नई दिल्ली। भारत की मीडिया इंडस्ट्री, जो एक समय में लोकतंत्र की ताकत और जनसंवाद की रीढ़ मानी जाती थी, अब गहरे आर्थिक संकट से जूझ रही है। घटती विज्ञापन आय, डिजिटल माध्यमों की चुनौती, बढ़ती संचालन लागत और वित्तीय कुप्रबंधन ने देश के कई प्रमुख मीडिया संस्थानों को दिवालियापन, पुनर्गठन और गम्भीर वित्तीय संकट की ओर धकेल दिया है।
दिवालियापन की कगार पर बड़े संस्थान
Founder India नामक वेबसाइट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, साधना कम्युनिकेशंस प्राइवेट लिमिटेड को जुलाई 2022 में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) ने दिवालिया घोषित किया। अक्टूबर 2023 तक इसका समाधान प्रक्रिया पूरी हुई, जो यह दर्शाता है कि पुराने और स्थापित प्रसारक भी आर्थिक अस्थिरता से अछूते नहीं हैं।
साधना ब्रॉडकास्ट लिमिटेड, जो क्षेत्रीय चैनलों के लिए जानी जाती है, को फरवरी 2025 में सेबी ने कथित स्टॉक हेरफेर मामले में फटकार लगाई।
श्री अधिकारी ब्रदर्स टेलीविजन नेटवर्क लिमिटेड, जिसने कभी SAB TV जैसे चैनलों की नींव रखी थी, 2022 में भारी कर्ज और घटती आय के कारण दिवालिया प्रक्रिया में दाखिल हुआ।
संकट में अन्य प्रमुख मीडिया कंपनियां
हिंदुस्तान समाचार समूह, जो जगबाणी और पंजाबी ट्रिब्यून जैसे लोकप्रिय अखबारों का प्रकाशन करता है, संचालन घाटे और वेतन भुगतान में देरी से जूझ रहा है।
CNN-News18, नेटवर्क18 समूह के तहत आने वाला यह न्यूज़ चैनल ब्यूरो बंद करने और भारी छंटनी जैसी प्रक्रिया से गुजर रहा है।
ज़ी मीडिया कॉर्पोरेशन लिमिटेड भी वित्तीय पुनर्गठन की स्थिति में है। चैनल्स की संख्या अधिक होने के बावजूद घटते विज्ञापन और बढ़ते खर्च ने इसे संकट की ओर धकेल दिया है।
प्रेस एजेंसियों की हालत भी नाज़ुक
प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) और यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ इंडिया (UNI) जैसी बड़ी समाचार एजेंसियां भी आर्थिक तंगी से गुज़र रही हैं। PTI में वेतन में देरी और भर्ती पर रोक लगी है, वहीं UNI में कर्मचारियों की छंटनी और सेवाओं में कटौती जैसी स्थिति बनी हुई है।
उद्योग की समग्र चुनौतियां
विज्ञापन आय में गिरावट: गूगल और मेटा जैसी कंपनियां डिजिटल विज्ञापन बाजार पर कब्जा कर चुकी हैं, जिससे पारंपरिक मीडिया को भारी नुकसान हुआ है।
बढ़ती लागत: न्यूज़प्रिंट की कीमतें, सैटेलाइट शुल्क और बुनियादी ढांचे की देखरेख पर आने वाला खर्च मुनाफे को खा रहा है।
बदलती दर्शक प्राथमिकताएं: युवा दर्शक अब यूट्यूब, सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल क्रिएटर्स पर ज्यादा भरोसा कर रहे हैं।
राजनीतिक और कॉर्पोरेट दबाव: विज्ञापन और फंडिंग के लिए राजनीतिक या कॉर्पोरेट सहयोग पर बढ़ती निर्भरता से संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
रास्ता क्या है?
मीडिया संस्थानों को वित्तीय रूप से टिकाऊ और डिजिटल-फर्स्ट रणनीतियों को अपनाना होगा। विज्ञापन पर एकमात्र निर्भरता से हटकर सब्सक्रिप्शन मॉडल, डेटा जर्नलिज्म और विश्वसनीय रिपोर्टिंग के जरिए दर्शकों का भरोसा जीतना अब जरूरी हो गया है।
यदि भारतीय मीडिया इस संकट से उबरना चाहता है, तो उसे अब केवल खबरें दिखाने वाली मशीन नहीं, बल्कि भरोसेमंद और नवोन्मेषी आवाज़ बनकर सामने आना होगा।




हरजिंदर
April 16, 2025 at 2:21 pm
पंजाबी ट्रिब्यून को हिंदुस्तान समाचार समूह प्रकाशित नहीं करता है। उनका अलग ट्रस्ट है। जगबानी को प्रकाशित करने वाले समूह का नाम भी हिंद समाचार है।