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फेसबुक ने होंडा कार के प्रेस नोट को किया बैन

नई दिल्ली | दिवाली जैसे महत्वपूर्ण अवसर पर भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी से जुड़ी खबर पर फेसबुक का कड़ा कदम सामने आया है। पत्रकार राइजिंग राहुल ने अपने फेसबुक अकाउंट पर होंडा कार्स इंडिया के प्रेस नोट की कुछ लाइनों को पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बिक्री से जुड़े आंकड़ों पर गौर करने की बात कही। इन लाइनों के साथ “भड़ास फॉर मीडिया” द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट का लिंक साझा करते ही फेसबुक ने इसे “कम्युनिटी गाइडलाइन का उल्लंघन” मानते हुए राहुल के अकाउंट पर बैन लगा दिया। यह घटना न सिर्फ पत्रकारिता की आजादी बल्कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाती है।

राइजिंग राहुल द्वारा शेयर की गई पोस्ट में होंडा कार्स इंडिया का आधिकारिक प्रेस नोट था, जिसमें कंपनी के अक्टूबर 2024 के बिक्री आंकड़े दिए गए थे। भड़ास फॉर मीडिया ने इसी प्रसंग का संदर्भ लेकर भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर में चल रही मंदी के बारे में विस्तार से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। रिपोर्ट में बताया गया कि दिवाली के दौरान भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर ने आशानुरूप प्रदर्शन नहीं किया। इससे ऑटोमोबाइल कंपनियों को तगड़ा झटका लगा है, क्योंकि पिछले कुछ महीनों से बाजार में मंदी का दौर चल रहा था और कंपनियाँ दिवाली के समय पर इसे भरपाई के अवसर के रूप में देख रही थीं। राइजिंग राहुल ने इस रिपोर्ट के लिंक को साझा किया और इसके साथ होंडा के प्रेस नोट की तीन प्रमुख पंक्तियाँ लिखीं। इस पोस्ट के तुरंत बाद फेसबुक ने उनके अकाउंट को बैन कर दिया और इसे “कम्युनिटी गाइडलाइन का उल्लंघन” बताया।

फेसबुक का यह कदम काफी चौंकाने वाला था क्योंकि यह पूरी पोस्ट तथ्यात्मक रूप से सही थी और इसमें किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक या भ्रामक जानकारी नहीं थी। भड़ास फॉर मीडिया ने ऑटोमोबाइल सेक्टर के संकट पर एक तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें कई प्रमुख तथ्यों और आंकड़ों को प्रस्तुत किया गया था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या फेसबुक ने इस पोस्ट को ब्लॉक करने का निर्णय उचित था? और क्या यह निर्णय किसी विशेष प्रायोजक या बड़े ब्रांड के दबाव में लिया गया था?

यह घटना सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर भी सवाल उठाती है। क्या फेसबुक जैसी बड़ी टेक कंपनियाँ सच और तथ्यों को नियंत्रित कर रही हैं? क्या अब प्लेटफॉर्म पर उन पोस्टों को भी हटाया जा रहा है, जो किसी विशेष ब्रांड की छवि को प्रभावित कर सकती हैं?

पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्य को जनता तक पहुँचाना है, लेकिन जब फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म इसे नियंत्रित करने लगते हैं, तो पत्रकारों के लिए काम करना कठिन हो जाता है। राइजिंग राहुल ने एक सामान्य और तथ्यात्मक पोस्ट की थी, जिसमें कोई आपत्तिजनक या भ्रामक सामग्री नहीं थी। फिर भी, फेसबुक द्वारा उनके अकाउंट पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय स्वतंत्र पत्रकारिता पर एक प्रकार की सेंसरशिप का प्रतीक बन गया है। और ऐसा कोई पहली बार नहीं है। 2018 में कश्मीर में बढ़ते तनाव के दौरान कई पत्रकारों और मीडिया हाउसों की पोस्ट्स को फेसबुक और ट्विटर ने हटा दिया था। उस समय इन पोस्ट्स को “कम्युनिटी गाइडलाइंस” का उल्लंघन बताते हुए ब्लॉक कर दिया गया था। कई पत्रकारों ने इस निर्णय की आलोचना की और इसे स्वतंत्र पत्रकारिता पर प्रहार बताया।

कोविड-19 वैक्सीन को लेकर जानकारी साझा करने पर भी फेसबुक और इंस्टाग्राम ने कई पोस्ट्स को “मिसइंफॉर्मेशन” कहकर ब्लॉक कर दिया। इसमें न्यूज़ पोर्टल और स्वतंत्र पत्रकारों की रिपोर्ट भी शामिल थी, जिन्होंने वैक्सीन के साइड-इफेक्ट्स पर ध्यान दिलाने का प्रयास किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव 2020 के दौरान कई स्वतंत्र पत्रकारों और सोशल मीडिया अकाउंट्स ने चुनावी धांधली पर सवाल उठाए। फेसबुक और ट्विटर ने ऐसी पोस्ट्स को “फेक न्यूज़” बताते हुए हटाया और कई अकाउंट्स को निलंबित कर दिया। जलवायु परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर कई ऐसी रिपोर्टिंग्स भी फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने हटाई हैं, जो किसी बड़े कॉर्पोरेट हित के खिलाफ होती हैं। इसे भी सेंसरशिप का एक उदाहरण माना गया है।

फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्म आज सूचना और अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बन चुके हैं। इन प्लेटफार्म्स का एक प्रमुख उद्देश्य यही है कि वे लोगों को अपने विचार साझा करने की स्वतंत्रता दें। लेकिन जब तथ्यों और सत्य पर आधारित पोस्ट्स को “कम्युनिटी गाइडलाइंस” का उल्लंघन कहकर हटाया जाता है, तो यह अभिव्यक्ति की आजादी के सिद्धांत पर सवाल उठाता है। यह प्लेटफॉर्म्स के दायित्व और जिम्मेदारी को भी उजागर करता है कि उन्हें निष्पक्ष रहना चाहिए।

राइजिंग राहुल की पोस्ट को हटाना फेसबुक के रवैये पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या फेसबुक जैसे प्लेटफार्म केवल बड़े ब्रांड्स और प्रायोजकों के हितों को ध्यान में रखते हैं? या फिर पत्रकारों की स्वतंत्रता और सच्चाई की आवाज को दबाने का एक और प्रयास है? अभिव्यक्ति की आजादी एक लोकतांत्रिक समाज की नींव है, और जब सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स इसे नियंत्रित करने लगते हैं, तो यह लोकतंत्र और सत्य पर एक प्रकार का प्रतिबंध बन जाता है। इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र पत्रकारिता के हित में सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स की निष्पक्षता को बनाए रखने की सख्त आवश्यकता है।

यहां पढ़ें भड़ास पर प्रकाशित पूरी रिपोर्ट…

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