Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

टीवी

न्यूज़ चैनलों का खेल खत्म, लाइसेंस सरेंडर का युग शुरू… देखें लिस्ट!

आप चैनल खोल सकते हैं, दर्शक खरीद नहीं सकते। जो माध्यम जनता से कट गया, वह तकनीक से नहीं — अविश्वसनीयता से मरा!

पवन सिंह-

भारतीय न्यूज चैनलों का भविष्य क्या दांव पर लग चुका है? बड़ी संख्या में न्यूज चैनलों से दर्शक विमुख हुए हैं। तमाम दर्शकों ने विगत कुछ सालों से न्यूज चैनलों को “आंख तक नहीं लगाया है”…..! मात्र 25 सालों में ही न्यूज चैनल अपनी विश्वसनीयता और अपना विशालकाय दर्शक वर्ग खो देंगे, ऐसा नहीं सोचा गया था लेकिन यह हो चुका है।

न्यूज चैनल्स के दर्शक अब सिरे से गायब हो चुके हैं..! इसका बहुत बड़ा कारण है चैनलों का जनसरोकारी खबरों से दूर होना और पूरा दिन सांप्रदायिक बहसों को हवा देना…!

दरअसल, भारतीय चैनल्स एक्सपोज हो चुके हैं और यह प्रकृति का नियम है कि जो एक बार एक्सपोज हो जाता है वह हमेशा के लिए हाशिए पर चला जाता है। विश्वसनीयता का धूलधूसरित होना न्यूज चैनलों के विनाश का प्रमुख कारण बन रहा है। एक उदाहरण देना चाहूंगा जैसे ही दिल्ली के एक बड़े हिंदी न्यूज चैनल को एक “विशालकाय उद्योगपति” ने टेक ओवर किया, उसके कुछ ही महीनों बाद चैनल का एक बड़ा दर्शक वर्ग उस चैनल से भाग खड़ा हुआ। अब हुआ यह कि चैनल संचालक जनता से दूर हटे और जनता उनसे दूर हुई…!

आप न्यूज चैनल तो खोल सकते हैं… लेकिन दर्शक वर्ग किसी भी कीमत पर नहीं ला सकते…!!! आज हालात यह हो चले हैं कि तमाम न्यूज चैनलों ने अपने-अपने ब्राड कास्टिंग लाइसेंस सेरेंडर करने आरंभ कर दिए हैं…!!! यह सब मात्र ढाई दशकों में ही देखने को मिलेगा ऐसा नहीं सोचा था…!!!

देश में विगत तीन वर्षों में करीब 50 टीवी चैनलों ने अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर कर दिए हैं। लगातार एक ही तरह की प्रायोजित और एक तरफा खबरों से उकताए दर्शकों का एक बड़ा वर्ग डिजिटल व OTT प्लेटफॉर्म्स की ओर जा चुका है। इसके बाद चैनल आपरेटरों को दूसरा झटका गिरते विज्ञापन राजस्व, उच्च परिचालन लागत और बाजार की बदलती हुई स्थितियों ने दिया। परिचालन लागत ज्यादा हुई व विज्ञापन राजस्व कम हुआ …साथ ही दर्शक वर्ग गायब और कम दर्शकों के कारण विज्ञापन दाता कंपनियों द्वारा हाथ खींचना या विज्ञापन दरें कम कर देना, एक बड़ा कारण रहा। यह असर इंटरनेट चैनलों पर भी देखा जा रहा है।

देश में DTH ग्राहकों में भी लगातार भारी गिरावट होती जा रही है…भारत में DTH ग्राहकों की संख्या वित्तीय वर्ष 2019-20 में 72 मिलियन से घटकर वित्तीय वर्ष 2024 में 62 मिलियन रह गई…यह संख्या लगातार तेजी से घटती जा रही है। प्राप्त जानकारी के अनुसार विगत वर्षों में जिन प्रमुख ब्रॉडकास्टर्स ने अपने-अपने लाइसेंस सरेंडर किए हैं उनमें- JioStar, Zee Entertainment, Eenadu Television, TV Today Network, NDTV, और ABP Network के नाम शामिल हैं जिन्होंने अपने कई चैनलों के लाइसेंस सरेंडर कर दिए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार Culver Max Entertainment यानी सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया ने भी 26 डाउनलिंकिंग अनुमतियां सरेंडर की हैं। ABP Network ने उच्च लागत के कारण ABP News HD बंद कर दिया, और NDTV ने अपने प्रस्तावित ‘NDTV Gujarati’ चैनल का लाइसेंस वापस कर दिया।

