सुभाष सिंह सुमन-
यदि आपको लगता है कि ताजा हिन्दी साहित्य उत्पीड़न प्रकरण पर अतिउत्साही एक्टिविज्म कर रहे लोगों को वाकई में न्याय या इंसाफ जैसी किसी चीज से मतलब है, तो मेरी गारंटी ले लीजिए, आप बहुत भावुक भोले हैं या बहुत ज्यादा मूर्ख। सोशल मीडिया पर एक्टिविज्म की बहार लाये लोगों में से 90 फीसदी के लिए यह सिर्फ नया रस है। कुछ के लिए यही रोजी-रोटी है। घर के चूल्हे इन्हीं सब से जल रहे हैं उनके। कुछ के लिए यह सिर्फ एक नया मुद्दा है, जो सोशल मीडिया की सनसनी के दौर में 2-4 दिन भी मुश्किल से ट्रेंड कर पाता है। मतलब ट्रेंड सेंक रहे हैं कुछ लोग। सबसे ज्यादा लोगों के लिए यह हिसाब बराबर करने का मौका है। यूरेका मोमेंट। अगर इसी एक्टिविज्म को लेकर जमीन पर उतरने की नौबत आयी, तो 99 फीसदी गायब मिलेंगे, इसकी भी मैं गारंटी दे सकता हूँ।
कुछ साल पहले खुर्शीद अनवर का नाम उछला था। कुछ इसी तरह का मामला था। आरोप और संगीन थे। अब कृष्ण कल्पित का नाम उछला है। उदाहरण के लिए एक बड़े नामधारी संपादक और खेमा विशेष के मसीह ओम थानवी जी को रख लीजिए। कृष्ण कल्पित का नाम देखकर जो थानवी भारी-वजनी तर्क दे रहे हैं, वही थानवी खुलकर खुर्शीद अनवर का बचाव कर रहे थे। उस मामले में भी पीड़ित लड़की ही बतायी गयी थी और इस मामले में भी लड़की है। लेकिन स्टैंड एकदम उल्टा है। कारण? कारण है कि यहाँ महानुभावों का मुद्दा न्याय है ही नहीं। मुद्दा गिरोह का है, पक्ष का है, सुविधा का है, सुपारी का है। यहाँ न्याय की परिभाषा गिरोह देखकर तय होती है। सत्य की परिभाषा अपनी सुविधा से बदल दी जाती है यहाँ। मन हुआ तो सफेद को सफेद बोले, नहीं तो सफेद का ही नाम बदलकर काला कर दिये।
एक और बात जो ध्यान में रखने वाली है। उदार विचार ऐसे मामलों में लड़की पक्ष को संदेह का फायदा देने की पैरवी करता है। लंबे समय तक मैं खुद भी इसी ढर्रे पर सोचा करता रहा। कोई मामला आया, तुरंत ही मैं तोप का मुँह पुरुष पक्ष की ओर घुमा दिया करता था। मुझे उस समय यह उचित जान पड़ता था। कई प्रकरण आये। सोच के इस ढर्रे के कारण कई प्रकरणों में इस्तेमाल भी हो गये। एक बार तो मैं एक बड़े भाई जैसे वरिष्ठ के खिलाफ ही दनादन पोस्ट पेलने लगा था, जबकि वो मुझे हमेशा अनुजवत स्नेह देते आये। उसमें भी कुछ ऐसा हुआ कि अपने स्टैंड पर भारी ग्लानि हुई। उनका बड़प्पन है कि मेरे उस समय के बायस को उन्होंने समझा। खिलाफ में लिखी बातों के बाद भी मेरे प्रति उन्होंने मन मलिन नहीं किया। उनकी जगह मैं होता तो शायद ही माफ कर पाता।
