ज्ञानेंद्र अवस्थी-
“जहाज़ निकल चुका है” — और भारत का IT अभी भी प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा ताली बजा रहा है। यह कोई अफ़वाह नहीं है। यह कोई विपक्षी नैरेटिव नहीं है।
यह बात कह रहे हैं रमेश दामानी — वही निवेशक जो पिछले 30 साल के Indian IT बूम के सबसे बड़े फ़ायदाकर्ताओं में रहे हैं।
तथ्य देखिए और झटका महसूस कीजिए: भारत की टॉप 7 IT कंपनियाँ — 16 लाख कर्मचारी कुल वैल्यूएशन ~ $350 बिलियन
Anthropic — सिर्फ़ 2,000 कर्मचारी, वैल्यूएशन ~ $350 बिलियन… यानी बराबर वैल्यू, लेकिन इंसानों की ज़रूरत 800 गुना कम।
यह कोई चक्र नहीं है। यह कोई temporary slowdown नहीं है। यह AI-led productivity shock है — और इस बार सच में अलग है।
Indian IT का पूरा मॉडल इस धारणा पर खड़ा था कि “ज़्यादा लोग = ज़्यादा बिलिंग = ज़्यादा मुनाफ़ा।” AI ने इस फ़ॉर्मूले को जला कर राख कर दिया है।
आज स्थिति यह है कि: AI कंपनियाँ tools नहीं, काम करने वाले agent बना रही हैं। वही काम जो 100 इंजीनियर करते थे, अब 5 लोग + AI कर रहे हैं और कंपनियाँ अब headcount नहीं, output खरीद रही हैं।
रमेश दामानी साफ़ कहते हैं: Indian IT कंपनियाँ cash piles से innovation नहीं कर रहीं, वो dividends बाँट रही हैं। Safe खेल रही हैं — और यही सबसे बड़ा risk है।
सवाल बहुत खतरनाक है, लेकिन टालना अब नामुमकिन है: अगर AI को लोगों की ज़रूरत नहीं, तो भारत के 58 लाख IT-BPM कर्मचारियों का क्या होगा?
World Economic Forum कहता है — 2030 की core skills technical नहीं होंगी, बल्कि judgment, leadership, adaptability होंगी। और भारत क्या कर रहा है? वही services, वही billing models, वही comfort zone यह सिर्फ़ कंपनियों का संकट नहीं है। यह middle class employment का संकट है।
इस बार: ना सरकार बचाएगी, ना old-brand loyalty ना degrees… जो बदलेगा, वही बचेगा। जो इंतज़ार करेगा, वही कटेगा।
जहाज़ निकल चुका है। अब सवाल ये है — आप किस डेक पर खड़े हैं?