न्यूज चैनल्स जो कभी धड़ाधड़ प्रादेशिक न्यूज चैनल्स खोल रहे थे वह सब के सब धीरे-धीरे बंद होते चले गये। सबसे ज्यादा प्रादेशिक चैनल्स बंद हुए। मेरे एक पत्रकार साथी ने 2016 में बातचीत में कहा था कि एक दिन लाल किले के पीछे बाजार में न्यूज चैनलों के कैमरे और आईडी किलो में बिकेंगी…वह बात आज सच साबित हो रही है..!

जो न्यूज चैनल्स जिंदा भी हैं उनको विभिन्न राज्यों के सूचना विभाग और दिल्ली की मिनिस्ट्री आफ ब्राड कास्टिंग ने वेंटीलेटर की सुविधा पर रख रखा है।

नाम न खोलने की शर्त पर एक बड़ी कंपनी के सीईओ जो कि मेरे मित्र भी हैं, का कहना है- हर साल हमारी कंपनी का पब्लिसिटी बजट करीब 20 करोड़ का हुआ करता था लेकिन जिस तरह से आम जनता की पर्चेजिंग पावर घटी है और निर्यात में दिक्कतें बढ़ी हैं, अब पब्लिसिटी बजट जारी रख पाना कठिन है। चीन से जबरदस्त चुनौती अलग से है…! कमोबेश देश की तमाम बड़ी कंपनियों ने अपना पब्लिसिटी बजट घटा दिया है और अब अपनी शर्तों पर विज्ञापन जारी कर रही हैं। उनके रेट पर विज्ञापन लेना हो तो आओ वरना चैनल के आफिस में बैठो..!

न्यूज चैनल्स के संदर्भ में हालात अभी और भी खराब होंगें। दर्शकों को बड़े पत्रकारों के यूट्यूब चैनल्स लुभाने लगे हैं…जहां संदर्भों के साथ और बिना किसी सेंसर शिप का कंटेंट हैं..! कमेंट्स खुला है…सहमति-असहमति प्रगट करने की त्वरित सुविधा है। बहस का एक स्तर है …शाम छह बजे से आठ बजे तक स्टूडियो में बेमतलब के विषयों पर मुर्गे-मुर्गियां लड़ाने की परंपरा नहीं है। … इंटरटेनमेंट के लिए तमाम ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं और तात्कालिक न्यूज के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं।

इधर चैनलों की मंहगी विज्ञापन दरों की काट देश के कुछ सूचना विभागों ने निकाल ही है। वे कम लागत में एलईडी वैन पर गांव-गांव व सुदूर कस्बों तक सरकारी योजनाओं को सीधे जनता तक कनेक्ट करने में सफल हो रहे हैं। जहां विज्ञापन की अवधि और उस बढी अवधि के हिसाब से दरों के बढ़ने का डर नहीं है। एलईडी वैन की जीपीएस से मानीटरिंग हो रही है…! कम लागत और सीधे जनता से कनेक्टिविटी का यह प्रयोग छोटे राज्यों में धीरे-धीरे लोकप्रिय होता जा रहा है।

भारत में न्यूज़ चैनल्स की शुरुआत औपचारिक रूप से 1965 में दूरदर्शन से हुई थी। 1965 में दूरदर्शन पर मात्र 5 मिनट का पहला नियमित समाचार बुलेटिन प्रतिमा पुरी द्वारा पढ़ा गया था. इसके बाद दूरदर्शन न्यूज का एक लंबा युग चला। प्रादेशिक समाचार प्रसारण भी आरंभ हुए। वर्ष, 1991 में जब खाड़ी युद्ध आरंभ हुआ और CNN जैसे विदेशी चैनल्स ने कवरेज दी तो लोग आश्चर्यचकित रह गये। भारत में 1992 में पहला प्राइवेट ब्रॉडकास्टिंग न्यूज चैनल जी न्यूज आया और फिर आज तक …सैटेलाइट टीवी के आने के बाद बहुत कुछ बदला। वर्ष, 1999 में आज तक डीडी से हटा और 24 घंटे का स्वतंत्र चैनल बना।

