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दैनिक जागरण में एक खबर रिपीट तो एक छूटी

आइए आपको दिखाते हैं दैनिक जागरण में विष्‍णु त्रिपाठी के चिंटुओं, मिंटुओं और चिंदीचोरों का एक कारनामा। नोएडा संस्‍करण में भाई लोगों ने एक ही खबर को दो बार छाप दिया है, जबकि नोएडा के इंदिरा गांधी कला केंद्र में पुलिस, पत्रकार और समाज की चिंताओं पर गहन चिंतन के लिए आयोजित एक जोरदार कार्यक्रम की नोएडा संस्‍करण में कोई कवरेज ही नहीं आई। उस कार्यक्रम में लोकतंत्र के तीन स्‍तंभों के दिग्‍गज जुटे थे। बदलते जमाने के अखबार में ऐसी जड़ता क्‍यों। जो खबर रिपीट हुई है, उसका शीर्षक है-”शहर में व्‍यावसायिक इस्‍तेमाल पर जब्‍त होगी ट्रैक्‍टर ट्राली”। यह खबर नोएडा संस्‍करण के पुलाउट पेज-चार और आठ पर छपी है। 

आइए आपको दिखाते हैं दैनिक जागरण में विष्‍णु त्रिपाठी के चिंटुओं, मिंटुओं और चिंदीचोरों का एक कारनामा। नोएडा संस्‍करण में भाई लोगों ने एक ही खबर को दो बार छाप दिया है, जबकि नोएडा के इंदिरा गांधी कला केंद्र में पुलिस, पत्रकार और समाज की चिंताओं पर गहन चिंतन के लिए आयोजित एक जोरदार कार्यक्रम की नोएडा संस्‍करण में कोई कवरेज ही नहीं आई। उस कार्यक्रम में लोकतंत्र के तीन स्‍तंभों के दिग्‍गज जुटे थे। बदलते जमाने के अखबार में ऐसी जड़ता क्‍यों। जो खबर रिपीट हुई है, उसका शीर्षक है-”शहर में व्‍यावसायिक इस्‍तेमाल पर जब्‍त होगी ट्रैक्‍टर ट्राली”। यह खबर नोएडा संस्‍करण के पुलाउट पेज-चार और आठ पर छपी है। 

अब यह चिंटू, मिंटू और चिंदीचोरों की गफलत का नतीजा है या दैनिक जागरण की दुर्भावनापूर्ण नीतियों का परिणाम, यह तो विष्‍णु त्रिपाठी ही जानें, लेकिन भाई विष्‍णु त्रिपाठी जी यह आप क्‍या करा रहे हैं। एक खबर को दो बार छापना तो किसी अखबार की नीति नहीं हो सकती। आप तो बड़े बड़े लोगों को खारिज करने का माद्दा रखते हैं, फिर इन चिंटू, मिंटू और चिंदीचोरों को क्‍यों ढो रहे हैं। आप तो ऐसे न थे। फिर क्‍या मजबूरी है।

ऐसा नहीं है कि यह पहली घटना है। इससे पहले भी नोएडा में आतंकी पकड़ा गया और आपने खबर छूट जाने दी। यह तो बानगी भर है। पता नहीं कितना और अखबार का बेड़ा गर्क हो रहा होगा। आपके समीक्षक भी कुछ इसी तरह कार्य करते होंगे, जो किसी कर्मचारी विशेष को निशाना बनाना होता है, तभी काम करते हैं। भाई यह बात समझ में नहीं आ रही है कि आप पाठकों को बेवकूफ बना रहे हैं या संजय गुप्‍ता जी को। वह आप पर बड़ा भरोसा करते हैं तो उनका भरोसा क्‍यों तोड़ रहे हैं। आम कर्मचारी का भरोसा तो आप से पहले ही उठ चुका है।

श्रीकांत सिंह के फेसबुक वॉल से

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