संजय कुमार सिंह
बंगाल चुनाव – ‘हाथी चले बाजार कुत्ते भूंके हजार’ के अंदाज में मदमस्त चल रहा है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार चुनाव से पहले शराब पर 198 घंटे का बंद पहली बार लगाया गया है और राज्य के बार, क्लब आदि त्यौहार के समय होने वाले नुकसान की सोचकर परेशान हैं। यह दिलचस्प है कि चुनाव से पहले भाजपा की सरकार होने पर मांसाहार पर प्रतिबंध की आशंका जताई गई, भाजपा ने अपने अंदाज में इसका विरोध किया लेकिन शराब बंदी 10 दिन पहले ही लागू कर दी गई। दिलचस्प यह है कि आदेश में 24 अप्रैल का जिक्र नहीं है और 25 अप्रैल को शाम छह बजे के बाद लागू होगा। जो भी हो, पश्चिम बंगाल में केंद्र सरकार के नारी शक्ति वंदन और ममता हराओ अभियान में चुनाव आयोग के सहयोग की खबर इंडियन एक्सप्रेस में भी है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, मतदाताओं के नाम हटाने के लिए चुनाव आयोग तर्कसंगत विसंगतियों का उल्लेख करता है। अखबार ने बताया है कि कैसे यह तर्कों के खिलाफ है। वैसे बंगाल में चुनाव के नाम पर जो हो रहा है वह भी अब दिलचस्प लग रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अलावा द टेलीग्राफ और दि एशियन एज की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से पूछेगा कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर ट्रिब्यूनल काम कर रहे हैं या नहीं। द हिन्दू में यह खबर पांच कॉलम में है और शीर्षक के अनुसार सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट से इस मामले में रिपोर्ट मांगेगा। एक और खबर है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के सिलसिले में मोटर साइकिल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। यह प्रतिबंध मतदान से दो दिन पहले से शुरू होगा और शाम छह बजे से सुबह छह बजे तक लागू रहेगा। दिलचस्प यह है कि सुबह छह बजे से शाम छह बजे तक जब मोटर साइकिल चलाने की इजाजत रहेगी तब भी पीछे कोई सवारी नहीं बैठाई जा सकेगी। आपात स्थितियों में छूट रहेगी लेकिन ऐसे मौकों पर आपात स्थिति निर्धारित और घोषित नहीं रहे तो इसका उपयोग लोगों को परेशान करने के लिए किया जाता है।

यह दिलचस्प है कि पश्चिम बंगाल में केंद्रीय सुरक्षा बलों की भारी उपस्थिति के बावजूद इस तरह के प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं और आम दिनों के अपराध के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहराया जा रहा है या भाजपा इसे ठीक करने के सपने दिखा रही है। इसके अलावा, आज जो खबरें हैं उनमें चुनाव आयोग से मोदी की शिकायत और बंगाल में सब कुछ बेहाल का मोदी का आरोप है। हालांकि यह सब लीड नहीं है। लीड जैसी देसी खबर अमर उजाला में है। मुझे लगता है कि आज इन खबरों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली खबर अमर उजाला की लीड है। हालांकि, नवोदय टाइम्स की खबर, प्रीत विहार में पार्किंग विवाद के बीच खूनी खेल कम चिन्ताजनक नहीं है। वैसे सड़क दुर्घटना में मौत के मामले भी कम नहीं हो रहे हैं और लगातार परेशान करते हैं। ऊधमपुर के एक हादसे में बस के खड्ड में गिरने से 21 लोगों की मौत की खबर है। शीर्षक है, वादी तय नहीं कर सकता, अदालत कैसे चले…. कौन जज सुनवाई करे। अखबार ने लिखा है, केजरीवाल मामले से जस्टिस स्वर्णकांता का हटने से इनकार, और यह भी कि पूर्व सीएम केजरीवाल के आरोप यूं किए खारिज। यह खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। शीर्षक है, आबकारी मामले में जज ने केजरीवाल के रिक्यूजल अपील को खारिज किया।
