कर्मेंदु शिशिर-
ज्ञानरंजन जी के इंटरव्यू को विवादास्पद होना था और वह हुआ। उनकी उम्र 88 साल की हुई। अभी -अभी वे हास्पीटल से लौटकर आये और इतने लंबे समय तक बैठकर बड़े उत्साह से इंटरव्यू दिये। जब मैंने सुना तो तीन-चार जगह मुझे भी लगा कि वे बहक गये हैं। लगा वे गपशप कर रहे हैं।
मुझे नहीं पता अंजुम जी ने गॉसिप को तरजीह क्यों दी? जब वे नामवर जी और राजेंद्र यादव जी पर बोल रहे थे तो अंजुम जी को पूछना चाहिए था कि अगर ऐसा ही था तो ज्ञानरंजन जी ने नामवर जी पर पहल का विशेषांक क्यों निकाला? पहल का वह अकेला व्यक्ति -केन्द्रित विशेषांक था। राजेंद्र यादव जी पर उन्होंने एक पुस्तिका भी प्रकाशित की थी, वह अब भी है मेरे पास। ठीक इसके बाद उन्होंने राजेंद्र यादव जी को देहरादून में आमंत्रित किया और पहल सम्मान समारोह की उनसे अध्यक्षता कराई।
ज्ञानरंजन जी ने नामवर जी के पूरे लेखन को लेकर जो बात कही वह नहीं कही जा सकती। किसी रचनाकार का अवदान इस तरह नहीं देखा जाना चाहिए। राजेंद्र यादव जी हंस के माध्यम से दलित लेखन को आंदोलन का रूप दिया। दूधनाथ जी को लेकर जो बात की वह जो हो लेकिन उनकी बिटिया ने तो अंतर्जातीय विवाह किया। लेखकों के भीतर अंतर्विरोध होते हैं, नामवर जी जैसी मेधा हिन्दी का सौभाग्य था। इसकी आलोचना और खेद हम सब करते हैं कि वे लिखने में कंजूसी कर गये। सबके भीतर अंतर्विरोध होते हैं, इससे लेखक त्याज्य नहीं हो जाता।
उदयप्रकाश जी हिन्दी के ही नहीं, भारतीय साहित्य के एक बड़े कथाकार हैं। प्रख्यात उर्दू कथाकार इंतजार हुसैन ने कहा था कि पाकिस्तान के पास बहुत प्रतिभावान कथाकार हैं लेकिन पाकिस्तान के पास उदयप्रकाश नहीं हैं। ज्ञानरंजन जी खुद उदयप्रकाश जी को लेकर बहुत बड़ी बाते कहते थे। साहित्य अकादमी पुरस्कार उनको न मिले इसके लिए षडयंत्र होते रहे जो उनको दुखी करते थे और हम सबको भी। उदयप्रकाश जी की जर्मनी में क्या प्रतिष्ठा है, यह मैंने देखा था। होटल वाले उनसे खाने का पैसा भी न लेते थे। ऐसे एक होटल में मैंने खाना खाया था। उनकी संपत्ति या किसी की संपत्ति को लेकर ज्ञानरंजन जी क्यों ऐसा बोल गये, यह मैं समझ न सका? यह नहीं कहना चाहिए था।
अंजुम जी ने इंटरव्यू को लगभग गॉसिप बना दिया। उनको रचनात्मक सवाल करने चाहिए थे। समकालीन साहित्य को लेकर। वर्त्तमान हिन्दी लेखन को लेकर। इसी तरह काशीनाथ जी को लेकर ज्ञानरंजन जी ऐसा कह गये कि यकीन ही न हुआ। काशी का अस्सी एक अकेली ऐसी क्लासिक रचना है जो रुद्र काशिकेय की बहती गंगा की तरह उनको अमर रखेगी। उनके अद्भुत संस्मरण हैं, कुछ कालजयी कहानियाँ हैं।
ज्ञानरंजन जी ने अपनी ही कहानी घ॔टा का उल्लेख किया, यह न तो उनकी प्रतिष्ठा के अनुरूप था और न स्वभाव के। वे अमूमन अपने बारे में नहीं बोलते। लेकिन अपने जीवन के इस आखिरी पाली में एक इंटरव्यू में कुछ न कहने वाली बातों को लेकर, एक विचलन को लेकर उन पर जिस तरह लिखा जा रहा है वह भी कहीं से शोभन नहीं है। उनका योगदान बहुत बड़ा है। उनका लेखन, संपादन ऐतिहासिक है। उससे परिचित होना चाहिए और हिन्दी को छीछालेदर के कीच आनंद से तौबा कर सृजनात्मक बहस में रुचि लेनी चाहिए। बेमतलब की और महत्वहीन, क्षणिक और अत्यंत सामयिक चीजों में उभ-चूभ होने में कोई सार नहीं है। यह आदत हिन्दी को नाबदान बना देगी।
