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आज के अखबार : इन खबरों से समझिए हिन्दुत्व की राजनीति के भयंकर लाभ और देश की दशा-दिशा

संजय कुमार सिंह

इंडिगो एयरलाइंस की खबर जितना बताती है उससे ज्यादा छिपाती है। भारत जैसे देश में जहां बेरोजगारों की भरमार और सरकार न जाने कब से स्किल इंडिया चला रही है एक अच्छी खासी विमान सेवा कर्मचारियों की कमी के कारण संकट में है। यह संकट एक दिन में तो खड़ा नहीं हुआ होगा लेकिन खबर अचानक आई और यह नहीं बता रही है कि ऐसा कर्मचारियों के किसी आंदोलन, विरोध या मांग के कारण है। आम यात्री परेशान हैं उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि देश की इसी व्यवस्था में इससे पहले नरेश गोयल की जेट एयरवेज बंद हो चुकी है। विजय माल्या की किंगफिशर का बुरा हाल है। सरकारी इंडियन एयरलाइंस बिक चुकी है और तमाम शिकायतों के बावजूद किंगफिशर चल रही है या खबरों में नहीं है। कुल मिलाकर यह देश में व्यवसाय या व्यवसायियों की स्थिति भी है। इसमें आम आदमी का जो हाल है वह अपनी जगह है लेकिन इस मामले में मैं उसे रहने देता हूं। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, ऑफ-गार्ड इंडिगो ग्राउंड्स इंडिया (अचेत इंडिगो, देशभर की उड़ानें ठप)। हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, “इंडिगो ने राहत मांगी, यात्रियों की मुश्किलें बरकरार”। इससे समझ में आता है कि अगर सारी गलती इंडिगो की ही हो तो उसे कहीं से कोई मदद नहीं मिल पा रही है और यात्री परेशान हैं।

आम आदमी का हाल बताने वाली खबर दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हनी बाबू को पांच साल आठ महीने (एक सप्ताह से कुछ ज्यादा कम) बाद जमानत मिलने की है। द हिन्दू के शीर्षक में ही लिखा है ट्रायल से पहले की जेल के बाद। यह गिरफ्तारी भीमा कोरगांव मामले में थी और उन्हें जमानत मिलने में इतना समय लगा जबकि इस मामले में 8 अक्तूबर 2020 को गिरफ्तार, 83 साल के स्टेनस्वामी को सिपर के लिए परेशान किया गया था और यह खबर खूब चर्चित हुई थी। बिना जमानत, 5 जुलाई 2021 को जेल में ही उनका निधन हो गया था। 2022 में अमेरिका स्थित एक अन्तरराष्ट्रीय डिजिटल फोरेंसिक फर्म आरसेनल कंसलटिंग ने दावा किया कि उनके कंप्यूटर में जो “अपराध से जुड़ी फाइलें” पायी गयीं — वे उनकी नहीं थीं बल्कि किसी हैकर ने मालवेयर के माध्यम से प्लांट की थीं (हैकर से करवाई गई थीं, कहना चाहिए)। फोरेंसिक विश्लेषण में पाया गया कि हैकर ने सालों तक (2014 से 2019 तक) स्टेन स्वामी के कंप्यूटर को नियंत्रित किया, फाइलें डालीं, और अंत में — पुलिस द्वारा जब कंप्यूटर कब्जे में लिया जाने वाला था तब एक “एंटी फोरेनसिक क्लीनअप” किया गया था यानी फाइलों की तकनीकी आभासी जानकारी मिटाने की कोशिश की गई थी। साफ संकेत हैं कि ये वही हैकर थे जिन्होंने अन्य आरोपी के कंप्यूटर/लैपटॉप में भी फर्जी दस्तावेज डाले थे। इनमें रोना विलसन और सुरेन्द्र गैडलिंग शामिल हैं। “मौत के कारण” स्टेन स्वामी का मामला भले ही कानूनी रूप से “अबेट” (शांत या समाप्त) हो चुका हो, लेकिन उनकी “दोष-प्रत्यारोपित” छवि अभी तक हटाई नहीं गयी है। उनके परिवार / वकील, शुभचिन्तक  निश्चित रूप से चाहेंगे कि इस छवि को ठीक किया जाए पर अभी वह मुद्दा नहीं है।

इस सरकार में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीएन साईबाबा भी लंबे समय तक जेल में रहे जबकि बचपन में हुई पोलियो की बीमारी के कारण वे लगभग 90% विकलांग थे और व्हीलचेयर पर चलते थे। उन्हें 2014 में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। सरकार ने उन पर “साज़िश” और “आतंकवाद” (या “माओवादी कनेक्शन”) के आरोप लगाए थे। जीएन साईबाबा का निधन 12 अक्टूबर 2024 को हुआ। अब जब हनी बाबू को जमानत मिल गई है तो पुराने मामलों के आधार पर कहा जा सकता है कि उन्हें जबरन नहीं भी फंसाया गया हो तो उनके खिलाफ आरोपों में दम नहीं है। सबूत प्लांट करने का मामला है ही। पांच साल से ज्यादा मुफ्त में जेल में रहना पड़ा लेकिन किसी के खिलाफ किसी कार्रवाई की खबर नहीं है क्योंकि अदालत ने स्पष्ट किया है कि जमानत मतलब “निर्दोष” होना नहीं है। अभी यह तय होना बाकी है कि आरोप सही हैं या नहीं। ये सारी गिरफ्तारियां भीमा कोरेगांव मामले से संबंद्ध हैं और पुलिस की कहानी के अनुसार, 1 जनवरी 2018 को कोरेगांव की लड़ाई की 200वीं सालगिरह समारोह के दौरान हिंसा भड़की थी। उस दिन दलित समुदाय के लोग (खासकर मांहर — जिन्हें इतिहास में पीड़ित माना जाता है) युद्ध स्मारक (विजय स्तंभ) पर जाकर इतिहास को याद करना चाहते थे। लेकिन कथित रूप से एक अन्य समूह ने उन पर हमला कर दिया। पत्थरबाज़ी, तोड़फोड़, आगजनी हुई — एक युवक की मौत हुई, कई घायल हुए। पुलिस के अनुसार, 31 दिसंबर 2017 को हुई सभा, एलगार परिषद में कुछ “भड़काऊ” और “उकसाने वाले” वादों और भाषणों ने इस हिंसा को भड़काया था। पुलिस का आरोप था कि यह सभा और हिंसा एक योजनाबद्ध “माओवादी साजिश” का हिस्सा थी। इसके बाद 2018 तथा उसके बाद कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, वकीलों, बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को माओवाद से जुड़ने और हिंसा भड़काने जैसे आरोपों में गिरफ्तार किया गया। इसके बाद देश में भाजपा की सरकारों ने माओवाद के खिलाफ भयंकर अभियान चलाया। साउथ एशिया टेरोरिज्म पोर्टल के अनुसार 2018 की माओवादी/नक्सली हिंसा में कुल 412 मौतें हुई थीं। इनमें 108 नागरिक, सुरक्षा बल के 73 और 231 नक्सली/माओवादी शामिल थे।

इसके बाद के आंकड़े इस प्रकार हैं

2019: कुल 302 मौतें (99 नागरिक, 49 सुरक्षाबल, 154 नक्सली)

2020: कुल 239 मौतें (61 नागरिक, 44 सुरक्षाबल, 134 नक्सली)

2021: कुल 237 मौतें (58 नागरिक, 51 सुरक्षाबल, 128 नक्सली)

2022: कुल 134 मौतें (53 नागरिक, 15 सुरक्षाबल, 67 नक्सली)

2023: कुल 149 मौतें (61 नागरिक, 31 सुरक्षाबल, 57 नक्सली)

2024 और 2025 के लिए एसएटीपी की अंतिम वार्षिक रिपोर्ट अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन समाचारों के अनुसार 2024–25 में नक्सलियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ों की संख्या बढ़ी है। तथ्य यह है कि 2018 के बाद माओवाद-विरोधी अभियान में रोज़मर्रा की हिंसा और जान-हानियों की संख्या घट रही रही, लेकिन यह समाप्त नहीं हुई। आतंकवाद के मामले में भी स्थिति ऐसी ही है। सरकार ने खत्म होने का दावा किया लेकिन वारदातें होती रही हैं। अभी वह मुद्दा नहीं है। मामला आम जानता और सुरक्षाकर्मियों की जान, सुरक्षा और स्वतंत्रता का है। उसका पता हनी बाबू को जमानत मिलने से चला और उसके साथ ये सारे मामले जुड़े हुए हैं। आज हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड के अनुसार, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साई ने कहा है कि माओवाद खत्म करने के लिए तय अंतिम समय, 31 मार्च 2026 से पहले माओवाद को खत्म किया जा सकता है।

