
विज्ञापनों से ‘सरकार’ का प्रचार जारी है। कल हीरो और मारुति सुजुकी ने जीएसटी कम करने के लिए महामानव की तारीफ की थी। आज जीएसटी कम होने का सरकारी विज्ञापन जनसत्ता में भी है। यह मोदी है तो मुमकिन है जैसा मामला है वरना सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ रहने का दावा करने वाला एक्सप्रेस समूह सरकारी विज्ञापन कहां पाता था। यह विज्ञापन एक्सप्रेस में भी है और बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण के तीन टेंडर की खबर भी। अब टैक्स कम हुआ है तो जनता को बताना ही पड़ेगा। बता तो तब भी सकते थे जब लगाया था। उस समय जो पैसे बचाये थे या वसूली हुई है अब उसे खर्च कर रहे हैं लेकिन ऐसा ही कुछ पी चिदंबरम और अरविन्द केजरीवाल ने किया था तो जेल हो आये। या वो मामला कुछ और था? मुझे गलतफफहमी है? गोदी वालों को इसे भी स्पष्ट करना चाहिये।
संजय कुमार सिंह
आपको पता होगा कि राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र, रायबरेली के दो दिन के दौरे पर थे। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं-कार्यकर्ताओं ने उनके काफिले को बीच रास्ते में ही रोक दिया था। आज देशबन्धु में छपी खबर के अनुसार, राहुल गांधी ने कहा कि बीजेपी के लोग बहुत आंदोलित हो रहे हैं। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि जब हाइड्रोजन बम आएगा तो सब साफ हो जाएगा। देश में वोट चोरी करके सरकारें बनाई जा रही हैं।….महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा के इलेक्शन में वोट चोरी हुई। हमने कर्नाटक सेंट्रल का ब्लैक एंड व्हाइट सबूत दिया है। यह खबर आज दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। जो खबरें हैं उनमें कई हेडलाइन मैनेजमेंट की खबरें हैं। उनपर आने से पहले राहुल गांधी के आरोप पर भाजपा का जवाब जानने और बताने लायक है। इस तथ्य के बावजूद कि चुनाव आयोग का बचाव भाजपा क्यों कर रही है यह सवाल भले जोर-शोर से नहीं उठाया जा रहा है पर है तो और भाजपा को भी पता है कि यह सवाल कोई भी कर सकता है और न भी करे तो सोचता जरूर होगा। चुनाव आयोग जवाब नहीं दे रहा है और उसकी खबर नहीं होती सो अलग मुद्दा है। भाजपा ने कहा है तो देशबन्धु ने उसे भी छाप दिया है। खबर के अनुसार, वोट चोरी के आरोप वाला पावर प्वांइट प्रजेंटेशन विदेशी धरती से बनकर आया था। इसके साथ ही भाजपा ने उपराष्ट्रपति चुनाव में मतदान और परिणाम पर सवाल उठाने के लिए कांग्रेसी नेता राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा कि गलत बयानबाजी करना उनकी आदत बन गई है। भाजपा प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने पार्टी कार्यालय में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के विदेशी दौरे पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनको देश की धरती से नहीं विदेश से प्यार है।
