सुदीप ठाकुर-
बस्तर की बेटी इरा झा…. इरा जी…. इतनी जल्दी…. इरा जी नहीं रहीं यह स्वीकार करना मुश्किल है। इरा जी कुछ दिनों से बीमार थीं। आज एम्स दिल्ली में निधन हो गया।

बस्तर से निकलकर राजधानी दिल्ली में इरा झा ने 1980 के दशक के आखिर और 90 के दशक की शुरुआत में पत्रकारिता में उस दौर में खास मुकाम बनाया जब महिलाएं पत्रकारिता में कम ही नज़र आती थीं।
वह तेजतर्रार रिपोर्टर थीं और कभी यह नहीं भूलीं कि उनकी जड़ें छत्तीसगढ़ और बस्तर में हैं। जब कभी मौका मिला उन्होंने छत्तीसगढ़ और बस्तर के मुद्दों को शिद्धत से उठाया। राजधानी दिल्ली में दशकों रहने के बावजूद उनके भीतर एक बस्तरिया हमेशा जिंदा रहा।
1991 की एक शाम राजधानी दिल्ली में आईटीओ स्थित नवभारत टाइम्स के दफ्तर में उनसे पहली मुलाकात हुई थी। तब वह शायद टाइम्स के नेशनल डेस्क पर थीं और तब दिल्ली और मुंबई तक में महिलाएं न्यूज रूम में कम ही दिखती थीं। सही मायने में हिन्दी पत्रकारिता में जिन महिला पत्रकारो ने परचम फहराया उनमें वह शुरुआती लोगों में थीं।
सुलझी हुई दृष्टि और जमीनी स्तर की जानकारी से लैस इरा झा को शायद वह मौका कभी नहीं मिला जिसकी वह हकदार थीं। किसी पोस्ट में इसका जिक्र भी उन्होंने किया था। इरा झा को किसी राष्ट्रीय दैनिक ने संपादक के लायक नहीं माना जबकि वह कई संपादकों से बेहतर थीं।
इन दिनों जब दिल्ली से पत्रकार पर्यटक की तरह बस्तर आते हैं, वह बस्तर को जी रही थीं… बस्तर ने आज अपनी एक तेजतर्रार और मानवीय और संवैधानिक मूल्यों से समृद्ध बेटी खो दी… सादर नमन!
विपिन धूलिया– अभी अभी खबर मिली कि इरा झा नहीं रहीं…सकते में आ गया… क़रीब पैंतीस साल का रिश्ता था इरा से… बेहतरीन इंसान तो थी ही, मेजबानी का भी कोई जवाब नहीं था… पत्रकारिता में इरा ने बिना कोई समझौता किए असाधारण रिपोर्ट्स लिखीं… इसके लिए उनको नौकरी तक दांव पर लगानी पड़ी थी… हां एक बात और, इरा की भाषा के क्राफ्ट को लेकर मुझे रश्क रहा है… हमेशा याद आओगी… अलविदा. अनंत और बेटे के प्रति गहरी संवेदना.
उमाकान्त लखेड़ा– इरा झा यानी इराजी! बस इसी नाम से पुकारते थे उनको। मेरे साथ हिंदुस्तान के नेशनल ब्यूरो में कुछ साल साथ रहीं। एक संवेदनशील पत्रकार के गुणों से भरपूर, गहरी शिष्टता और दूसरों का आदर करना उनकी आदत में शुमार था। कम ही साथी हैं जो दोनों पति पत्नी पत्रकार हों। हम में कईयों के दोनों से सामान आदर के रिश्ते हों। उनके पति अनंत मित्तल भी पुराने मित्र और साथी हैं। बहुत अफसोस है दोनों का एक दूसरे से असमय साथ छूट गया। इरा झा लिखने और बोलने में बेबाक थीं । राष्ट्रीय मुद्दों पर गहरी समझ रखती थीं। उनके अकस्मात जुदा होने पर हम सभी साथी निशब्द हैं।
कनक तिवारी– वह इतनी जल्दी कैसे जा सकती थी? क्यों चली गई? आई थी कितनी हुलस में अपने पति को लेकर मेरे घर ।छत्तीसगढ़ी भाजी खाने का कितना शौक था। मैं उसके लिए भेजता भी था ।शायद तुम्हें भेजा था। बस्तर के बारे में कितनी बात की! राजनांदगांव के बारे में! दुर्ग के बारे में! राजनीति के बारे में! पत्रकारिता के बारे में ! मेरे बारे में! परिवार के बारे में! ओफ! इससे बुरी खबर कुछ नहीं हो सकती।
आशुतोष कुमार– ओह ! अभी पिछले सप्ताह ही तो प्रेस क्लब में मिली थी . हे भगवान . ओम शांति!
इरा झा जी की हाल की कुछ एफबी पोस्ट-



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Vinod Varshney
October 18, 2024 at 6:35 pm
Shocking ! I remember–she was my next cabin colleague in Hindustan. Always jolly and spirited with leadership qualities. And doubtlessly professionally competent. My condolences to the family and Anant.