सौमित्र रॉय-
प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी जैसा सच्चा दोस्त ढूंढने पर शायद ही और कोई मिले। खासकर अगर दोस्ती गौतम अदानी जैसे के लिए हो।
हिन्डेनबर्ग के रिपोर्ट की दूसरी किस्त आने के बाद सवाल यह नहीं कि सेबी प्रमुख और उनके पति का अदानी के काले कारोबार में पैसा लगा था। सवाल इस बात का है कि मोदी ने तमाम सच्चाई बाहर आने के बावजूद अपने दोस्त को बचाने के लिए बिल्ली को ही दूध की रखवाली सौंप दी?
2014 के बाद से भारत में सामने आ रहे तमाम घोटालों में दो नाम ही क्यों सामने आ रहे हैं–गौतम अदानी और नरेंद्र मोदी।
तीसरा नाम गौतम के भाई विनोद अदानी का है। हिंडेनबर्ग ने पिछली रिपोर्ट में बताया था कि विनोद ने किस तरह अदानी पावर कंपनी के उपकरणों की ज्यादा दाम पर खरीद का पैसा मॉरीशस की जाली कंपनी के जरिए भारतीय शेयर बाजार में झोंका और वन टू का फोर कर अमीर बन गया।
विनोद अदानी मॉरीशस से काला धन बरमूडा ले जा रहा है और वहां से पैसा शेयर बाजार में आ रहा है।
इधर, भारत में गौतम अदानी नियम–कानूनों से बेखौफ खेल रहा है और उधर, सुप्रीम कोर्ट तक खामोश तमाशा देख रही है।
क्या तमाम जांच एजेंसियों के होते यह मुमकिन है कि सत्ता को इस खेल का पता न हो?
खासकर, तब जबकि सेबी की मुखिया माधवी पुरी बुच के पद संभालते ही अदानी सेठ उससे मिलने पहुंचा हो?
बखूबी सब पता था।
यह भी कि माधवी और उसके पति धवल का पैसा मॉरीशस और बरमूडा की उसी कंपनी में लगा है, जिसका ऑफिस विनोद अदानी के ऑफिस कॉम्प्लेक्स में है।
2017 में माधवी के सेबी का सदस्य बनने से पहले ही उसका पति मॉरीशस के ट्राइडेंट ट्रस्ट को चिट्ठी लिखकर खुद को खाते का इकलौता संचालक बताता है।
फिर उस खाते में पति–पत्नी की सैलरी से 1 करोड़ डॉलर जमा होते हैं।
हिंडेनबर्ग की पिछली रिपोर्ट के बाद जब सुप्रीम कोर्ट ने सेबी से पूछा कि अदानी सेठ के विदेशी शेयर धारकों को कौन पैसा दे रहा है, तो सेबी नादान बलमा बन गया।
कैसे? क्यों? यह भी मोदी सत्ता को बखूबी पता था, क्योंकि उसी ने तो बिल्ली को दूध की रखवाली सौंपी थी।
शोले फिल्म में डकैत गब्बर सिंह रिवॉल्वर में एक गोली डालकर 3 साथियों से कहता है कि जिंदगी और मौत किस खाने में है, हमको कुछ नहीं पता। उसे सब पता था।
इंडिया इंफोलाइन, ईएम रिसर्जेंट फंड, इमर्जिंग इंडिया फोकस फंड जैसे दर्जनों विदेशी फंड से काला धन अदानी सेठ की कंपनियों में आ रहा है और जांच करने वाली सेबी की मुखिया ही चोर निकली।
नरेंद्र मोदी जानते थे कि 2014 में सत्ता पाने के बाद जिन संस्थानों पर उन्होंने कब्जे किए, वे हाथ से निकल सकते हैं। वे उन्हें ले डूबेंगे।
लेकिन, उन्होंने 2002 के दंगों का कर्ज़ उतारने के लिए अदानी सेठ के हर काले कारनामे में साथ दिया, देते चले गए।
2017 से मार्च 2022 तक माधवी की सिंगापुर के अगोरा पार्टनर्स कंपनी में 100% हिस्सेदारी रही।
और सेबी का मुखिया बनते ही उसने सारी हिस्सेदारी अपने पति के नाम कर दी। ठीक वैसे ही, जैसे गौतम अदानी का काला कारोबार विदेश में बैठा विनोद अदानी चलाता है।
सेबी पर बाजार को निगमित करने के लिए नियम–कायदे बनाने की भी जिम्मेदारी है।
अफसोस कि मोदी सत्ता ने अदानी को बचाने के लिए एक चोर को सेबी की कुर्सी सौंप दी।
फिर क्या! इधर पतिदेव ब्लैकस्टोन नाम की एसेट कंपनी में सलाहकार बन गए और उधर माधवी ने सेबी के रसूख से रिट्स को इस बुलंदी पर खड़ा कर दिया कि आईपीओ तक निकलने लगे।
सब कुछ मोदी सत्ता की नाक के नीचे हो रहा है। उसे सब पता है। चीफ जस्टिस को भी पता है।
तभी, सत्ता से लेकर न्यायपालिका तब, सभी को अपने ईमानदार होने की दुहाई देनी पड़ रही है।











नवीन रमण-
हिंडनबर्ग खुलासे की भनक पीएम मोदी को लग गई थी तभी तीन दिन पहले संसद का सत्र समाप्त कर दिया।
क्या मोदी सरकार सिर से पाँव तक भ्रष्टाचार में डूबी है?
क्या इसीलिए अपने दोस्त अडानी को बचाने के लिए मोदी जी ने उसी SEBI अध्यक्ष से जाँच कराई जिसने अडानी के साथ मिलकर घोटाला किया?
SC को अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए, क्योंकि यह मामला किसी व्यक्ति या पार्टी का नहीं बल्कि देश का है।