सवाल यह है ऐसा हो भी तो क्या भाजपा को वोट चोरी करके सत्ता में बने रहने का अधिकार मिल जाता है? चुनाव आयोग को वोट चोरी करने देना चाहिये या इस आरोप का जवाब नहीं देना चाहिये या शपथपत्र नहीं देने पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिये? इन और ऐसे तमाम मामलों पर न सिर्फ भाजपा, चुनाव आयोग भी शांत है लेकिन राहुल गांधी का आरोप खबर न बन जाये इसलिए तुरंत उसे और राहुल गांधी को भी डिसक्रेडिट करने की कोशिश शुरू हो गई। मीडिया में इसका असर चाहे जैसे हो खबर नहीं होती है। जहां तक पावर प्रेजेन्टेशन विदेशी धरती पर बनकर आने का सवाल है, कहने की जरूरत नहीं है कि वसुधैव कुटुम्बकम भी भाजपा और नरेन्द्र मोदी का ही बचाव है और जहां इससे काम चलता है उपयोग नहीं छोड़ा जाता है लेकिन विदेशी धरती पर बना पावर प्रेजेंटेशन खारिज कर दिया जाना चाहिये। यही नहीं, निष्पक्ष और स्वतंत्र लगने और माने जाने वाले पत्रकार भी वोट चोरी पर खबर-चर्चा करने की बजाय विपक्ष की एकजुटता और राहुल गांधी की कार्यशैली या नेतृत्व क्षमता जैसे मुद्दों पर बात करते हैं। मेरा सवाल या मेरी चिन्ता है कि भारत में अगर नरेन्द्र मोदी जैसा (या उनकी टक्कर का) विपक्षी नेता नहीं हो तो क्या उनकी वोट चोरी जायज हो जायेगी या चुनाव से पहले अधिकतम तीन की बजाय पांच को भारत रत्न देकर वोटबैंक का दिल खुश करना जायज हो जायेगा। मुसलमानों के खिलाफ अभियान और बयान क्षम्य हो जायेंगे? पता नहीं।
अखबारों और खबरों में यह दिखाई दे रहा है कि वोट चोरी के आरोप से बचने और राहुल गांधी के इस आरोप को कमजोर करने के लिये भाजपा हर संभव उपाय कर रही है। मीडिया और गोदी वालों का साथ तो है ही। इस क्रम में आज नितिन गडकरी का यह आरोप हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर है कि ई20 विवाद उन्हें बदनाम करने का अभियान है। अखबार में यह खबर अंदर के पन्ने पर विस्तार में है लेकिन भाजपा की यह कहानी दिलचस्प है। आप जानते हैं कि दिल्ली की शराब नीति में परिवर्तन जो उस समय की सरकार का अधिकार और कर्तव्य था – के लिए उस समय की सरकार और मंत्री, मुख्यमंत्री को कितना परेशान किया गया, क्या आरोप लगाये गये। जबकि दिल्ली की शराब नीति से आप के किसी नेता या परिवार या बच्चे को लाभ की कोई खबर नहीं है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की नीति के विरोध को ‘बदनाम करने का अभियान’ कहा जा रहा है और दूसरे अखबारों या दलों के लिए यह मुद्दा भी नहीं है। जिसके लिए है उसे बदनाम करने वाला कहा जा रहा है। यह प्रचार करने की कोशिश भी की जाती है कि गडकरी के खिलाफ सवाल का मकसद मोदी को मजबूत करना है या गडकरी के विकास में रोड़ा अटकाना है। मोदी का विकल्प नहीं उभरने देना है, दोनों के कथित और संभावित भ्रष्टाचार, तानाशाही और समर्थन के बावजूद! मकसद यही है कि मामला भाजपा के हाथ से न निकले, नियंत्रण में रहे। तथ्य यह भी है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाकर नितिन गडकरी के बेटों की कमाई यूं ही नहीं हो गई होगी। इसके बावजूद, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ई-20) नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान, सरकार की ओर से अटॉर्नी जनरल ने कहा कि याचिकाकर्ता के पीछे एक अंतरराष्ट्रीय लॉबी सक्रिय है, याचिका खारिज हो गई।
फिर भी आप मान सकते हैं कि नितिन गडकरी को ‘बदनाम’ किया जा रहा है और अरविन्द केजरीवाल पर पीएमएलए का मुकदमा सही था। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्हें जेल में रखना, जमानत नहीं होना सब सही और सामान्य है। आम आदमी पार्टी के दूसरे नेताओं और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी गिरफ्तार हुए, जेल रहे पर उनकी कमाई भी ऐसी नहीं है जैसी नितिन गडकरी के बेटों की है। इन मामलों में कमाई अगर हुई तो किसके बेटे खा गये पता नहीं चला फिर भी कार्रवाई हुई लेकिन यहां कमाई और मालामाल होना दिख रहा है, बिना आवश्यक अनुसंधान, विचार, नीति बनाने और उसका लाभ जनता को नहीं देने, नुकसान झेलने की मजबूरी थोप देने के बावजूद किसी पर कार्रवाई नहीं हुई। इतना ही पर्याप्त नहीं है। मंदिर बनाने वाले चाहते हैं इसके लिए उनपर आरोप भी नहीं लगाया जाये और जब लगे तो वे इसे बदनाम करने का अभियान कहने की हिमाकत कर सकते है। राहुल गांधी को पप्पू साबित करने में पूरी ताकत लगा दी गई थी फिर भी कुछ नहीं कर पाये यह मुद्दा ही नहीं है। क्योंकि, इन दिनों ऐसे कई प्रचारक सक्रिय हैं जो भाजपा के खिलाफ मुद्दों की चर्चा ही नहीं करते पर परेशान हैं कि राज्यसभा चुनाव में 15 वोट किसके खारिज हुए। जाहिर है कि गुप्त मतदान में इसका पता नहीं चल सकता है लेकिन अटकलें जारी हैं। इस तथ्य के बावजूद कि हार-जीत का अंतर बहुत ज्यादा है और इन वोटों से नतीजों पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा है।
दूसरी ओर, जो चुनाव आयोग आम चुनावों की जानकारी नहीं दे रहा है वह उपराष्ट्रपति चुनाव की जानकारी क्यों कर देगा और उसपर परेशान होने से बेहतर है कि आगे के चुनावों के लिए मतदाता सूची का शुद्धिकरण सुनिश्चित किया जाये। सबको पता है कि पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ने टीएन शेषन ने अगर मतदाता कार्ड जरूरी किये तो उसके बाद भी आधार बनवाया गया। इसमें बायोमेट्रिक्स (उंगलियों, आंखों की पुतलियों) निशान लिये जाते हैं। इसका उद्देश्य विभिन्न व्यक्तियों को एक-दूसरे से अलग करना है ताकि पहचान सुनिश्चित की जा सके। एक व्यक्ति का दो आधार नहीं हो। फिर भी यह सरकारी नियम और व्यवस्था के अनुसार, नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है और सरकारी खर्च पर एक व्यक्ति के दो कार्ड बन रहे हैं। नागरिकों के लिए दोनों जरूरी हैं पर सरकार ने किसी एक का भी पूरा लाभ देना सुनिश्चित नहीं किया है। अभी ऐसी कोई जरूरत या मांग भी नहीं है। चिन्ता अमेरिका से संबंध है। अमेरिका से भारत के संबंध, व्यापार और युद्ध विराम में भूमिका आदि के बारे में जो सब हुआ और उसकी जो खबरें छपीं उसके बाद अब जो छप रहा है वह ऐसे है जैसे कुछ हुआ ही नहीं और सब ठीक हो जायेगा या हो रहा है। इसमें आज अमर उजाला की लीड है, भारत-मॉरीशस पार्टनर नहीं परिवार है। दोनों देश स्थानीय मुद्रा में कारोबार करेंगे। नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, भारत-मॉरीशस में सात समझौते। दि एशियन एज की लीड भी मॉरीशस के साथ सात करार की खबर है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस की लीड अमेरिका से संबंध सुधरने की खबर है। द हिन्दू की लीड नेपाल की खबर है और बताया गया है कि नेपाल में संकट कायम है तथा सुरक्षा और व्यवस्था बहाल करने के लिये राष्ट्रपति ने संयम बरतने की अपील की है। द टेलीग्राफ की लीड बताती है कि नेपाल में नए नेतृत्व की तलाश चल रही है और स्थिति सामान्य करने की कोशिश में हुई वार्ता नाकाम रही।