आज की तीसरी बड़ी खबर एसआईआर पर है। द हिन्दू में यह खबर लीड है। जो खबरें छपी हैं उसके अनुसार, एसआईआर में लगे बीएलओ की समस्याएं अब दूर होंगी। सुप्रीम कोर्ट ने जरूरी निर्देश जारी किए हैं। जनसत्ता की खबर के अनुसार, सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने संबंधित राज्यों को एसआईआर ड्यूटी के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति के आदेश दिए हैं ताकि एसआईआर में लगे व्यक्तियों के काम के घंटे कम किए जा सकें। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इसके अलावा, यदि वे विशिष्ट कारणों का हवाला देते हुए काम से छूट चाहते हैं, तो इस पर मामले के आधार पर विचार किया जाना चाहिए। राज्य को अतिरिक्त कर्मचारी तैनात करने चाहिए ताकि काम के घंटे कम किए जा सकें। जहां भी किसी व्यक्ति के पास छूट मांगने के लिए कोई विशिष्ट कारण हो, राज्य सरकार ऐसे अनुरोधों पर विचार करेगी और ऐसे व्यक्ति के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करेगी। यदि कार्यबल बढ़ाने की आवश्यकता हो, तो राज्य कार्यबल उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है। यदि किसी अन्य प्रकार से राहत नहीं मिलती है तो पीड़ित व्यक्ति न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। अभी तक की खबरों से मैं समझ रहा था कि मामला एसआईआर की संवैधानिक और कानूनी वैधता का है, जल्दबाजी में कराने की जरूरत और फिर बीएलओ पर दबाव के कारण उनकी आत्महत्या आदि के कारण इसे स्थगति करने तथा कुछ राज्यों में कर्मचारियों की उपलब्धता के कारण भी इसे टालने की मांग की गई थी। आज की खबर जैसे छपी है उससे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को सहयोग करने के लिए कहा है, कर्मचारियों के मामले में तो आदेश है ही। इस तरह अब लग रहा है कि एसआईआर से कोई दिक्कत नहीं है जो दिक्कत है या थी वह राज्य सरकारों के असहयोग के कारण थी। कहने की जरूरत नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश याचिका की मांग और कानूनी स्थिति के मद्देनजर होगा लेकिन जो आदेश है वह बिहार में एसआईआर से भाजपा को फायदा होने, मतदाता सूची के शुद्धिकरण का मामला नहीं निपटने और इस कारण देश भर में कराने की जरूरत, व्यवस्था और उसके लाभ आदि के मुद्दों तथा संबंधित सवालों को खत्म कर सकता है। द हिन्दू का शीर्षक है कि राज्य सरकार परेशान बीएलओ की जगह दूसरे लोगों को लगाए।

अमेरिका ने 2025 में 3258 लोगों को डिपोर्ट किया। कहने की जरूरत नहीं है कि ये लोग अवैध रूप से गए थे तभी डिपोर्ट किए गए हैं। बेड़ियों में सेना के मालवाहक विमान से भेजे गए यह तो पुरानी खबर है तथ्य यह है कि ऐसे लोग भिन्न एजेंट और दलालों के जरिए जाते हैं और जाहिर है कि यहां स्थितियां ठीक होतीं तो ऐसे क्यों जाते हैं। दलाल भी नियंत्रत होते तो शायद कुछ लोग नहीं जा पाते। इस खबर के साथ विदेश मंत्री के हवाले से बताया गया है कि भारत ने अमेरिका से कहा है कि डिपोर्ट किए जाने वाले लोगों के साथ खराब व्यवहार नहीं किया जाए। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे लगता है कि अवैध ढंग से विदेश गए लोगों की संख्या इतनी ज्यादा है (चाहे किसी पैमाने से) कि सरकार उन्हें अपनी ओर से लाने की व्यवस्था नहीं कर रही है। अगर लोग अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे हैं, अमेरिका उन्हें वापस भेज रहा है तो भारत को अपने नागरिकों का काम आसान करना चाहिए, उनके सम्मान का ख्याल रखा जाना चाहिए। पर स्थिति यह है स्वेच्छा से पैसे खर्च करके जोखिम लेकर अमेरिका जाने वालों को अमेरिका डिपोर्ट कर रहा है, हम स्वीकार कर रहे हैं। भारत ने एक ऐसी महिला को बांग्लादेश भेज दिया है जो गर्भवती है और सुप्रीम कोर्ट ने उसे वापस लाने का आदेश दिया है। सरकार ने मानवीय आधार पर (खबरों के अनुसार) उसे वापस लाना स्वीकार किया है। देश के आम लोगों में कितने ऐसे होंगे जो अपने लिए सुप्रीम कोर्ट से ऐसा आदेश करवा सकेंगे? भारत सरकार अपने नागरिकों के लिए क्या कर रही है? नागरिकों के लिए सरकार का काम तो छोड़िए – नागरिक, नागरिक के लिए क्या कर रहा है। एक खबर के अनुसार दिल्ली के दंपत्ति ने कार दुर्घटना के बाद किसी सहायता के अभाव में दम तोड़ दिया। अनुमान है कि दुर्घटना के बाद वे आठ घंटे जिन्दा रहे होंगे और सड़क से गुजरने वाले सैकड़ों लोगों में किसी ने उनकी सहायता तो नहीं ही की, पुलिस या अधिकारियों को सूचना भी नहीं दी। नागरिक के रूप में हम ऐसे हैं या हो गए हैं। आप चाहें तो मान लीजिए कि सब ऐसे नहीं हैं, कुछ ही लोग होंगे। लेकिन मदद या मौत के लिए आठ घंटे का इंतजार बहुत होता है। 