हिन्दी में छोटे-बड़े सभी रचनाकारों का योगदान है। नामवर सिंह, राजेंद्र यादव, उदयप्रकाश, काशीनाथ सिंह, ज्ञानरंजन ये सब हिन्दी के बड़े नाम हैं। किसी के कहने या लिखने से हिन्दी इनमें किसी को बिलकुल खोना नहीं चाहेगी। इसको गॉसिप की तरह ही लेकर भरसक टाल ही देना चाहिए। न कि मौका मिला है तो चलो एक पत्थर हम भी मार डाले जैसा कि फेसबुक पर चलन है।
लेखकों की दोस्ती और दुश्मनी को समझने के लिए खास तरह का साहित्यिक मन-मिजाज चाहिए। ऐसे बहुत किस्से मैंने लेखकों से ही सुने हैं।सबको बताना संभव नहीं और सब मैं बताऊँगा भी नहीं।कुछ बचाकर रखना चाहिए।
- रामविलास जी और रांगेय राघव में बातचीत तक बंद थी।तब रामविलास जी आगरा में थे और सिगरेट पीते थे।एक सभा में मंच पर रामविलास जी बैठे हुए थे और बगल में सिगरेट का डब्बा था।रांगेय राघव ने उनकी बगल में बैठे किसी से कहा कि रामविलास को कहो ,मैं एक सिगरेट माँग रहा हूँ। उसने रामविलास जी से कहा।रामविलास जी ने कहा एक ही सिगरेट है,कह दो नहीं दूँगा। रांगेय राघव ने कहा एक नहीं,दो है उससे कहो चुपचाप एक दे दे।रामविलास जी ने अनसाकर भुनभुनाते हुए एक सिगरेट दे दी।रांगेय राघव ने फिर कहा कहो जरा माचिस भी दे दे।रामविलास जी माचिस देते हुए गुस्साकर बोले-सिगरेट पियेगा और माचिस भी नहीं रखेगा।रांगेय राघव ने कहा-महा बदमाश है रामविलास!
- यह बात मुझे खुद रामविलास जी ने बताई थी।बोले मैं निराला जी पर लिखने के दौरान उग्र जी के पास जाता था।जब भी जाता वे निराला जी पर अनाप-शनाप बोलने लगते।एक बार मैं गया तो वैसा ही हुआ। उनकी बगल में उनका कोई चेला भी बैठा था।उग्र जी निराला जी पर अंट-संट बोलते जा रहे थे।इससे उत्साहित होकर उस चेले ने भी निराला जी को लेकर खुद बकने लगा। रामविलास जी ने कहा कि अचानक उग्र जी तमतमाये उठे और उस चेले का फेफला पकड़कर तुरंत चाँटे रसीद कर दिये। साले,निराला तो मेरा दोस्त था उस पर मेरा मन जो करे बोलूँ,गाली दूँ। तुम साले दो कौड़ी के,तुम्हारी क्या औकात जो मेरे दोस्त पर बोलो?तो ऐसे होते थे वे !
और फिर कभी ! तो साहित्यकार के मन-मिजाज को जानने के लिए कुछ-कुछ वैसा होना चाहिए। आज के अधिकांश साहित्यकार किसी सामंती जातिवादी नेता या गुमान में अहर्निश रहने वाले अधिकारी की तरह ठसक वाले हो गये हैं। ठहाका लगाते आपने कितने साहित्यकारों को देखा है? हमारे मित्रों में ऐसे बहुत हैं। यार! साहित्य जीने की चीज है। लिखना -वखना और प्रसिद्ध होने, चर्चित होने, पुरस्कृत और अनूदित होने के पियरी रोग से बचिये तब ही साहित्य जीने की तमीज आयेगी।दिमाग से सब जी रहे हैं, कलाकार होना है तो कभी-कभार दिल से भी जी लिया करो!




Bulaki sharma
July 23, 2025 at 2:54 pm
कर्मेंदु जी का बढ़िया आलेख। ज्ञानरंजन जी का साक्षात्कार चर्चा में है लेकिन उसे समझने के लिए लेखक का साहित्यिक मिजाज और मन होना चाहिए। ज्ञान जी की कही कई बातें विस्मित करती हैं किंतु उनके साहित्यिक अवदान का सब सम्मान करते हैं और करते रहेंगे।
आशा जोशी
July 23, 2025 at 9:42 pm
कर्मेन्दु शिशिर जी की बात में दम है। ज्ञानरंजन जी का साहित्यिक योगदान नकारा नहीं जा सकता , यह बात विचारणीय है कि क्या उम्र के साथ चिंतन और विचार पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ता है?