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सियासत

इंदिरा गाँधी निरंकुश थीं और नरेंद्र मोदी भी निरंकुश हैं, पर ब्यूरोक्रेसी को हैंडल करने में दोनों में एक बड़ा फर्क है!

नीरेंद्र नागर-

इंदिरा गाँधी भी निरंकुश थीं और नरेंद्र मोदी भी निरंकुश हैं। लेकिन ईमानदार लोगों के साथ दोनों के सलूक में क्या मूलभूत अंतर है, यह यूपी के पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह ने ‘पुलिस सुधारों में आ रही दिक़्क़तों’ पर लिखी अपनी किताब में स्पष्ट किया है।

प्रकाश सिंह वही हैं जिनको राम मंदिर आंदोलन के समय डीजीपी के पद से हटा दिया गया था क्योंकि वे बाबरी मस्जिद परिसर के बाहर पुलिस सुरक्षा कम करने को राज़ी नहीं हुए थे।

सिंह लिखते हैं – इंदिरा गाँधी का समय वह पहला दौर था जब प्रतिभा को नकारने और वफ़ादारी को पुरस्कृत करने का चलन शुरू हुआ। उस दौर में ईमानदार लोगों की क़दर की जाती थी मगर जैसे ही वे सत्ता के लिए परेशानी खड़ी करते दिखते थे, उनका तबादला कर दिया जाता था हालाँकि साथ-साथ यह भी ध्यान रखा जाता था कि नई जगह पर उनकी प्रतिष्ठा पहले की तरह बनी रहे।

इसके बाद दूसरा दौर आया जब सत्तारूढ़ राजनीतिज्ञों के आदेशानुसार काम न करने वाले अफ़सरों को अपमानित किया जाने लगा और सजा के तौर पर उन्हें महत्वहीन जगहों पर फेंका जाने लगा।

तीसरे और आज के दौर में हालात ऐसे हैं कि सत्ता के इशारे पर काम न करने वाले अफ़सरों को निलंबित कर दिया जाता है, फ़र्ज़ी मामलों में फँसा दिया जाता है और पेंशन तक रुकवा दी जाती है।

(संडे इंडियन एक्सप्रेस में छपे रिव्यू के आधार पर)

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