खबर यह भी है विजय माल्या ने 2018 के भगोड़ा आर्थिक अपराधी अधिनियम को चुनौती दी है। अदालत ने कहा है कि पहले वे भारत आएं तो उनकी अपील सुनी जाएगी। कानूनी मामलों की समझ मुझे नहीं है लेकिन मैं जानता हूं कि भगोड़े आर्थिक अपराधियों में कइयों को वापस नहीं लाया जा सका है और तमाम मामलों में सजा नहीं हुई है। विजय माल्या अच्छा खासा व्यवसाय चलाते थे उनका भारत आना, उनकी शर्तें अगर कोई हैं तो नहीं सुने जाने से नुकसान किसका हो रहा है और जो नहीं आ रहें हैं उन्हें लाने में कामयाबी नहीं मिल रही है और अगर वे भी इसी कानून के कारण नहीं आ रहे हैं तो सात साल गुजर गए। कार्रवाई कब होगी, कौन करेगा, कैसे होगी? जो विदेश में है उसे लाने के लिए कैसे क्या दबाव डाले जा सकते हैं उसपर भी विचार हुआ या नहीं, पता नहीं। खबर तो यह है कि एक भगोड़े, मेहुल चोकसी को वापस लाने के लिए विमान भेजने का ड्रामा हुआ पर डिलीवरी क्या हुई अभी तक बताया नहीं गया है। बताया नहीं जाता है सो अलग मामला है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक शपथ पत्र में जानकारी दी गई है कि अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के परिवार के स्वामित्व वाली चार फर्मों को तवांग में 146 सरकारी ठेके मिले। ये 383.74 करोड़ रुपए के हैं और 2012 से 2023 के बीच दिए गए हैं। इनमें से 59 ठेके सीधे कार्य आदेश के जरिए दे दिए गए और इनके लिए कोई निविदा आमंत्रित नहीं की गई थी। 2020 में तय किया गया था कि 50 लाख से ज्यादा के ठेके बिना टेंडर नहीं दिए जाएंगे लेकिन 59 में से कम से कम 11 ठेके 50 लाख से ज्यादा के थे। राज्य में भाजपा की सरकार है। 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 60 सदस्यीय सदन में 46 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया था। इसके बाद पेमा खांडू को तीसरी बार राज्य का मुख्यमंत्री चुना गया था। केरल से खबर है कि विधायक को बलात्कार के मामले में जमानत नहीं मिली। कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया। फिर भी कांग्रेस के खिलाफ हिन्दू विरोधी होने से लेकर भ्रष्ट होने का आरोप लगाया जाता रहा है और जो आरोप लगाते रहे हैं उनकी कहानी अब सार्वजनिक है लेकिन चर्चा नहीं होती जैसे अब डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरने पर कोई समस्या नहीं है। पेट्रोल की कीमत बढ़ने से तो नहीं ही है। दलितों के खिलाफ मामले तो मुद्दा ही नहीं है। मुद्दा पुतिन का दौरा है जो मेरे नौ में से सात अखबारों अमर उजाला, नवोदय टाइम्स, देशबन्धु, इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और दि एशियन एज में लीड है। दो ही अखबार अपवाद हैं – द टेलीग्राफ और द हिन्दू।   

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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