिखती है, न पद की मर्यादा और गरिमा का कोई उल्लंघन और न सामाजिक शांति को भंग करने की सोची-समझी योजना दिखती है।
डॉ राकेश पाठक-
ऐसे लोग सभ्य समाज के माथे पर बदनुमा दाग की तरह हैं। लेकिन क्या ही किया जाए..जब देश का मुखिया ही ऐसी ही भाषा, ऐसी ही राजनीति का प्रधान संरक्षक हो..!
और चुनाव आयोग से भी किसी तरह की उम्मीद बेमानी है, वह तो ख़ुद इस घृणा के सोल सेलिंग एजेंट का बगल बच्चा बना हुआ है। उसे न कुछ दिखाई देता है और न सुनाई देता है। विडंबना यह भी है कि समाज का एक बड़ा तबका घृणा के थोक विक्रेताओं की दुकान का ग्राहक बन चुका है।
हा हा भारत दुर्दशा न देखी जाई…
शीतल पी सिंह-
हम बटे तो ये इरफ़ान, अंसारी, आलम हमें लूट ले जाएँगे- असम के बीजेपी के मुख्यमंत्री झारखंड चुनाव में
आधिकारिक रूप से हमारा चुनाव आयोग इस तरह के सीधे सांप्रदायिक बंटवारे के आधार पर वोट मांगने के प्रयास को दंडित करने के लिए प्रतिबद्ध है!
रवीश कुमार-
प्रिय चुनाव आयोग,
संविधान के गाल पर रोज तमाचा मार रहे एक मुख्यमंत्री को ऐसे भाषण देने को खुली छूट कैसे है? कृपया देश को बताइए कि इसमें आपकी मौन स्वीकृति क्यों है? बाबा साहब के संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। कुछ तो शर्म कीजिए..
डॉ लक्ष्मण यादव-
असम के भाजपा के मुख्यमंत्री झारखंड चुनाव में जाकर बोल रहे हैं कि हम बटे तो ये इरफ़ान, अंसारी, आलम हमें लूट ले जाएँगे.
क्या देश में चुनाव आयोग नाम मात्र का ही बचा है? देश के सांप्रदायिक नेता खुलेआम सांप्रदायिक बंटवारे के आधार पर वोट मांग रहे हैं. कहाँ है चुनाव आयोग? देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त राजीव कुमार जी को एक आध शायरी इन सांप्रदायिक नेताओं पर भी बोलनी चाहिए.