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड और सेकेंड लीड – दोनों दूसरे अखबारों की खबरों से अलग है। लीड ट्रम्प के समर्थक, चार्ली किर्क की हत्या की खबर है और यह इसलिये महत्वपूर्ण है कि वे हथियार रखने के अधिकार के समर्थक थे और इसी पर बोलते समय मारे गये। उसके विस्तार में जाने से पहले बता दूं कि टीओआई की सेकेंड लीड सुप्रीम कोर्ट की खबर है। शीर्षक है, सरकार की कोई शाखा अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहे तो हमें आना पड़ता है। मुझे लगता है कि यह संविधान पर गर्व है की मुख्य न्यायाधीश की उक्ति का स्पष्टीकरण भी है। इस लिहाज से यह खबर जितनी महत्वपूर्ण है उतनी प्रमुखता इसे आज नहीं मिली है। आइये, अब यह भी बता दूं कि चार्ली किर्क की खबर क्यों महत्वपूर्ण है। 31 साल के चार्ली किर्क एक कंजर्वेटिव राजनीतिक थे जो टर्निंग पॉइंट यूएसए के सह‑संस्थापक थे। यह एक अमेरिकी एनजीओ है जिसका मकसद मुनाफा कमाना नहीं है। यह हाईस्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी कैम्पस में कनजर्वेटिव पॉलिटिक्स के प्रचार-प्रसार के लिए काम करता है। चार्ली किर्क अपने इस मूल काम के साथ ट्विटर/रेडियो और मीडिया के लिए भी सक्रिय थे तथा जानी-मानी हस्ती थे। वे डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाते थे और रिपब्लिकन / मागा ‑(मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) धारा के समर्थक थे। इससे लगता है कि ट्रम्प जैसों के सत्ता में रहने के बाद देश को फिर महान बनाने के लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता होती है। चार्ली किर्क हथियार रखने के अधिकार के समर्थक थे और इस पर नियंत्रण की सख्ती का विरोध करते थे। 10 सितंबर 2025 को किर्क ऊटा वैली यूनिवर्सिटी में अपने विचार रख रहे थे और यह “प्रूव मी रांग” (मुझे गलत साबित कीजिये) नामक सार्वजनिक कार्यक्रम का हिस्सा था। करीब 3000 लोगों की मौजूदगी थी। कार्यक्रम के दौरान किर्क पूछे गये एक सवाल का जवाब दे रहे थे। यह “गन वायलेंस” के बारे में था। तभी किर्क की गर्दन में अचानक गोली लगी और उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्होंने दम तोड़ दिया। हत्या की जगह से एक शक्तिशाली राइफल बरामद किया गया, जिसे एक पास के पेड-पौधे वाले क्षेत्र में तौलिये में छुपा कर रखा गया था। हत्यारे का अभी पता नहीं चला है।
किर्क अक्सर कहा करते थे कि अमेरिका को गन कंट्रोल नहीं बल्कि गन राइट्स (हथियार रखने के अधिकार) की रक्षा करनी चाहिए। वे कहते थे कि गन से होने वाली कुछ मौतें “हथियारे रखने के अधिकार” की कीमत हैं, और यह कीमत स्वीकार्य होनी चाहिए ताकि अन्य स्वाभाविक स्वतंत्रताएँ सुरक्षित रहें। संयोग से वे खुद भी इसी में खर्च हो गये। उनका कहना था कि स्कूलों में सशस्त्र सुरक्षाकर्मी होना चाहिए, गन कंट्रोल उपायों की बजाय सुरक्षा उपायों और आत्म‑रक्षा की स्वतंत्रता अधिक महत्व रखती है। भारत में फिलहाल मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता ज्यादा जरूरी है। सरकारी बाबा के कारनामों की खबर भले कुछ ही अखबारों में छपती है। कारनामों की खबर आती रहती है। आज इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के अनुसार, बाबा रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण को उत्तराखंड पर्यटन की शो-पीस परियोजना मिली। इसके लिए तीन फर्मों ने बोलियां लगाई थीं। सब बालकृष्ण नियंत्रित हैं। यह सब तब है जब कांग्रेस के भ्रष्टाचार की कहानियां सुनाने के बाद ईमानदारी स्थापित करने के कई उपायों का प्रचार किया गया था। इसलिए आप मानें या न मानें सब ठीक है। सरकार ने कहा है कि असामान्य नहीं है…. प्रक्रिया का पालन हुआ है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