द हिन्दू में यह तीन कॉलम की खबर है। इसका शीर्षक है, दिल्ली हाईकोर्ट की जज ने आबकारी मामले से अलग होने से इनकार किया। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, आबकारी नीति मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल की अपील खारिज की और कहा, नहीं छोड़ूंगी उन्होंने यह भी कहा है, आरोपी या वादी तय नहीं कर सकते हैं कि जजों के बच्चों को कैसे रहना है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी यह खबर सेकेंड लीड है। आज इस खबर के शीर्षक दो तरह से हैं हालांकि कुछ अखबारों ने दोनों को शीर्षक बना दिया है। पहली बात कि उन्होंने रिक्लूज करने से मना किया, नहीं करूंगी आदि शीर्षक तो ठीक है उनका मामला है, विशेषाधिकार है। लेकिन यह कहना कि आरोपी या वादी तय नहीं कर सकते हैं कि जजों के बच्चों को कैसे रहना है, मुझे गैर जरूरी लगता है। कानूनन कहा गया है, जरूरी होगा – यह सब अलग मुद्दा है। शीर्षक में जरूरी नहीं है। जाहिर है, शीर्षक बनाकर इसे सनसनी फैलाने की कोशिश की गई होगी लेकिन मामला ऐसा है नहीं। केजरीवाल या किसी अन्य ने भी ऐसी कोई मांग नहीं की, ना ही कोई ऐसी सलाह दे रहा है और न मानता-जानता है कि ऐसा संभव है। हालांकि सॉलिसीटर जनरल ने जो कहा है वह जरूर आपत्तिजनक है। खासकर केजरीवाल के इस तर्क के बाद कि न्यायमूर्ति के बच्चे जब सॉलीसिटर जनरल के मातहत काम कर रहे हैं और वही सीबीआई के साथ न्यायमूर्ति के पक्ष में तर्क रख रहे थे तो उन्हें बताना चाहिए था कि न्यायमूर्ति के बच्चों को वे और पैसे देते हैं। अगर वादी बच्चों का काम और पेशा तय नहीं कर सकता है तो उसे यह जानने का हक है कि उनका विरोधी अधिवक्ता न्यायमूर्ति के बच्चों के फायदे के लिए काम करता है। मोदी सरकार ने मुंबई विस्फोट के जिन्दा पकड़े गए अभियुक्त के सरकारी वकील उज्जवल निकम को राजनीतिक लाभ दिया है जबकि उन्होंने कुछ विशेष नहीं किया और सिर्फ यह कहानी गढ़ी थी कि बिरयानी खिलाई जा रही है। ऐसे में अमित शाह की पूर्व घोषणा और सॉलीसिटर जनरल के काम से लगता है कि वे अपने गुजराती आकाओं के लिए काम कर रहे हो सकते हैं।
नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, होने से पहले बिगड़ी बात। खबर के अनुसार, दो सप्ताह का युद्धविराम कल समाप्त होने वाला है। देशबन्धु में युद्ध की खबर दो कॉलम में है, ट्रम्प ने ईरान को फिर दी धमकी और कहा, समझौता नहीं किया तो तबाही तय। हालांकि, देशबन्धु की लीड का शीर्षक है,तमिलनाडु की पटाखा फैक्ट्री में धमाका, 18 की मौत। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान (की मध्यस्थता) लकटी इसलिए मिश्रित संकेत।द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, वार्ता पर ईरान ने रुख तय नहीं किया है, ट्रम्प बंदी जारी रखेंगे। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है, अमेरिका ने ईरान के जहाज को जब्त किया पर दोनों पक्षों ने कहा, पाकिस्तान में वार्ता जारी है। ट्रम्प ने करार करने से पहले बंदी हटाने से मना किया। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, दिल्ली-सियोल व्यापार दूना करेंगे, 15 करार किए, रणनीतिक संबंधों को बेहतर किया जाएगा। दि एशियन एज में पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर ममता बनर्जी का भी पक्ष है। उन्होंने कहा है, टीएमसी के नेताओं को गिरफ्तार करने की साजिश के पीछे भाजपा है। इसका शीर्षक है, ममता ने पश्चिम बंगाल चुनावों में नाटक करने की कोशिश का आरोप लगाया।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