संदेह का इस तरह से फायदा देने का विचार वास्तव में एक प्रकार का कंफर्मेशन बायस है। मनोविकार है यह विचार। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इस मनोविकार से मैं खुद बहुत समय तक ग्रसित रहा। बड़े नामधारियों में यह मनोविकार ज्यादा ठोस है। अगर आपके ऊपर किसी गिरोह की सदस्यता का दबाव नहीं है, एक्टिविज्म के नाम पर चंदा-चाथन करके आपका घर नहीं चलता है और ट्रेंडिंग टॉपिक में हाथ धोने के रस का स्वाद उतर चुका है, फिर भी ऐसे मुद्दों पर आप अतिउत्साह में हैं, तो खूब संभावना इस बात की बनती है कि आप इस मनोविकार के मरीज हैं।
ऐसे मामलों में अगर वास्तव में कोई पक्षकार बनना चाहता है तो इसके लिए संविधान में पूरी व्यवस्था की गयी है। ऐसे संगीन मामलों में कोई तीसरा पक्ष भी कानूनी कार्रवाई शुरू करा सकता है। पीड़ित बतायी जा रही लड़की पुलिस के पास नहीं जा रही है, इसके पीछे उसके अपने कारण और समीकरण होंगे। लेकिन आप जो उतावले हो रहे हैं, आपका यह उतावलापन अगर वास्तव में किसी का खून नहीं, बल्कि न्याय माँगता है, तो खुद जज और अन्वेषक बनने की जगह कोर्ट-कचहरी जाइए। इस प्रकरण में तो ड्राई स्टेट में दारूबाजी का कोण भी छनकर आ रहा है। इस एक कोण से भी अन्वेषण शुरू हो, तो पूरा दूध-पानी अलग होने से ‘नई धारा’ तो क्या, कोई धारा नहीं रोक पायेगी।
लेकिन फिर से गारंटी देता हूँ, 99 फीसदी उत्साही सोशल मीडिया एक्टिविस्ट ऐसा नहीं करने जा रहे हैं। हाँ, अगर कल्पित की सुपारी से चंदाखोरी की गुँजाइश बने तो एक्टिविज्म को कुछ उत्प्रेरणा जरूर मिल सकती है।
संजीव चंदन-
पिछले दिनों एक हॉरर स्टोरी सुनी। सुनाने वाली लड़की अब तो उसके ट्रॉमा से निकल चुकी थी। लेकिन जब झेला होगा तो बिल्कुल हॉरर होगा।
प्रलोभन के सामने न झुकने पर कैसे वह स्टॉक की गई। सुनकर मैं चकित था। जबकि घोस्ट को मै जानता हूं। वह लड़की कोई पहली नहीं थी जिससे मैंने कहानी सुनी थी।
वह घोस्ट हिंदी साहित्य के संगठनों में प्रतिष्ठित है। बड़े पदों पर रह कर अब मर चुका है सरकारी पदों से तो हिंदी साहित्य में सक्रिय है। सरकारी पदों पर भी वह घोस्ट ही था। हिन्दी साहित्य में भी दखल रखता था।
लड़की एक सरकारी संस्थान के हेड के तौर पर उसके द्वारा स्टॉकिंग की कहानी सुना रही थी। एक बार उस घोस्ट से पीड़ित एक लड़की से मुझे Rajesh Chandra भाई ने मंडी हाउस में मिलवाया था।
एक बार मरहूम पंकज सिंह ने कहानियां सुनाई थी। तब पता नहीं ओम थानवी याद कर पायेंगे कि नहीं, लेकिन वे भी थे। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की उस शाम को जब पंकज सिंह ने कहानी सुनाई थी।
इसीलिए जरूरी है कि साहित्य की संस्थाओं के लिए, संस्थानों के लिए एक गाइडलाइन बने। नागरिक गाइड लाइन।
संस्थाएं पीड़ित/ सर्वाइवर को भी न्याय दे और ghosht को नेचुरल जस्टिस। नेचुरल जस्टिस के लिए भारत की न्यायिक प्रणाली ने एक व्यवस्था कर रखी है। Ghosht के लिए भी।
जो सर्वाइवर हैं वे नहीं बोल पाती हैं कई बार। तो कहानी बनकर रहती हैं साहित्यिक रसरंजन कार्यक्रमों में।


