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इलायची का इतिहास!

संजय श्रीवास्तव-

फ्ते एक दो बार घर में चाय बनाने की जिम्मेदारी मेरी होती है. तब मैं कुर्ग और कोडाईकनाल से लाई इलायची की चार फलियां निकालता हूं. उसे छीलता हूं. उसके छोटे-छोटे जादुई दानों को छोटे इमामदस्ते में डालकर कूटता हूं, तब तक जबतक कि वो पाउडर नहीं बन जाता. गर्म होते पानी में डालकर उसे उबालता हूं. फिर चाय के दानों को डालकर इसमें दूध मिलाता हूं. यकीन मानिए ये बेहतरीन चाय होती है. हर चुस्की में एक आनंद.

चाय में जादुई स्वाद देती है. किसी भी स्वादिष्ट व्यंजन को आनंद से भर देती है. हलवा से लेकर मीट और चिकन में खास लिज्जत. हरे छिलके के अंदर जायकेदार दानों की बारात लिए छिटुकी सी ये इलायची स्वाद के इतने संसार रचाती-बसाती है कि मीठे से लेकर नमकीन तक के हर तरह के व्यंजनों को एक खास पुट देती है. स्वाद में एक जादू सा भर देती है. पहले मैं कुर्ग से भी करीब आधा किलो इलायची लेकर लौटा. अबकी बार कोडाईकनाल से 250 ग्राम का पैकेट. वहीं पता चला कि हरे छिलकों वाली स्वास्थ्य में भरी-पूरी इलायची ही श्रेष्ठ मिलती है.

बाकि तो हम लोग बाजार में सूखी, पीलेपन ली हुई और कमजोर दबी हुई इलायची को खरीद लेते हैं. वैसे ये मसालों की रानी है. दुनियाभर में सबसे बेहतरीन क्वालिटी वाली इलायची इसी नीलगिरी के अंचल पलती और पैदा होती है.

कुर्ग के एक कॉफी एस्टेट में कॉफी के पौधों के बीच सबसे पहले मैंने इलायची के पौधे को देखा. फर्न की तरह का पौधा. भाले की जो शूल होती है, बिल्कुल वैसी ही पतली और लंबी इसकी पत्तियां..लेकिन इलायची की खासियत ये होती हैं कि वो अपने पौधे के निचले तने से गुच्छे के तौर पर फलती-फूलती-खिलती और फैलती है. अभी जब कोडाईकनाल गया तो प्रचुरता के साथ इसके पौधों को देखा. कोडाईकनाल चाय और इलायची से भरे हरे-भरे बागानों से भरा हुआ है. यूं तो नीलगिरी पहाड़ों की पूरी श्रृंखला के साथ फैली उपजाऊ और नम मिट्टी ही प्रचुरता के साथ इसको पैदा करती है.

ये एक देशी पौधा है जो मुख्य रूप से केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में पश्चिमी घाट के नम सदाबहार जंगलों में उगता है. बाहर से हरा छिलका और अंदर काले रंग के स्वाद के छोटे-छोटे बम. इलायची की खेती पारंपरिक तरीके से होने से पहले, यह पश्चिमी घाट के हरे-भरे जंगलों के बीच एक जंगली फसल थी. 19वीं सदी में इलायची की बढ़ती लोकप्रियता और बढ़ते व्यापार के कारण, त्रावणकोर साम्राज्य ने इसकी रोकने के लिए खेती के क्षेत्रों और राज्य की सीमाओं पर अपनी सेना तैनात कर दी थी.

छोटी इलायची का पौधा हरा तथा पाँच फुट से दस फुट तक ऊँचा होता है. इसके पत्ते बर्छे की आकृति के तथा दो फुट तक लंबे होते हैं. यह बीज और जड़ दोनों से उगता है. तीन चार वर्ष में फसल तैयार होती है. इसके फल गुच्छों के रूप में होते हैं. इसे तोड़कर जब सुखाया जाता है तो ये इस अवस्था में आ जाती है, जिससे हम सभी परिचित हैं.

इलायची का अपना एक साइंस है. इसकी कटाई के लिए पारंगत लोगों की जरूरत होती है. जैसे-जैसे इलायची के फल पकते हैं, कटाई कुछ महीनों तक चलती है. अनुभवी हाथ जब इन फलियों को तोड़ते हैं तो उनका रंग गहरा हरा हो जाता है. अगर उन्हें पहले या बाद में तोड़ा जाता है, तो फली किसी काम की नहीं रह जाती.

इलायची के एक पौधे का जीवकाल 10 से लेकर 12 वर्ष तक का होता है. वैसे कहीं-कहीं ये 30 साल तक भी चल जाता है. समुद्र की हवा और छायादार भूमि इसके लिए आवश्यक है, इसके बीज छोटे और कोनेदार होते हैं. इसे नमी भी पसंद आती है और ठंडा तापमान भी.

स्वास्थ्य के लिहाज से बहु उपयोगी. दवाओं में खास उपयोग. प्राचीन और सभ्यताओं से जुड़ी हुई. इसकी मौजूदगी का उल्लेख 4000 साल पहले के ग्रंथों में हुआ है यानी ये हजारों साल से हमारे जीवन के साथ यात्रा कर रही है. डेढ हजार साल पहले प्राचीन मिस्र में इसका उपयोग चिकित्सा, अनुष्ठानों और शव लेपन में होता था. वहां के लोग दांत साफ करने और सांसों में ताजगी भरने के लिए इसका खूब इस्तेमाल करते . ये दो तरह की होती है- हरी या छोटी इलायची तथा बड़ी इलायची. बड़ी इलायची व्यंजनों को लजीज बनाने के लिए एक मसाले के रूप में प्रयुक्त होती है, तो हरी इलायची खुशबू या माउथ फ्रेशनर का काम करती है. संस्कृत में इसे एला कहा जाता है।

तृतीय संहिता जैसी प्राचीन किताब में इसका उल्लेख है. भारतीय पुराणों और वेदों में उल्लेख है. हम भारतीय हजारों सालों से अपने पूजा अनुष्ठानों, चिकित्सा पद्धतियों में इसका इस्तेमाल करते रहे है. ग्रीक में 176 ईसवीं के दस्तावेजों में इसका उल्लेख भारतीय मसाले के रूप में हुआ है. दरअसल भारत 2000 बरसों से कहीं ज्यादा समय से विदेशों से इसका व्यापार करता रहा था.

इलायची की खेती लातीनी अमेरिका के ग्वाटेमाला, भारत, श्रीलंका, इंडोनेशिया और मलेशिया में बहुतायत से होती है. ग्रीक और रोमन इसका इस्तेमाल परफ्यूम्स, लेप और सुगंधित तेलों को बनाने में करते थे. वो मेहमानों के सामने इसे परोसना सम्मान की बात समझते थे. स्कैंडनेवियाई देशों यानि स्वीडन, स्विटजरलैंड, नार्वे और फिनलैंड में इसका उपयोग क्रिसमस के दौरान बेहतरीन वाइन और पेस्ट्री बनाने में होता है.

लेकिन नीलगिरी पहाड़ों के इस इलाकों में भी जलवायु परिवर्तन असर दिखा रहा है. गर्मी बढ़ रही है. लिहाजा इलायची वहां उगाना अब मुश्किल होता जाएगा. लिहाजा कुर्ग के कई किसान इलायची छोड़कर अब कॉफी की खेती पर ध्यान लगा रहे हैं.

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