नई दिल्ली। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर “Buffoonery, smear campaign: Puri hits out at Rahul’s Epstein remark” की हेडलाइन और प्रस्तुति को लेकर मीडिया पर्यवेक्षकों के बीच सवाल उठने लगे हैं। खबर में केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के बयान को प्रमुखता से रखते हुए राहुल गांधी की टिप्पणी को सीधे “बफूनरी” और “स्मियर कैंपेन” जैसे शब्दों के फ्रेम में पेश किया गया है।
खास बात यह है कि पूरी खबर का फोकस राहुल गांधी के सवाल या संदर्भ की पड़ताल करने के बजाय, पुरी के खंडन और प्रतिक्रिया को नैरेटिव की धुरी बनाता है। हेडलाइन से लेकर शुरुआती पैराग्राफ तक खबर का टोन ऐसा है, जिसमें आरोप की जांच से ज्यादा मंत्री के बचाव और विपक्ष के बयान को डिस्क्रेडिट करने की भाषा हावी दिखती है।
इससे यह बहस तेज हो गई है कि क्या इंडियन एक्सप्रेस जैसी प्रतिष्ठित संस्था इस मामले में न्यूज़ रिपोर्टिंग से ज्यादा “डिफेंसिव फ्रेमिंग” अपना रही है, जहां सत्ता पक्ष का स्टैंड तथ्यात्मक जांच से पहले ही निर्णायक रूप में स्थापित कर दिया गया है।
दयाशंकर मिश्रा-
इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक को ध्यान से देखिए. हरदीप पुरी का बचाव अख़बार और NDTV की अगुवाई में चैनल एक ही तरह से कर रहे हैं।
हरदीप पुरी के आरोप ‘स्वीकार’ कर लेने की हेडलाइन बना रहे संपादक के दिमाग़ में राहुल गांधी को ही घेरने की राजनीति ही चल रही है।

यह मीडिया में राहुल गांधी के ख़िलाफ़ तय की गई लाइन की एक झलक भर है। भारत का मीडिया IT सेल का एक्सटेंशन है। इसका उद्देश्य प्रधानमंत्री मोदी की जय -जयकार और राहुल गांधी के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार है। संघ ‘दीक्षित’ मीडिया अपने विवेक को पूरी तरह खो चुका है।
नवंबर 2023, कोई प्राचीन तारीख़ नहीं है। ‘राहुल गांधी’ पर किताब की घोषणा करते ही देश की सबसे बड़ी मीडिया कम्पनी मेरे ख़िलाफ़ दुष्प्रचार को अपना सबसे बड़ी ‘कार’सेवा मान लेती है। अख़बारों,चैनलों और वेबसाइटों की भारी मौजूदगी वाले नोएडा में एक मीडिया संस्थान किताब के बारे में, पत्रकार के व्यवहार के बारे में लिखने का साहस नहीं कर सका। अख़बारों के पत्रकार तो बक़ायदा IT सेल का हिस्सा हो गए।
मीडिया में समीक्षकों की भारी मौजूदगी का क्या कहना। सब अतीत की समीक्षा में आनंद ले रहे हैं; जो छाप जाए, उतना लिखकर ही समीक्षक बने रहने में जीवन सार्थक है।
लिट्रेचर फ़ेस्टिवल में घूम आइए। इमरजेंसी, जेपी, लोहिया पर जितनी चाहे क़लम घिसवा लीजिए। संघ, मनुस्मृति पर मौन रहेंगे। संस्कृति पर मुखर रहेंगे। हिंदी में साहित्यकारों लेखकों का इन दिनों यही काम है। अब लेखकों, संस्कृतिकर्मियों की यही परिभाषा है; ‘अपना लेखन, मकान, दुकान और EMI की चिंता कीजिए; राहुल गांधी पर मत बोलिए।’
राहुल गांधी पर लिखना ख़तरनाक होना ही, राहुल गांधी की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
मीडिया से दूर हुए बिना, भारत की जनता अपनी उस लोकतंत्र को प्राप्त नहीं कर सकती; जिसकी तरफ़ 15 अगस्त 1947 को सदियों की ग़ुलामी के बाद भारत ने पहला क़दम बढ़ाया था।
आज की ‘लड़ाई’ पहले की लड़ाई से किसी भी अर्थ में कम ख़तरनाक नहीं है। यह बात और है ; जब हमारी लड़ने की बारी आई, हम अतीत की खिड़की खोलकर उसकी कहानियां सुनाने लग गए।