2000 के बाद तमाम न्यूज चैनल्स आए और 2025 के अंत तक आते-आते अब सरेंडर युग की ओर जा रहे हैं‌।


चैनलों का खेल खत्म! लाइसेंस सरेंडर का युग शुरू…

भारतीय न्यूज़ चैनलों का भविष्य अब सिर्फ संकट में नहीं, बल्कि ढलान पर है। जिस माध्यम ने कभी जनमत बनाया, सत्ता से सवाल पूछे और करोड़ों दर्शकों को जोड़ा — वही माध्यम आज दर्शकों से खाली स्टूडियो और सरेंडर होते लाइसेंस देख रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में दर्शकों ने न्यूज़ चैनल्स को “देखना ही छोड़ दिया”। यह केवल TRP की गिरावट नहीं, बल्कि विश्वसनीयता के पूर्ण पतन की कहानी है।

मुख्य कारण साफ हैं:

-जनसरोकार की खबरों से दूरी

-दिन-रात सांप्रदायिक, प्रायोजित और एकतरफा बहसें

-सत्ता के सामने पत्रकारिता का आत्मसमर्पण

-एक बार जब कोई माध्यम एक्सपोज़ हो जाता है, तो प्रकृति का नियम है — वह हमेशा के लिए हाशिये पर चला जाता है।

नतीजा?

-करीब 50 टीवी चैनल अपने ब्रॉडकास्टिंग लाइसेंस सरेंडर कर चुके हैं

-विज्ञापन राजस्व में भारी गिरावट

-परिचालन लागत लगातार बढ़ती हुई

-कम दर्शक = कम विज्ञापन = चैनल बंद

हालिया उदाहरण

ABP News HD बंद

NDTV Gujarati का लाइसेंस वापस

Sony (Culver Max) ने 26 डाउनलिंकिंग अनुमतियां सरेंडर कीं

Zee, JioStar, TV Today, NDTV, ABP जैसे बड़े नेटवर्क्स ने भी कई चैनल समेटे

सबसे पहले प्रादेशिक चैनल्स गिरे — वही चैनल जो कभी “ग्राउंड रिपोर्टिंग” की पहचान थे।

आज जो चैनल बचे हैं, वे भी कई राज्यों में
सूचना विभागों और मंत्रालयों के विज्ञापन वेंटिलेटर पर ज़िंदा हैं।

एक बड़ी कंपनी के CEO (नाम गोपनीय):

“हमारा सालाना पब्लिसिटी बजट 20 करोड़ था।
घटती क्रयशक्ति, निर्यात संकट और चीन की चुनौती के बीच अब यह संभव नहीं।”

यह सिर्फ भारत की कहानी नहीं है, अमेरिका और यूरोप में केबल न्यूज़ लगातार गिरावट में… युवा दर्शक टीवी छोड़कर YouTube, Podcast, Digital News की ओर… CNN, BBC, Fox जैसे नेटवर्क्स भी डिजिटल शिफ्ट को मजबूर!

भारत में बदलाव और तेज़ है… वरिष्ठ पत्रकारों के YouTube चैनल… बिना सेंसर, संदर्भों के साथ कंटेंट… खुली टिप्पणियां, त्वरित असहमति… शाम 6–8 बजे “मुर्गा-मुर्गी बहस” से मुक्ति!

नया प्रयोग
छोटे राज्यों में GPS-ट्रैक्ड LED वैन — कम लागत, सीधे जनता से संवाद, और बिना स्टूडियो ड्रामा।

इतिहास याद रखें

1965: दूरदर्शन का पहला 5 मिनट का बुलेटिन

1991: CNN और खाड़ी युद्ध

1992: Zee News

2000–2020: चैनलों का विस्फोट

2025 के बाद: सरेंडर युग

सच कड़वा है: आप चैनल खोल सकते हैं, दर्शक खरीद नहीं सकते। जो माध्यम जनता से कट गया, वह तकनीक से नहीं — अविश्वसनीयता से मरा।

न्यूज़ चैनलों का संकट असल में पत्रकारिता का आईना है।

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन