‘हिंदी मीडियम’ देखते हुए आप पॉपकार्न चबाना तक भूल जाते हैं

Uday Prakash : अभी ‘हिंदी Medium’ देख के लौटा। जो भूमिका पहले प्रतिबद्ध साहित्य निभाता था, वह अब ऐसी फिल्म निभा रही है. बाहुबली जैसी मध्यकालीन चित्रकथा फिल्म देखने की जगह, हिंदी मीडियम जैसी फ़िल्में देखने की आदत डालनी चाहिए। इवान इलिच की मशहूर किताब ‘डिस्कूलिंग सोसायटी’ बार-बार याद आती रही. लेकिन यह फिल्म शिक्षा के धंधे में बदलने के विषय से बाहर भी जाती हुई, बहुत बड़ा और ज़रूरी सन्देश इस तरीके से देती है कि आप पॉपकार्न चबाना तक भूल जाते हैं. पूरा हाल भरा हुआ था और ऑडियंस लगातार फिल्म के साथ बोलता, हँसता, सोचता, तालियां बजाता, भावुक होता देखता जा रहा था। आज का दिन ही नहीं यह पूरा महीना हिंदी मीडियम के नाम. (वह महीना जिसमें बाहुबली और Guardians of Galaxie जैसी ब्लॉक बस्टर फ़िल्में भी शामिल है.  🙂

Yashwant Singh : अपनी पहली ही फिल्म से छिछोरपन और सेक्सी सड़ांध की भयानक बदबू छोड़ने वाले अविनाश दास व उनके कट्टर भक्त टाइप चेलों-गुरुओं को ‘हिंदी मीडियम’ फिल्म जरूर देख लेनी चाहिए… क्या कमाल की फिल्म बनाने लगे हैं लोग.. मेरी तरफ से पांच में पांच स्टार. अमीरी-गरीबी, हिंदी-अंग्रेजी, एलीट-भदेस, अध्यात्म-भौतिकता, सिस्टम-करप्शन, जीवंतता-कृत्रिमता, स्वार्थ-त्याग… जाने कितने फ्रेम समेटे है ये फिल्म… जाने कितनी कहानियां कहती है ये फिल्म. मैं सभी से अनुरोध करता हूं कि सपरिवार यानि बीवी बच्चों समेत ये फिल्म देख आइए. पूरा पैसा वसूल है. बहुत दिनों बाद दिल के करीब कोई फिल्म लगी.

जाने माने साहित्यकार उदय प्रकाश और भड़ास एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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